उज्जैन। काव्य-गोष्ठी के चल रहे निरंतर क्रम को जारी रखते हुए इस सप्ताह भी ग़ज़लांजलि साहित्यिक संस्था ने दशहरा मैदान स्थित डॉ. सखा पाहवा के निवास पर गोष्ठी आयोजित की। नियमित परम्परानुसार दीप प्रज्ज्वलन एवं सरस्वती वन्दना के पश्चात मोबाइल की समाज में बढ़ती आदत पर प्रफुल्ल शुक्ला सरकार ने रचना पढ़ी मोबाइल से बच्चे भी बेशरम हो गए, हिंसा देख-देखकर बेरहम हो गए… उनकी चिंता जायज़ है। उनकी इस विशेष रचना के बाद दिलीप जैन ने मंजिल पर नहीं मेरी नज़र हमसफ़र पे है, रास्तों की अड़चनों पे है रहगुज़र पे है… कविता पढ़ी। संजय शर्मा उज्जैनी ने बेटियों के मइके से जुड़े सम्बन्धों पर तुम चाहे बुलाओ न बुलाओ मैं अवश्य आऊँगी वो कच्ची केरी की चटनी खाने मैं अवश्य आऊँगी… रचना का पाठ किया। बुद्धि समझ और प्रेम की पराकाष्ठा थी, हम इंसान ऐसे क्यों नहीं हैं… कविता का विनोद काबरा ने पढ़ी। डॉ. आर. पी. तिवारी ने अतिशय सुन्दर अतिशय प्यारा मेरा गाँव सुहाना… सुनाकर पूरी महफ़िल को अपने गाँव की सैर करा दी। तन तो भीगा मन को भी तर कर गई बारिश, दिल के रस्ते रूह में भी कर घर गई बारिश… ग़ज़ल डॉ. अखिलेश चौरे ने पढ़ी। आज के कार्यक्रम में डॉ. विजय सुखवानी, आशीष अश्क, अशोक रक्ताले, विजयसिंह गहलोत साकित, अवधेश वर्मा नीर आदि ने अपनी रचनाओं का पाठ किया। डॉ. श्रीकृष्ण जोशी की अध्यक्षता में आयोजित हुई इस काव्य गोष्ठी की समीक्षा डॉ. हरिमोहन बुधौलिया ने की।
