उज्जैन। सेवाज्ञ संस्थानम् के राष्ट्रीय उपक्रम युवा धर्म संसद 2026, अवन्तिका के दूसरे दिन प्रथम व्याख्यान सत्र का आयोजन ‘ऋषि एवं कृषि संस्कृति के मध्य भारत का आजीविका विचार’ विषय पर किया गया। गीता भवन, उज्जैन में आयोजित इस तीन दिवसीय युवा धर्म संसद में देश के विभिन्न राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों से आए युवा, शिक्षाविद, चिंतक, साहित्यकार, वैज्ञानिक और विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञ भारतीय संस्कृति, ज्ञान परंपरा, धर्म, सामाजिक उत्तरदायित्व तथा राष्ट्र निर्माण में युवाओं की भूमिका जैसे विषयों पर विमर्श कर रहे हैं। सत्र में प्रख्यात भारतीय शिक्षाविद एवं विचारक डॉ. इंदुमति काटदरे, वैज्ञानिक, लेखक एवं स्तंभकार प्रो. आनंद रंगनाथन, देवी अहिल्या विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. राकेश सिंघई तथा माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के कुलपति विजय मनोहर तिवारी ने अपने विचार रखे। इस अवसर पर पूज्य आचार्य मिथिलेशनन्दिनीशरण जी महाराज की गरिमामयी उपस्थिति रही।
प्रो. आनंद रंगनाथन ने कहा कि यदि भारत को विकसित होना है तो ऋषि और कृषि दोनों को अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान देना होगा। विकसित देशों के नागरिकों का सामर्थ्य किसी एक पेशे तक सीमित नहीं होता, बल्कि वे अपनी क्षमताओं का विभिन्न क्षेत्रों में उपयोग करते हैं। उन्होंने कहा कि जब राज्य, सरकार और नागरिक अपनी-अपनी भूमिका को समझकर उसका निर्वहन करेंगे, तभी विकसित भारत का लक्ष्य सार्थक रूप से प्राप्त किया जा सकेगा। उन्होंने कृषि क्षेत्र की चुनौतियों की चर्चा करते हुए कहा कि देश की बड़ी आबादी कृषि पर निर्भर है, लेकिन अनेक किसान नहीं चाहते कि उनकी अगली पीढ़ी कृषि को अपना व्यवसाय बनाए। कृषि को व्यावसायिक दृष्टिकोण, उचित संसाधन और बेहतर आर्थिक व्यवस्था से जोड़ना आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि भारत में गन्ने का उत्पादन व्यापक स्तर पर होता है, लेकिन यह फसल बड़ी मात्रा में जल की मांग करती है, जबकि देश के अनेक क्षेत्रों में भूजल स्तर लगातार घट रहा है। सूखा और बाढ़ जैसी प्राकृतिक परिस्थितियों से प्रभावित किसानों के सामने गंभीर संकट उत्पन्न होता है। उन्होंने कृषि उत्पादों के भंडारण की अपर्याप्त व्यवस्था पर भी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि उत्पादन के अनुरूप भंडारण की पर्याप्त व्यवस्था नहीं होने के कारण बड़ी मात्रा में अनाज नष्ट हो जाता है। उन्होंने कहा कि विकसित भारत के निर्माण के लिए सरकार को विद्यालयों की आधारभूत संरचना, स्वच्छता, स्वास्थ्य, कृषि संसाधन और भंडारण जैसी बुनियादी आवश्यकताओं पर विशेष ध्यान देना होगा। जब तक देश का जनबल स्वस्थ, शिक्षित और प्रज्ञावान नहीं होगा, तब तक विकसित भारत का लक्ष्य पूर्ण नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि केवल विकसित भारत का सपना देखने से लक्ष्य पूरा नहीं होगा, इसके लिए कठिन और आवश्यक कदम उठाने होंगे।
देवी अहिल्या विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. राकेश सिंघई ने कहा कि यदि भारत को विकसित राष्ट्र बनाना है तो युवाओं को केवल नौकरी पाने की मानसिकता से आगे बढ़कर उद्यमशीलता और रोजगार सृजन की दिशा में विचार करना होगा। उन्होंने कहा कि किसानों को जिन सुविधाओं की आवश्यकता है, उन्हें उपलब्ध कराने की दिशा में गंभीर प्रयास आवश्यक हैं। भारतीय समाज और संस्कृति में आत्मनिर्भरता की भावना निहित है और इसी आधार पर भारत विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में आगे बढ़ सकता है। उन्होंने विश्वविद्यालयों से भी अपनी सोच में परिवर्तन लाने का आह्वान किया, ताकि युवा नई सोच विकसित कर सकें और स्टार्टअप तथा उद्यम शुरू करने वाले युवाओं को संस्थागत सहयोग एवं प्रोत्साहन मिल सके। उन्होंने कहा कि भारत की प्रकृति-पूजा की परंपरा हमें प्रत्येक प्राकृतिक तत्व के सम्मान की शिक्षा देती है। इसलिए केवल प्रकृति की पूजा ही नहीं, बल्कि उसके संरक्षण और शुद्धता की दिशा में भी कार्य करना आवश्यक है। युवाओं को नौकरी तलाशने के बजाय नौकरी देने की क्षमता विकसित करनी चाहिए।
प्रख्यात शिक्षाविद एवं विचारक डॉ. इंदुमति काटदरे ने कहा कि प्रत्येक भारतीय को अपने भारतीय होने का गर्व और उसका अनुभव दोनों करना चाहिए। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति का मूल भाव केवल स्वयं के कल्याण तक सीमित नहीं है, बल्कि ‘विश्व के कल्याण में ही अपना कल्याण’ निहित मानता है। उन्होंने कहा कि श्रेष्ठ समाज के दो प्रमुख आयाम संस्कृति और समृद्धि हैं। समृद्धि के बिना संस्कृति की रक्षा कठिन है और संस्कृति से विहीन समृद्धि आसुरी स्वरूप ग्रहण कर सकती है। इसलिए धर्मानुकूल और नैतिक मूल्यों पर आधारित अर्थव्यवस्था आवश्यक है। उन्होंने कहा कि भारतीय ऋषियों ने कभी गरीबी को आदर्श नहीं माना, बल्कि वैभव और समृद्धि को भी जीवन का अंग माना है।
डॉ. इंदुमति काटदरे ने कहा कि शिक्षा व्यवस्था को व्यवस्थित और दूरदर्शी बनाने के लिए हमें अपने ऋषियों की दृष्टि से प्रेरणा लेनी चाहिए। उन्होंने विषमुक्त खेती की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि अधिक उत्पादन के लक्ष्य में हमने भूमि, नदियों और खेतों को विषाक्त कर दिया है। स्वस्थ समाज और सुरक्षित पर्यावरण के लिए कृषि पद्धतियों पर पुनर्विचार आवश्यक है। उन्होंने युवाओं से श्रम को जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाने का आह्वान करते हुए कहा कि केवल यंत्रों पर निर्भर रहने के बजाय श्रम, उत्पादकता और आत्मनिर्भरता पर ध्यान देना चाहिए। उन्होंने कहा कि आने वाले चार-पांच दशक भारतीय युवाओं के हैं और देश को ऐसे युवाओं की आवश्यकता है जो तपस्या, परिश्रम और राष्ट्र निर्माण की भावना के साथ आगे बढ़ें।
माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के कुलपति विजय मनोहर तिवारी ने युवा धर्म संसद के आयोजन की सराहना करते हुए कहा कि जरूरी समय में जरूरी हस्तक्षेप सेवाज्ञ संस्थानम् ने किया है, जिसके लिए संस्था साधुवाद की पात्र है। उन्होंने आचार्य मिथिलेशनन्दिनीशरण जी महाराज के नेतृत्व और प्रयासों की भी सराहना की। कृषि क्षेत्र का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि इजरायल में कृषि क्षेत्र में नवाचार करने वाले किसानों को विशेष महत्व दिया जाता है और उनके कार्यों को व्यापक पहचान मिलती है। उन्होंने शिक्षा व्यवस्था में कार्यसंस्कृति को मजबूत करने की आवश्यकता पर भी बल दिया।
इस अवसर पर पूज्य आचार्य मिथिलेशनन्दिनीशरण जी महाराज ने कहा कि भारत जब अपने मौलिक विचार से दूर हुआ, तभी उसने अपने ऋषि और कृषि परंपरा से भी दूरी बनाई। उन्होंने कहा कि अनेक प्रकार के नुकसान के बावजूद हम थोड़े से लाभ के लिए कार्य करते रहते हैं और युवा धर्म संसद का उद्देश्य इसी दृष्टि को व्यापक विमर्श के माध्यम से समझना है। उन्होंने कहा कि युवा धर्म संसद किसी दाएं या बाएं विचार के आधार पर संचालित नहीं है, बल्कि यह विचारों का एक ‘विहंगम योग शिविर’ है, जहां विविध दृष्टियों को समझने और संवाद करने का अवसर मिलता है। उन्होंने कहा कि हमारे सामने परोसे जाने वाले अन्न के स्रोतों और उसकी पूरी यात्रा को समझने का प्रयास किया जाए, तभी हम आजीविका के विचार को उसके वास्तविक अर्थ में समझ सकेंगे।
सेवाज्ञ संस्थानम् द्वारा आयोजित युवा धर्म संसद 2026, अवन्तिका का उद्देश्य युवाओं को भारतीय ज्ञान परंपरा, धर्म, संस्कृति, सामाजिक दायित्व और राष्ट्र निर्माण के प्रश्नों से जोड़ते हुए सार्थक संवाद का मंच उपलब्ध कराना है। युवा धर्म संसद के छठवें संस्करण में देश के विभिन्न राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों से बड़ी संख्या में युवा सहभागी हो रहे हैं। तीन दिवसीय आयोजन में व्याख्यान सत्रों के साथ युवा पंचायत, सांस्कृतिक कार्यक्रम, कला प्रदर्शनी, पुस्तक मेला, जनजातीय एवं पारंपरिक उत्पादों की प्रदर्शनी सहित विभिन्न गतिविधियां आयोजित की जा रही हैं। आयोजन के माध्यम से युवाओं को भारतीय दृष्टि से समकालीन चुनौतियों को समझने तथा अपने जीवन और समाज के प्रति उत्तरदायित्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए प्रेरित किया जा रहा है।
सत्र के अंत में वक्ताओं ने कहा कि भारत के विकास की यात्रा केवल आर्थिक प्रगति तक सीमित नहीं हो सकती। इसके लिए कृषि, शिक्षा, संस्कृति, पर्यावरण, उद्यमशीलता, श्रम और सामाजिक उत्तरदायित्व जैसे सभी आयामों को साथ लेकर चलना आवश्यक है। ऋषि परंपरा से प्राप्त जीवन-दृष्टि और कृषि संस्कृति के अनुभवों को आधुनिक आवश्यकताओं से जोड़कर युवा पीढ़ी विकसित भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
