काल की सीमा से नहीं बंधते हैं महाकवि कालिदास – प्रो शर्मा

उज्जैन ,  देश की प्रतिष्ठित संस्था राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना द्वारा वर्तमान परिप्रेक्ष्य में महाकवि कालिदास की समग्र दृष्टि पर केंद्रित अंतरराष्ट्रीय वेब संगोष्ठी का आयोजन किया गया, जिसमें देश – दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञ वक्ताओं और साहित्यकारों ने भाग लिया।  कार्यक्रम के प्रमुख अतिथि वक्ता विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन के पूर्व कुलपति प्रो बालकृष्ण शर्मा थे। विशिष्ट वक्ता विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन के हिंदी विभागाध्यक्ष एवं कुलानुशासक प्रो शैलेंद्र कुमार शर्मा थे। संगोष्ठी के विशिष्ट अतिथि प्रसिद्ध प्रवासी साहित्यकार सुरेशचंद्र शुक्ल शरद आलोक, ओस्लो, नॉर्वे, डॉ कौशल किशोर पांडेय, इंदौर, श्रीमती सुवर्णा जाधव, मुंबई, वरिष्ठ साहित्यकार श्री हरेराम वाजपेयी, इंदौर, डॉ शहाबुद्दीन नियाज मोहम्मद शेख, पुणे, महासचिव डॉ प्रभु चौधरी एवं उपस्थित वक्ताओं ने विचार व्यक्त किए। कार्यक्रम की अध्यक्षता संस्था अध्यक्ष श्री ब्रजकिशोर शर्मा, उज्जैन ने की। यह संगोष्ठी अखिल भारतीय कालिदास समारोह की पूर्व पीठिका के रूप में आयोजित की गई थी।
संगोष्ठी को संबोधित करते हुए पूर्व कुलपति प्रो बालकृष्ण शर्मा ने कहा कि महाकवि कालिदास अद्वितीय महाकवि हैं। टीकाकारों और समीक्षकों ने महाकवि की प्रशंसा करते हुए उनके साहित्य की अपार संभावनाओं की ओर संकेत किया है। महाकवि कालिदास का काव्य श्रेष्ठ बुद्धि वाले लोगों द्वारा अनुभवगम्य है। इसलिए उसकी व्याख्या या आस्वाद कोई सामान्य व्यक्ति नहीं ले सकता। भगवान विष्णु का विराट स्वरूप हर कोई नहीं देख सकता, केवल उनकी कृपा से अर्जुन ही उसका साक्षात्कार कर सके थे। इसी प्रकार कालिदास अर्थ गाम्भीर्य के कवि हैं। उन्हें कोई सामान्य व्यक्ति ग्रहण नहीं कर सकता। कालिदास दिव्य कवि हैं, वे काल की सीमा से नहीं बंधते हैं। वे जितने अपने समय में प्रासंगिक थे, उससे अधिक आज प्रासंगिक हैं। कालिदास का संकेत है कि कोई शस्त्र या शक्ति का प्रयोग तभी किया जाए, जब निर्बलों की रक्षा करनी हो। वे संकेत देते हैं कि जब आप किसी से परिचय बनाते हैं और बिना परीक्षण के प्रगाढ़ सम्बन्ध बना लेते हैं, इस प्रकार के अज्ञात हृदय से मित्रता श्रेयस्कर नहीं होती। उनके काव्य में जनमंगल की भावना है। उन्होंने अपने नाटकों के भरतवाक्य में विश्व मंगल की कामना की है। हम दुर्गम स्थितियों से मुक्त हो जाएं और सभी लोग सभी स्थानों पर प्रसन्न हों, यह उदात्त भावना कालिदास की है।
विशिष्ट वक्ता लेखक एवं संस्कृतिविद् प्रो शैलेंद्र कुमार शर्मा ने कहा कि महाकवि कालिदास जीवन की समग्रता के कवि हैं। उनका साहित्य हमारी शाश्वत मूल्य दृष्टि, जातीय स्मृतियों, परंपराओं और इतिहास के अनेक महत्वपूर्ण पहलुओं से साक्षात्कार का अवसर देता है। क्या व्यक्ति और परिवार जीवन, क्या समाज जीवन, क्या राष्ट्र जीवन और क्या विश्व जीवन –  महाकवि की दृष्टि से कुछ भी ओझल नहीं है। इसीलिए दार्शनिक एवं काव्यशास्त्री आचार्य आनंदवर्धन की निगाह जब कालिदास पर जाती है तो उन्हें प्रतीत होता है कि इस संसार में अब तक की जो विचित्र कवि परंपरा है, उसमें कालिदास जैसे दो या तीन या पांच कवियों की ही गणना की जा सकती है। रघुवंश में महाकवि ने रघुकुल के राजाओं की महिमा एवं उनके वैशिष्ट्य का वर्णन करने के बहाने केवल राजन्य वर्ग ही नहीं, प्राणिमात्र के लिए सार्वभौमिक प्रादर्शों को प्रस्तुत किया हैं। उन्होंने भारत के भूगोल और निसर्ग वैभव का मनोरम चित्र उकेरा है, जो उनकी व्यापक दृष्टि का परिचायक है। वे भूमि के साथ निवासी और संस्कृति के चितेरे हैं और इन तीनों के समुच्चय से ही राष्ट्र बनता है। कालिदास हिमालय से लेकर विंध्य और वहां से लेकर सागर पर्यंत अविच्छिन्न राष्ट्रीयता के संपोषक हैं। दिलीप, रघु, दशरथ और राम जैसे शासक उनके लिए आदर्श हैं, जो सदैव  प्रजाहित में  लीन रहते हैं और राष्ट्र को भय, अनाचार, आधि – व्याधि रहित बनाए रखते हैं। परोपकार, तप और त्याग में लीन चरित्रों के सरस अंकन से कालिदास की रचनाओं में सबका मन रम जाता है।
कार्यक्रम में प्रसिद्ध प्रवासी साहित्यकार एवं अनुवादक श्री सुरेशचंद्र शुक्ल शरद आलोक, ओस्लो, नार्वे ने नॉर्वेजियन भाषा में कालिदास कृत मेघदूत के चुनिंदा का अंशों का अनुवाद प्रस्तुत किया। उनका यह अनुवाद स्कैंडिनेवियन भाषाओं के मध्य कालिदास साहित्य का प्रथम अनुवाद है।
विशिष्ट अतिथि संस्कृतविद डॉ कौशल किशोर पांडेय, इंदौर ने कहा कि कालिदास की दृष्टि में पार्वती और परमेश्वर दोनों परस्पर संपृक्त हैं। उनकी दृष्टि में गृहिणी सखी भी है। यह बात आज भी प्रासंगिक है। कालिदास संकेत करते हैं कि शरीर धर्म के लिए प्रथम साधन है।  यह बात कोरोना संकट के दौर में स्पष्ट रूप से सिद्ध हो गई है। योगसाधना और गौ सेवा की उपादेयता को उन्होंने सदियों पहले प्रतिपादित किया था।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए संस्था अध्यक्ष श्री ब्रजकिशोर शर्मा ने कहा कि वर्तमान का चित्र सभी कविगण करते हैं, किंतु आगामी काल की स्थितियों को जो प्रत्यक्ष कर देता है, वह कालजयी कवि होता है। कालिदास इसी प्रकार के कालजयी कवि हैं। रवींद्रनाथ टैगोर, दिनकर आदि की कविताओं पर कालिदास का गहरा प्रभाव दिखाई देता है। महाकवि कालिदास की कविता विराट वेदना को प्रत्यक्ष करती है। उनकी कविताओं को पढ़कर प्रत्येक व्यक्ति का मन नर्तन करने लग जाता है।
वरिष्ठ साहित्यकार श्री हरेराम वाजपेयी, इंदौर ने कहा कि महाकवि कालिदास का उज्जयिनी से गहरा संबंध है। उनके जैसा उपमा का कोई दूसरा कवि नहीं हुआ।
संस्था की कार्यकारी अध्यक्ष श्रीमती सुवर्णा जाधव, मुम्बई ने कहा कि कालिदास भारतीय संस्कृति के जनकवि हैं। उनके काव्य में उदात्त नैतिकता और मर्यादा का अंकन हुआ है। कालिदास का कहना है कि सद् कर्मों से मानव भी देवता हो सकता है, किंतु असद् कर्मों से देवता को भी धरती पर आना पड़ता है।
प्रारंभ में संगोष्ठी की पूर्व पीठिका शिक्षाविद डॉक्टर शहाबुद्दीन नियाज मोहम्मद शेख, पुणे ने प्रस्तुत की।
संगोष्ठी की संकल्पना, संस्था की गतिविधियों का प्रतिवेदन एवं अतिथि परिचय राष्ट्रीय महासचिव श्री प्रभु चौधरी ने प्रस्तुत किया। संस्था का परिचय डॉ मुक्ता कौशिक, रायपुर ने दिया।
सरस्वती वंदना साहित्यकार डॉ पूर्णिमा कौशिक, रायपुर ने की। स्वागत भाषण डॉ लता जोशी, मुंबई ने दिया।
कार्यक्रम में डॉक्टर मुक्ता कौशिक, रायपुर, डॉ रश्मि चौबे, गाजियाबाद, डॉ पूर्णिमा कौशिक, रायपुर, डॉक्टर लता जोशी, मुंबई, डॉ आशीष नायक, रायपुर, डॉ मनीषा सिंह, मुंबई, डॉक्टर ममता झा, मुंबई, डॉक्टर रोहिणी डाबरे, अहमदनगर, प्रो बीएल आच्छा, चेन्नई, डॉक्टर संगीता पाल, कच्छ, डॉ समीर सैयद, डॉ ललिता घोड़के, डॉ अनिल काले, डॉ श्वेता पंड्या, उज्जैन, डॉ शिवा लोहारिया, जयपुर, डॉ दर्शनसिंह रावत, जयपुर आदि सहित अनेक प्रतिभागी उपस्थित थे।
कार्यक्रम का संचालन संस्था की डॉ मनीषा सिंह, मुंबई ने किया। आभार प्रदर्शन डॉ रश्मि चौबे, गाजियाबाद ने किया।