उज्जैन, मध्य प्रदेश परम् पूज्य परम् सन्त बाबा उमाकान्त जी महाराज ने सतसंग में कहा कि मनुष्य शरीर पाने का कर्तव्य है कि इस आत्मा को परमात्मा तक पहुंचा दो, इसको जन्म मरण से छुटकारा दिला दो, यह अपने स्थान तक पहुंच जाए जहां से यह आई है। यह जो मरते और जन्मते समय तकलीफ होती है, यह छूट जाए, इसमें फिर ना जाना पड़े। मनुष्य शरीर का यह कर्तव्य होता है।
अब जैसे जिसको जो जिम्मेदारी मिलती है; चाहे देश की हो, चाहे समाज की हो, अगर वह उसको नहीं निभा पाता है तो जिस तरह उसकी समाज में इज्जत नहीं रह जाती है ऐसे ही जो अपनी आत्मा को नहीं जगाता है वह इधर उधर धक्का खाता है। वह एक नरक से निकाले गए तो दूसरे नरक में धकेल दिए जाते हैं, पक्षी की योनि से निकाले गए तो कीड़े-मकोड़े की योनि में डाल दिए जाते हैं, वहां से निकाले गए तो खरगोश, बिल्ली, चूहा बना दिए जाते हैं। बस धक्का खाते रहो।
किस धन की बदौलत सती सावित्री ने अपने पति के प्राणों को वापस ले लिया था?
“लख चौरासी भटक कर, पग में अटक्यो आय।
अबकी पासा ना पड़ा, तो फिर चौरासी जाय।।”
अबकी बार जो यह पासा पड़ गया है आपका, यह जो देव दुर्लभ शरीर मिल गया, अबकी बार अगर दांव नहीं लगा तो फिर चौरासी में धक्का खाते रहोगे। इसीलिए आप असला काम में लग जाओ यानि सच्चे गुरु से रास्ता लेकर अपनी आत्मा को जगा लो जिससे दीन भी बनता है और दुनिया भी बनती है।
आत्मधन ऐसा धन है जो जब तक आप जिओगे आपके यहां भी काम आएगा और शरीर छूटने के बाद भी काम आएगा। इसी धन के बदौलत सती सावित्री ने अपने पति के प्राणों को वापस ले लिया था और सती अनसुइया ने ब्रह्मा विष्णु महेश को छोटा-छोटा बच्चा बना दिया था। इसलिए आप भी उस धन को इकठ्ठा करो।
