खुशहाल माता-पिता हमारा संकल्प हो

विश्व अभिभावक दिवस 1 जून को मनाया जाता है। यह अभिभावकों को सम्मान देने का दिन है, विश्वभर के उन अभिभावक जो अपने बच्चों के प्रति निस्वार्थ भाव से समर्पित हंै तथा जीवनभर त्याग करते हुए बच्चों का पालन-पोषन करते हैं। बच्चों की सुरक्षा, विकास व समृद्धि के बारे में सोचते हैं। इस दिवस का महत्व इसलिये भी है कि जहां यह अभिभावकों के प्रति सम्मान प्रकट करने की जागरूकता का वातावरण निर्मित करता है, वहीं माता-पिता को बच्चों के उन्नत भविष्य के लिये संकल्पित होने को भी प्रतिबद्ध करता है।

ललित गर्ग

अभिभावकों को बचपन की विडम्बनाओं एवं विसंगतियों से जुड़ी त्रासदियों को समाप्त करना चाहिए। ऐसा इसलिये भी जरूरी है कि बच्चों को देश का भविष्य माना जाता है। इस दिवस को मनाने का मुख्य उद्देश्य यही है कि सभी अभिभावक बच्चों के प्रति जागरूक बने, अपने बच्चों को सही दिशा में सही शिक्षा एवं संस्कार दे, उनको शोषण एवं अपराधमुक्त परिवेश दे, उनकी प्रतिभा को उभारने का अवसर दे ताकि एक सुव्यवस्थित और सम्पन्न राष्ट्र का निर्माण हो सके जो की बच्चों के अच्छे भविष्य पर ही निर्भर करता है। लेकिन आज का बचपन केवल अपने घर में ही नहीं, बल्कि स्कूली परिवेश एवं समाज में दबाव एवं हिंसा का शिकार है। यह सच है कि इसकी टूटन का परिणाम सिर्फ आज ही नहीं होता, बल्कि युवावस्था तक पहुंचते-पहुंचते यह एक महाबीमारी एवं त्रासदी का रूप ले लेता है। यह केवल भारत की नहीं, बल्कि दुनिया की एक बड़ी समस्या है।

बात केवल बच्चों की ही नहीं है बल्कि विश्व में अभिभावकों के साथ होने वाले अन्याय, उपेक्षा और दुव्र्यवहार पर लगाम लगाने की भी है। प्रश्न है कि दुनिया में अभिभावक दिवस मनाने की आवश्यकता क्यों हुई? क्यों अभिभावकों की उपेक्षा एवं प्रताड़ना की स्थितियां बनी हुई है? चिन्तन का महत्वपूर्ण पक्ष है कि अभिभावकों की उपेक्षा के इस गलत प्रवाह को कैसे रोके। क्योंकि सोच के गलत प्रवाह ने न केवल अभिभावकों का जीवन दुश्वार कर दिया है बल्कि आदमी-आदमी के बीच के भावात्मक फासलों को भी बढ़ा दिया है। विचारणीय है कि अगर आज हम माता-पिता का अपमान करते हैं, तो कल हमें भी अपमान सहना होगा। समाज का एक सच यह है कि जो आज जवान है उसे कल माता-पिता भी होना होगा और इस सच से कोई नहीं बच सकता। हमें समझना चाहिए कि माता-पिता परिवार एवं समाज की अमूल्य विरासत होते हैं। आखिर आज के माता-पिता अपने ही घर की दहलीज पर सहमे-सहमे क्यों खड़े हैं, उनकी आंखों में भविष्य को लेकर भय क्यों हंै, असुरक्षा और दहशत क्यों हंै, दिल में अन्तहीन दर्द क्यो है? इन त्रासद एवं डरावनी स्थितियों से माता-पिता को मुक्ति दिलानी होगी। सुधार की संभावना हर समय है। हम पारिवारिक जीवन में माता-पिता को उचित सम्मान दें, इसके लिये सही दिशा में चले, सही सोचें, सही करें। इसके लिये आज विचारक्रांति ही नहीं, बल्कि व्यक्तिक्रांति की जरूरत है।

विश्व में इस दिवस को मनाने के तरीके अलग-अलग हो सकते हैं, परन्तु सभी का मुख्य उद्देश्य यह होता है कि वे अपने माता-पिता के योगदान को न भूलें और उनको अकेलेपन की कमी को महसूस न होने दें। हमारा भारत तो माता-पिता को भगवान के रूप में मानता है। इतिहास में अनेकों ऐसे उदाहरण है कि माता-पिता की आज्ञा से भगवान श्रीराम जैसे अवतारी पुरुषों ने राजपाट त्याग कर वनों में विचरण किया, मातृ-पितृ भक्त श्रवण कुमार ने अपने अन्धे माता-पिता को काँवड़ में बैठाकर चारधाम की यात्रा कराई। फिर क्यों आधुनिक समाज में माता-पिता और उनकी संतान के बीच दूरियां बढ़ती जा रही है। आज के माता-पिता समाज-परिवार से कटे रहते हैं और सामान्यतः इस बात से सर्वाधिक दुःखी है कि जीवन का विशद अनुभव होने के बावजूद कोई उनकी राय न तो लेना चाहता है और न ही उनकी राय को महत्व देता है। समाज में अपनी एक तरह से अहमितय न समझे जाने के कारण हमारे माता-पिता दुःखी, उपेक्षित एवं त्रासद जीवन जीने को विवश है। माता-पिता को इस दुःख और कष्ट से छुटकारा दिलाना आज की सबसे बड़ी जरूरत है।

भारत में अभिभावकों की सेवा और उनकी रक्षा के लिए कई कानून और नियम बनाए गए हैं। 2007 में माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण विधेयक संसद में पारित किया गया है। इसमें माता-पिता के भरण-पोषण, वृद्धाश्रमों की स्थापना, चिकित्सा सुविधा की व्यवस्था और वरिष्ठ नागरिकों के जीवन और संपत्ति की सुरक्षा का प्रावधान किया गया है। लेकिन इन सब के बावजूद हमें अखबारों और समाचारों की सुर्खियों में माता-पिता की हत्या, लूटमार, उत्पीड़न एवं उपेक्षा की घटनाएं देखने को मिल ही जाती है। आज हम माता-पिता के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वाह करने के साथ-साथ समाज में उनको उचित स्थान देने की कोशिश करनी होगी ताकि उम्र के उस पड़ाव पर जब उन्हे प्यार और देखभाल की सबसे ज्यादा जरूरत होती है तो वो जिंदगी का पूरा आनंद ले सके। अभिभावकों को भी अपने स्वयं के प्रति जागरूक होना होगा, जैसाकि जेम्स गारफील्ड ने कहा भी है कि यदि वृद्धावस्था की झूर्रियां पड़ती है तो उन्हें हृदय पर मत पड़ने दो। कभी भी आत्मा को वृद्ध मत होने दो।’

बच्चों एवं अभिभावकों के बीच सुदीर्घ एवं तनावरहित प्रगाढ़ संबंधों की संरचना के लिये अभिभावक एवं बच्चे में सुसंवाद होना आवश्यक है। स्वयं तनावमुक्त अभिभावक ही अपने बच्चों को तनावमुक्त जीवन जीने की सीख दे सकते हैं। बच्चों के साथ बातें करते समय निरंतर सकारात्मक रहना चाहिए। आप निरंतर बच्चों के गुण देखें एवं उनसे लाड-प्यार के साथ अपेक्षारहित व्यवहार करें। इससे बच्चे अपने दोष स्वीकार कर उन्हें दूर करने हेतु प्रयास करते हैं परंतु अधिकांश अभिभावक बच्चों को निरंतर दोष ही दिखाते हैं। अपने बच्चे की प्रकृति कौनसी है, उसकी रुचि, शक्ति, शारीरिक एवं मानसिक क्षमता-इन सभी का विचार अभिभावकों द्वारा होना ही चाहिए। वर्तमान में बच्चों की समस्या सुनने वाला कोई भी नहीं होता। अभिभावक कहते हैं, ‘हम व्यस्त हैं’, तो अध्यापक कहते हैं, ‘हमें हमारा अभ्यासक्रम पूरा करना है।’ अतएव वर्तमान में अधिकतर बच्चों के मानसिक विकास की गति में अवरोध होता है, इसलिए अभिभावकों के प्रति बच्चों के मन में आदर एवं विश्वास का अभाव रहता है तथा बच्चे सुनते नहीं हैं, इससे अभिभावकों के मन पर तनाव आता है। प्रतिदिन बच्चों के साथ भले ही न्यूनतम 15 मिनट ही हो, अनौपचारिक बातें करना चाहिए। वृद्धावस्था में पुत्र मेरी सेवा एवं देखभाल करेगा, समाज में मेरी प्रतिष्ठा रहेगी एवं उसमें वृद्धि होगी, ऐसी अपेक्षा करने की अपेक्षा ‘ईश्वर मेरी देखभाल करेंगे’, ऐसा विचार करना उचित होगा। क्योंकि अपेक्षापूर्ण व्यवहार तनाव का कारण बनता है एवं अपेक्षारहित व्यवहार आनंद का सृजन करता है।

तथाकथित व्यक्तिवादी एवं सुविधावादी सोच ने समाज की संरचना को बदसूरत बना दिया है। सब जानते हैं कि आज हर इंसान समाज में खुद को बड़ा दिखाना चाहता है और दिखावे की आड़ में माता-पिता उसे अपनी शान-शौकत एवं सुंदरता पर एक काला दाग दिखते हैं। आज बन रहा समाज का सच डरावना एवं संवेदनहीन है। आदमी जीवनमूल्यों को खोकर आखिर कब तक धैर्य रखेगा और क्यों रखेगा जब जीवन के आसपास सबकुछ बिखरता हो, खोता हो, मिटता हो और संवेदनाशून्य होता हो। डिजरायली का मार्मिक कथन है कि यौवन एक भूल है, पूर्ण मनुष्यत्व एक संघर्ष और वार्धक्य एक पश्चाताप।’ माता-पिता के जीवन को पश्चाताप का पर्याय न बनने दे। आज माता-पिता को अकेलापन, परिवार के सदस्यों द्वारा उपेक्षा, तिरस्कार, कटुक्तियां, घर से निकाले जाने का भय या एक छत की तलाश में इधर-उधर भटकने का गम हरदम सालता रहता। अभिभावकों को लेकर जो गंभीर समस्याएं आज पैदा हुई हैं, वह अचानक ही नहीं हुई, बल्कि उपभोक्तावादी संस्कृति तथा महानगरीय अधुनातन बोध के तहत बदलते सामाजिक मूल्यांे, नई पीढ़ी की सोच में परिवर्तन आने, महंगाई के बढ़ने और व्यक्ति के अपने बच्चों और पत्नी तक सीमित हो जाने की प्रवृत्ति के कारण बड़े-बूढ़ों के लिए अनेक समस्याएं आ खड़ी हुई हैं। इसीलिये सिसरो ने कामना करते हुए कहा था कि जैसे मैं वृद्धावस्था के कुछ गुणों को अपने अन्दर समाविष्ट रखने वाला युवक को चाहता हूं, उतनी ही प्रसन्नता मुझे युवाकाल के गुणों से युक्त वृद्ध को देखकर भी होती है, जो इस नियम का पालन करता है, शरीर से भले वृद्ध हो जाए, किन्तु दिमाग से कभी वृद्ध नहीं हो सकता।’ अभिभावकों के लिये यह जरूरी है कि वे वार्धक्य को ओढ़े नहीं, बल्कि जीएं। मोदी सरकार के दूरदर्शी नारे “सबका साथ, सबका विकास एवं सबका विश्वास’’ की गूंज और भावना अभिभावकों के जीवन में उजाला बने, तभी नया भारत निर्मित होगा।