आयुर्वेद कोरोना व्याधि से मुक्ति देने में सक्षम

भारतभूमि अनादिकाल से आयुर्वेद भूमि के रूप में विख्यात रही है। यहां का कण-कण, अणु-अणु में हर तरह की बीमारी को स्वस्थ करने वाले गुणों वाली औषधियां व्याप्त है। हमारे देश में आयुर्वेद में गंभीर से गंभीर बीमारी का इलाज है। कोरोना संक्रमण से जूझने के लिए आयुर्वेद में भी कई औषधियां मौजूद हैं। ये औषधियां किसी साइड इफेक्ट के बगैर प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाती हैं, जो कोरोना जैसी गंभीर बीमारी से लड़ने के लिए आवश्यक है। आयुष मंत्रालय के तहत हुए कुछ प्रयोगों के दौरान देखा गया कि जिन लोगों ने क्वारंटीन की अवधि में कम-से-कम सात दिन आयुर्वेदिक या होम्योपैथिक दवा ली, उन सभी मरीजों में संक्रमण नहीं बढ़ा और वे रोगमुक्त हो गए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी ‘मन की बात’ में हाल ही इनोवेटिव इंडिया मुहिम से जोड़कर परंपरागत आयुर्वेद ज्ञान, उपचार एवं प्रयोग को बढ़ावा देने पर जोर दिया था। आयुष मंत्रालय के शोधों में सामने आ रहे उत्साहजनक नतीजों ने उम्मीद की किरण दिखाई है। सचमुच आयुर्वेद वर्तमान की सबसे बड़ी जरूरत है। लोगों का जीवन स्वस्थ  हो, इसी से कोरोना कहर को रोका जा सकता है।

ललित गर्ग

दुनियाभर में कोरोना के इलाज को लेकर तरह-तरह के शोध जारी है। चिकित्सा-वैज्ञानिक लैब में लगातार अनुसंधान में जुटे हैं। इन सबके बीच भारतीय आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति भी अपनी जड़ी-बूटियों के साथ शोध, उपचार एवं प्रयोग में लगी हुई है। इसके प्रयोग एवं उपचार से कोरोना रोगियों के स्वस्थ होने के अनेक मामलों न केवल चैंकाया है बल्कि दुनिया में इसके प्रति आशा जगाई है। इनदिनों अमेरिका, यूरोप और रूस में रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने के लिये करक्यूमिन-युक्त हल्दी, अश्वगंधा, आमला ( आमलकी ) ओजस पुष्टि, च्यवनप्राश आदि की मांग बहुत बढ़ी है। यूरोप के कई देशों में तो एलोपैथ के डाॅक्टर अंग्रेजी दवा के साथ-साथ आयुर्वेदिक दवा मरीजों को लेने की सलाह देते रहे हैं। इस कोरोना महाव्याधि के दौर में डाॅक्टरों की सलाह पर विदेशी लोग आयुर्वेद की दवाओं को ढूंढ़ रहे हैं। दिल्ली, गुजरात, उत्तर प्रदेश, गोवा एवं राजस्थान के सरदारशहर में कोरोना संक्रमण से पीड़ित मरीज आयुर्वेदिक औषधियों से स्वस्थ हो रहे हैं।

इसी आयुर्वेद चिकित्सा से जब गोवा में सभी कोरोना मरीजों के ठीक होने एवं एक भी मरीज न होने की गोवा सरकार की घोषणा को सुना तो समूचे देश को आश्चर्य हुआ। वहां के डाॅक्टरों ने अंग्रेजी दवाओं के साथ आयुर्वेदिक औषधियों से यह कमाल कर दिखाया। गुजरात में भी आयुर्वेद चिकित्सा एवं औषधियों से लगभग 8 हजार रोगी ठीक हुए, जिन्हें संशमनी बटी, दशमूल क्वाथ, त्रिकटु चूर्ण और हल्दी आदि आयुर्वेद औषधियां दी गयी। उत्तर प्रदेश के 179 केन्द्रोें पर 6,210 कोरोना वायरस पीड़ितों को आयुर्वेदिक औषधियां सफलतापूर्वक दी गई और उनके कोरोना रोग को समाप्त करने में सकारात्मक प्रभाव रहा है। यहां पर आयुर्वेद और योग चिकित्सा पद्धति को स्थापित करने के लिये ‘आयुष कवच’ भी शुरू किया गया है।

राजस्थान के सरदारशहर में गांधी विद्या मन्दिर आयुर्वेद महाविद्यालय में 6000 कोरोना संग्दिधों की स्वास्थ्य जांच- स्क्रीनिंग आयुर्वेद पद्धति से की गयी। विश्वविद्यालय के कुलाधिपति कनकमल दुगड़ के अनुसार कोरोना रोगियों को इम्युनिटीवर्धक तुलसी, गिलोय, त्रिकटु, जायफल, जावित्री, दालचीनी, इलायची आदि एवं पौष्टिक रसायनों का नित्य सेवन कराया गया है। भारत के आयुष मंत्रालय ने रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने तथा अपनी श्वसन मंत्र को मजबूत करने के लिये लोगों को आयुर्वेद की औषधियां लेने का परामर्श  दिया है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन और केंद्रीय आयुष मंत्री श्रीपद येसो नाईक ने संजीवनी मोबाइल एप को भी लॉन्च किया है, जिसके जरिए ज्यादा-से-ज्यादा लोगों से संपर्क बनाकर आयुर्वेद को आगे बढ़ाये जाने के उपक्रम किये जा रहे हैं। आयुर्वेद एवं एलोपैथ की यह संधि कोरोना व्याधि को भगाने में सक्षम हो रही है, यह एक बड़ी उपलब्धि है। यदि इन दोनों चिकित्सा पद्धतियों का इसी तरह समन्वय रहा तो भारत एक बार फिर से योग एवं अहिंसा की भांति आयुर्वेद के माध्यम विश्व गुरु बनने की दिशा में सार्थक मुकाम हासिल कर सकेगा।

बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. केएन द्विवेदी ने भी स्वीकार किया है कि कोविड 19 के इलाज के लिये हमें अपने परंपरागत चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद का इस्तेमाल करना चाहिए। उनकी इंसानों पर फीफाट्रोल का ट्रायल करके कोरोना वायरस का आयुर्वेदिक उपचार की संभावना पर काम करने की योजना है। उन्होंने एमिल फॉर्मास्युटिकल के सहयोग से इस रिसर्च का प्रस्ताव टास्क फोर्स को भेजा हैै। इस प्रस्ताव में लिखा है कि फीफाट्रोल से 13 जड़ी बूटियों से तैयार एंटी- माइक्रोबियल एक औषधीय फार्मूला है, जिसमें शामिल पांच प्रमुख बूटियों में सुदर्शन वटी, संजीवनी वटी, गोदांती भस्म, त्रिपुवन कीर्ति रस और मृृत्युंजय रस शामिल है। जबकि आठ औषधियों के अंश तुलसी, कुटकी, चिरयात्रा, मोथा, गिलोय, दारुहल्दी, करंज के अलावा अप्पामार्ग मिलाए गए हैं। इस फीफाट्रोल पर अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) भी अध्ययन कर चुका है, जिसमें यह दवा आयुर्वेदिक एंटीबायोटिक के रूप में साबित हुई है। शोध के दौरान बैक्टीरिया संक्रमण रोकने में यह कारगर मिली। रोग प्रतिरोधक क्षमता को बूस्ट करने में यह सहायक है।

आयुर्वेद चिकित्सा की यह मंदाकिनी न कभी भारत में अवरुद्ध हुई है और न ही कभी अवरुद्ध होगी। इसी आयुर्वेद मंदाकिनी से आज समूचा विश्व आप्लावित होने को आतुर है, निश्चित ही यह एक शुभ संकेत है सम्पूर्ण मानवता के लिये। आज विश्व स्तर पर आयुर्वेद चिकित्सा जितनी महत्वपूर्ण हो उठी है, इससे पहले यह कभी इतनी महत्वपूर्ण नहीं रही। अगर लोगों ने अपने स्वास्थ्य का, स्वास्थ्य के लियें आयुर्वेद का महत्व समझ लिया और उसे महसूस कर लिया तो दुनिया में रोग एवं उसके उपचार के प्रति नजरिया बदल जाएगा। चिकित्सा के प्रति अपने नजरिये में विस्तार लाने, व्यापकता लाने में ही कोरोना जैसी विश्वव्यापी व्याधि का समाधान है। आयुर्वेद को निजता से सार्वभौमिकता, सार्वदेशिकता या समग्रता की ओर ने चलना होगा। जो इस पूरी धरती पर निरोगी मानव और प्रभावी स्वास्थ्य पद्धति की लहर पैदा कर सकता है। हम भारतीयों के लिये यह गर्व का विषय होगा कि आयुर्वेद भारत की विश्व को एक महान देन होगी। जो आयुर्वेद भारतीयों के जीवन का एक अभिन्न अंग रहा है। लेकिन अब यह संपूर्ण विश्व का विषय एवं मानव मात्र के जीवन का अंग बन जायेगी।

भारतीय योग एवं आयुर्वेद विलक्षण रोग उपचार पद्धति है, जिसे इस प्रकार गूंथ दिया गया है कि शरीर की सुडौलता के साथ-साथ मानसिक एवं आध्यात्मिक प्रगति भी हो। शरीर की सुदृढ़ता के लिए आसन एवं दीर्घायु के लिए प्राणायाम को वैज्ञानिक ढंग से ऋषियों ने अनुभव के आधार पर दिया है, इससे व्यक्ति एक महान संकल्प लेकर उसे कार्यान्वित कर सकता है। अतः योग एवं आयुर्वेद इस जीवन में स्वस्थता, सुख और शांति देने में सक्षम है और रोग-मुक्ति का मार्ग भी प्रशस्त करता है। ‘कोरोना से मुक्ति-स्वस्थ जीवन की युक्ति’ -यही आयुर्वेद का उद्घोष हो, इसी से लोगों को नयी सोच मिलेगी, नया स्वास्थ्य -दर्शन मिलेगा।