आजकल तो लोगों का प्रभु पर से विश्वास ही हट रहा है लेकिन पहले गृहस्थ ने सुबह-शाम प्रभु को याद करने का नियम बना रखा था
बावल, रेवाड़ी, हरियाणा परम् पूज्य परम् सन्त बाबा उमाकान्त जी महाराज ने 20 सितंबर 2026 के सतसंग में कहा कि पहले के समय में गृहस्थों ने यह नियम बना रखा था कि थोड़े समय के लिए दुनिया की चीजों को भूल कर के सुबह-शाम प्रभु को याद करेंगे। घर में ही सही लेकिन थोड़ी देर भगवान को याद करते ही थे। जो भी उनके वहां का रीति रिवाज था, जिस भी नाम से लोग प्रभु को मानते थे, उस नाम को याद करते थे। लोग आपस में धार्मिक चर्चाएं करते थे, सुनते थे। छोटे-छोटे बच्चे जो सुनते थे उनका संस्कार बन जाता था और फिर उनका ध्यान गलत चीजों की तरफ नहीं जाता था।
उनका संस्कार उससे बनता था। महिलाएं भी सुनती रहती थीं और ज्ञानी हो जाती थीं। सुनते-सुनते ही सती सावित्री के अंदर सतीत्व आ गया, सुनते-सुनते ही सती अनसुइया के अंदर सतीत्व आ गया। माता सीता भी सती अनसुइया के आश्रम पर जाती और उनसे ज्ञान सुनती थी तो उन पर भी संस्कार बनता था। प्रभु को याद करने से संस्कार बनता है, याद करने से ही वे दया करते हैं और जब दया करते हैं तब कदम-कदम पर दया का अनुभव होता है और इंसान को उन पर विश्वास हो जाता है।
जो संयम नियम का पालन करते हैं उनकी बुद्धि सही रहती है
आजकल तो प्रभु पर से लोगों का विश्वास ही हट रहा है। इस शरीर से कर्म ऐसे खराब होते चले जा रहे हैं कि वही जब पहाड़ बन करके सामने आ जाते हैं तब इंसान अंधा सा हो जाता है। छोटे-छोटे बच्चे जो सुबह उठकर के संयम और नियम का पालन करते थे और धूल-मिट्टी में लौट करके, मेहनत करके अपने शरीर को मजबूत किया करते थे; वे बलवान हुआ करते थे, बहादुर हुआ करते थे लेकिन अब वही बच्चे नशे की आदत में दुबले होते चले जा रहे हैं, उनके शरीर में कोई ताकत नहीं रह जा रही है।
मांस जो खाते हैं वह उनके शरीर के अंदर के मांस को खाए जा रहा है। तो संयम नियम का पालन आज भी जो करता है उसको ज्ञान रहता है, उनकी बुद्धि सही रहती है। व्यक्ति जब सात्विक भोजन करता है तब उसका मन चंचल नहीं होता है, विषय वासनाओं की तरफ नहीं भगता है।
