लोक बोलियां भारत माता की आवाज है मातृभाषा को अपनाना भी स्वदेशी का संकल्प है

उज्जैन। हमारी बोलियां संरक्षित नहीं रहेगी तो संस्कृति का पतन होगा। बोलियां ही संस्कृति को संरक्षित करती है। लोक बोली और मातृभाषा के लिए जो लोग कार्य कर रहे है उनको प्रोत्साहन मिलना चाहिए, शासन और समाज दोनों को सहयोग करना चाहिए। मॉ के जैसी ही मातृभाषा है। मॉ और मातृभाषा का सम्मान हमेशा करना चाहिए। मातृभाषा को अपनाना भी स्वदेशी का संकल्प है।

यह बात स्वस्तिक पीठाधीश्वर संत डॉ. अवधेशपुरी जी महाराज ने संवाद शोध संस्थान के तत्वावधान में 5 सितम्बर को शिक्षक दिवस पर आयोजित लोक संवाद मंच के उद्घाटन अवसर पर नीलगंगा स्थित श्री धाम पर कही।

आयोजन की अध्यक्षता कर रहे विक्रम विश्वविद्यालय के कुलानुशासक डॉ शैलेन्द्रकुमार शर्मा ने कहा कि लोक बोलियां भारत माता की आवाज है। लोक बोलियों को जो प्रोत्साहन देते है वो सच्चे अर्थो मे भाषा के लिए कार्य कर रहे है। बोलियां और उप बोलियां एक जगह होगी तो ही नई शिक्षा नीति सफल होगी। मातृभाषा में शिक्षण सामग्री के लिए काम करना होगा। लोक भाषाओं मे अपार ज्ञान संपदा है जो उपेक्षा के कारण नष्ट हो रही है । ऐसे समय में जो काम संवाद शोध संस्थान कर रहा है वह सराहनीय है, यह एक अवसर है चुनौती नहीं। पश्चिम की शिक्षानीति से जो आत्म गौरव खो गया है उसे जगाने का अवसर है लोक भाषा को प्रोत्साहन देना। लोक साहित्य और कलाकारों को समाज का संरक्षण जरुरी है लोक कलाकारों को बड़े कलाकारों जैसा सम्मान मिलना चाहिए। भारत माता लोकवाणी को सुनती है हिंदी से पहले जनजातीय भाषा को महत्व देना होगा। संस्कृति भाषा से संरक्षित होती है साहित्य से प्रसारित होती है।

इस अवसर पर संस्था द्वारा समाज और शिक्षा के श्रेत्र में अपनी उल्लेखनीय सेवा देने के लिए परमहंस डॉ अवधेशपूरीजी महाराज, डॉ शैलेन्द्रकुमार  शर्मा, डॉ. श्रीकृष्ण जोशी, श्री राधेश्याम जी शर्मा, वैद्य संत श्री मनोहर रावल का सारस्वत सम्मान किया गया।

कार्यक्रम के प्रारम्भ में सरस्वती वंदना सुनीता राठौर ने प्रस्तुत की, स्वागत उद्बोधन अनिल पांचाल ने दिया। संस्था के कार्यकलापों का परिचय उपाध्यक्ष संदीप सृजन ने दिया। संचालन संस्था अध्यक्ष डॉ राजेश रावल सुशील ने किया ।

इस अवसर पर लोकभाषा केन्द्रीत मासिक काव्य गोष्ठी की शुरुआत की गई। अक्टूबर माह से प्रत्येक माह के अंतिम रविवार को यह गोष्ठी होगी। जिसमें मालवी, निमाड़ी, अवधी, बुंदेली, बघेली, बंगाली, गुजराती, मराठी आदि भाषाओं के कवि/लेखक अपनी रचनाओं का पाठ कर सकेंगे। पहली गोष्ठी में कवि डॉ विक्रम विवेक, राजेन्द्र जैन, अनिल पांचाल, सुरेन्द्र सत्संगी, डॉ मोहन बैरागी,गौरीशंकर उपाध्याय, अक्षय चवरे,  डॉ. पी.डी. शर्मा, खुबचंद कलमोदिया ,महेन्द्र देथलिया, आरती पांचाल, दौलतसिंह दरबार, अनिल पांचाल, रुचिरप्रकाश निगम, अनिता सोहनी, नंदकिशोर पांचाल, सत्यनारायण नाटानी, दिनेश पंड्या ने रचना पाठ किया। कवि गोष्ठी का संचालन हाकम पांचाल ‘अनुज’ ने किया। आभार गौरीशंकर उपाध्याय उदय ने व्यक्त किया।