उज्जैन। योग, रेकी आदि के माध्यम से जनसेवा कर रही संस्था रूपांतरण के पच्चीस वर्ष पूर्ण होने, रजत जयन्ती के अवसर पर साहित्यिक संस्था ग़ज़लांजलि द्वारा संस्था प्रमुखों सहित उपस्थित सदस्यों राजीव पाहवा, डॉ. सखा पाहवा, डॉ. मेनका, बरखा एवं परमार्थ निकेतन ऋषिकेश से पधारी गंगा नंदिनी का संस्था अध्यक्ष श्रीकृष्ण जोशी, डॉ. हरिमोहन बुधौलिया सहित संस्था सदस्यों ने शाल एवं माला द्वारा अभिनन्दन किया। इस अवसर पर आयोजित काव्य-गोष्ठी में अशोक रक्ताले ने दोहे दल के दल बादल घने, बरसे सारी रात, नव-जीवन सन्देश ले जब आयी बरसात… पढ़े। अदब सीखिए अमल में लाईये, पहले आप, पहले आप पर आजकल पहले हम और हमारा परिवार… कविता सत्यनारायण सत्येन्द्र ने पढ़ी। अपने ख्वाबों पर नहीं पहरा मेरा, इसलिए ज़ख्म है बहुत गहरा मेरा… ग़ज़ल दिलीप जैन ने पढ़ी। क्या कहें किससे कहें, कहाँ कहें अपने दर्द-ओ-ग़म…समाज की पीड़ा उठाती कविता प्रफुल्ल शुक्ला सरकार ने पढ़ी। ये बरसती घटाएँ, ख्वाहिश है बरसती रहें शाम ढलने तक, दिल भरने तक…गीत रामदास समर्थ द्वारा सुनाया गया। होठों पर हैं झूठा तबस्सुम आँखों में है नकली प्यार… ग़ज़ल विजयसिंह गहलोत साकित ने पढ़ी तो बदरा के झुण्ड और चपला की धारियां… गीत डॉ. आर. पी. तिवारी ने सुनाकर वाहवाही पायी। किसी दुश्मन को भी ऐसी सज़ा न मिले, बुजुर्गों में रहे और दुआ न मिले… ग़ज़ल शायर आरिफ़ अफ़ज़ल ने पढ़ी। आशीष अश्क ने किसी गुत्थी को सुलझाने के बदले, ये जीवन और उलझाने लगा है…ग़ज़ल पढ़ी। लफ़्ज़ों के माने गुम हुए, रस्मो रिवाज़ पुराने गुम हुए ग़ज़ल डॉ. विजय सुखवानी ने तो गुनाह करके भी उसको कोई मलाल नहीं, फिर उसके वास्ते माफ़ी का भी सवाल नहीं… ग़ज़ल डॉ. अखिलेश चौरे ने पढ़ी। कार्यक्रम का समापन गंगा नंदिनी के भजन काया घार से काची, जैसे ओस रा मोती… कार्यक्रम में विनोद काबरा, शैलेश मिश्र आदि ने भी अपनी कविताएँ पढ़ीं। आभार डॉ. सखा पाहवा ने ज्ञापित किया।
