मुंबई, महाराष्ट्र परम् सन्त बाबा उमाकान्त जी महाराज ने सतसंग में कहा कि गुरु महाराज ने बहुत से लोगों को उपदेश किया और उसी उपदेश के द्वारा लोगों को हर तरह की जानकारी हुई। हर तरह से लोगों में बदलाव हुआ और जब उन्होंने बताया कि इस तरह से लोगों के कर्म कटेंगे तब बताए अनुसार करने से लोगों के कर्म कटे और फिर गुरु महाराज अपना काम करके चले गए। वे जिस काम के लिए इस धरती पर आए थे, वह काम करके चले गए।
जाना उनका जरूरी नहीं था लेकिन चूंकि इस धरती पर मनुष्य शरीर में आए हुए थे और इस धरती का यह नियम है कि यहां जो पेड़ फलता है वह झड़ता है, जो आग जलती है वह बुझती है और जो पैदा होता है वह मरता है। तो इसी मृत्यु लोक के नियम के अंतर्गत वे चले गए, लेकिन जो वे बता कर गए वह महामंत्र रहा। सन्त महामंत्र दे कर चले जाते हैं और उससे जब लोगों को फायदा होने लग जाता है, तब लोगों को विश्वास हो जाता है।
मंत्र और महामंत्र क्या होता है?
एक होता है ‘मंत्र’; जैसे किसी को बिच्छू ने डंक मार दिया तो उसको मंत्र के द्वारा, मुंह से फूंक कर के उसके जहर को उतार देते हैं। कई लोग भूत-प्रेत उतार देते हैं मंत्र के द्वारा; यह जो वेदों और शास्त्रों में लिखा हुआ है कि इसके पढ़ने से यह उतर जाता है, यह तकलीफ दूर होती है, तो वह तो होता है ‘मंत्र’।
एक होता है ‘महामंत्र’; जिस मंत्र को देवी और देवता भी याद करते हैं, वह कहलाता है ‘महामंत्र’। उस मंत्र को भी जगाया जाता है, लेकिन उस मंत्र को कौन जगाता है? देवी-देवता जगाते हैं, ब्रह्मा विष्णु और महेश जगाते हैं, वे उस मंत्र को याद करते हैं;
“महामंत्र मन-विष के ब्याल को,
मेटे कठिन कुअंक भाल को।”
