जयपुर, राजस्थान परम् पूज्य परम् सन्त बाबा उमाकान्त जी महाराज ने सतसंग में कहा कि होटल के खाने में, बाजारों में जो खाने की चीजें मिलती हैं, सच पूछो तो उनमें केवल सूंघने पर ही खुशबू मिलती है लेकिन जब उसको खाने लग जाओ, स्वाद लेने लग जाओ तो उसमें गंध ही आती है; ऐसी-ऐसी चीजें उसमें पड़ी हुई होती हैं। तब क्या ऐसी चीजों के खाने से बुद्धि सही रहती है! नहीं; बुद्धि और भी भ्रष्ट हो जाती है।
देश में कुछ ऐसी भी शक्तियां लगी हुई हैं जो कहती हैं कि भारत देश के नौजवानों को बर्बाद करो क्योंकि ये ताकतवर हैं; इनकी फौज का एक सिपाही, हमारे दो फौजियों को दबा सकता है, ये इतने मजबूत हैं। वे सोचते हैं कि भारत देश के लोग बहुत बलवान होते हैं, तो इनकी शक्ति को क्षीण किया जाए।
इस समय यह पॉलिसी चल रही है कि भारत देश के नौजवानों के खानपान को खराब करो, उनके चरित्र को खराब करो। चरित्र से धर्म का बहुत नजदीक रिश्ता है; ये एक सिक्के के दो पहलू हैं। जो चरित्रहीन हो जाता है उसके अंदर मांस खाने और शराब पीने की भी बुराई आ जाती है। मांस, शराब और व्यभिचार; ये तीनों तिकड़ी हैं, इस समय पर ये इंसान के त्रिदोष हैं।
लोग तरह-तरह से मांस खाने का प्रचार करके बच्चों को भ्रम में डाल देते हैं
लोग तरह-तरह से मांस का प्रचार करते हैं कि थोड़ा मांस खा लिया करो, ताकत आ जाएगी, बुद्धि तेज हो जाती है, उसका विकास हो जाता है। जबकि मांस खाने से बुद्धि का विकास नहीं, विनाश हो जाता है। लोग अपने मन से बना-बना करके तमाम उदाहरण दे देते हैं कि शास्त्रों में लिखा है, इस पुराण में ये लिखा है, इसमें ये लिखा है।
जबकि कहीं भी वेद में नहीं लिखा है; चारों वेदों से ही पुराण और शास्त्र निकले हैं। लेकिन लोग मनमाना काम कर रहे हैं, लोगों को भ्रम में डाल रहे हैं, बच्चों को भ्रम में डाल रहे हैं। और इसी कारण यह व्यवस्था बिगड़ती चली जा रही है।
