क्षणिक नहीं शाश्वत वर्तमान को ढूंढे़ं

हर व्यक्ति अपने भाग्य का निर्माता स्वयं है, क्योंकि वह स्वयं में एक शक्ति होता है, संस्था होता है, मिशन होता है। लक्ष्य स्पष्ट हो, उसको पाने की तीव्र उत्कष्ठा एवं अदम्य उत्साह हो तो अकेला व्यक्ति भी बहुत कुछ कर सकता है। विश्वकवि रविंद्रनाथ टैगोर का यह कथन कितना सटीक है कि अस्त होने के पूर्व सूर्य ने पूछा कि मेरे अस्त हो जाने के बाद दुनिया को प्रकाशित करने का काम कौन करेगा। तब एक छोटा-सा दीपक सामने आया और कहा प्रभु! जितना मुझसे हो सकेगा उतना प्रकाश करने का काम मैं करूंगा। हम देखते हैं कि आखिरी बूंद तक दीपक अपना प्रकाश फैलाता रहता है। जितना तुम कर सकते हो उतना करो, फिर जो तुम नहीं कर सको, उसे परमात्मा करेगा। किसी ने कहा भी है-‘‘जीवन का जश्न मनाएं और जीवन आपका जश्न मनाएगा।’’क्षणिक नहीं शाश्वत वर्तमान की खोज जरूरी है।

ललित गर्ग

यह आवश्यक नहीं है कि सफलता प्रथम प्रयास में ही मिल जाए। जो आज शिखर पर पहुंचे हुए हैं वे भी कई बार गिरे हैं, ठोकर खाई है। उस शिशु को देखिए जो अभी चलना सीख रहा है। चलने के प्रयास में वह बार-बार गिरता है किंतु उसका साहस कम नहीं होता। गिरने के बावजूद भी प्रसन्नता और उमंग उसके चेहरे की शोभा को बढ़ाती ही है। जरा विचार करें उस नन्हें से बीज के बारे में जो अपने अंदर विशाल वृक्ष उत्पन्न करने की क्षमता समेटे हुए है। आज जो विशाल वृक्ष दूर-दूर तक अपनी शाखाएं फैलाएं खड़े हंै, जरा सोचो कितने संघर्षों, झंझावतों को सहन करने के बाद इस स्थिति में पहुंचे हैं। मारग्रेट शेफर्ड ने यह खूबसूरत पंक्ति कही है-‘‘कभी-कभी हमें सिर्फ विश्वास की एक छलांग की जरूरत होती है।’’

जो व्यक्ति आपत्ति-विपत्ति से घबराता नहीं, प्रतिकूलता के सामने झुकता नहीं और दुःख को भी प्रगति की सीढ़ी बना लेता है, उसकी सफलता निश्चित है। ऐसे धीर पुरुष के साहस को देखकर असफलता घुटने टेक देती है। इसीलिए तो इतरा पुत्र महीदास एतरेय ने कहा है-‘‘चरैवेति चरैवेति’’ अर्थात् चलते रहो, चलते रहो, निरंतर श्रमशील रहो। किसी महापुरुष ने कितना सुंदर कहा है-अंधकार की निंदा करने की अपेक्षा एक छोटी-सी मोमबत्ती, एक छोटा-सा दिया जलाना कहीं ज्यादा अच्छा होता है।

महापुरुष समझाते हैं कि व्यक्ति सफलता प्राप्ति के लिए पुरुषार्थ अवश्य करे लेकिन अति महत्वाकांक्षी एवं अहंकारी न बने। अति महत्वाकांक्षा एवं अहंकार का भूत विनाश का कारण बनता है, असंतोष तथा अशांति की अग्नि में भस्म कर देता है। किसी के हृदय को पीड़ा पहुंचाकर, किसी के अधिकारों को छीनकर प्राप्त की गई सफलता न तो स्थायी होती है और न ही सुखद। ऐसी सफलता का कोई अर्थ नहीं होता। अति महत्वाकांक्षी एवं अहंकारी व्यक्ति को हिटलर, नादिरशाह, चंगेज़ खां, तैमूरलंग, औरंगजेब, इदी अमीन तो बना सकती है किंतु सुख-चैन से जीने नहीं देती। दिन-रात भय और चिंता के वातावरण का निर्माण करती है और अंततः सर्वनाश का ही सबब बनती है। यही कारण है कि आधुनिक जीवन की एक बड़ी विसंगति है अहंकार एवं बड़ेपन की भावना। कितनी विचित्र बात है कि मनुष्य चाहकर भी अहं को झुका नहीं पाता। जानते हुए भी कि स्वयं को बड़ा मानने का अहं जीवन के हर मोड़ पर व्यक्ति को अकेला कर देता है, फिर भी वह अहं की पकड़ को ढ़ीली नहीं कर पाता।

हर मनुष्य में अहंकार की मनोवृत्ति होती है। वह दूसरे को नीचा दिखाकर अपने को ऊंचा दिखाना चाहता है। आदमी का सबसे बड़ा रस इस बात में होता है कि और सब छोटे बने रहें, मैं बड़ा बन जाऊं। कितना स्वार्थी एवं संकीर्ण बन गया इंसान कि उसे अपने सुख के सिवाय कुछ और दीखता ही नहीं। स्वयं की अस्मिता को ऊंचाइयां देने के लिये वह कितनों के श्रम का शोषण, भावनाओं से खिलवाड़ एवं सुख का सौदा करता है। उसकी अन्तहीन महत्वाकांक्षाएं प्राकृतिक पर्यावरण तक को जख्मी बना रही है। आखिर इस अनर्थकारी परम्परा एवं सोच पर कैसे नियंत्रण स्थापित हो?

चाहे पचास आदमियों पर हुकूमत करो और चाहे पचास हजार आदमियों पर हुकूमत करो। अन्ततः हुकूमत-हुकूमत होती है। उसकी सीमा तो है। कोई भी एक व्यक्ति ऐसा नहीं है जो समस्त विश्व पर शासन करता हो, सबकी सीमा है। आदमी जाने या न जाने, माने या न माने, कहे या न कहे, यह अहंकार प्रत्येक आदमी के अन्तःकरण में ऐसा प्रतिष्ठित है कि वह छूटता ही नहीं या कठिनाई से छूटता है। वह चाहता यही है कि मैं बड़ा रहूं, दूसरे छोटे रहें। यदि दूसरे छोटे न हों तो बड़ा बनने का अर्थ ही क्या रहा? तो फिर बहुत कुछ धन, पदार्थ, पद, सत्ता होने का भी अर्थ क्या है? यह एक कठिन समस्या है। इसी से जब सत्ता का अहं जागा तो विलासिता और क्रूरता आई। यौवन का अहं जागा तो अन्तहीन दुःखों का आह्वान मिला। ज्ञान का अहं जगा तो जीवन के आदर्शांे को बौना बनना पड़ा। शक्ति का अहं जागा तो युद्ध के खतरों ने भयभीत किया और समृद्धि का अहं जागा तो मनुष्य-मनुष्य के बीच असमानताएं आ खड़ी हुई।

इस तरह बहुत अधिक अहं का भाव हमारी दुनिया को छोटा करता रहा है। भीतर और बाहरी दोनों ही दुनिया सिमटती रही हैं। तब हमारा छोटा-सा विरोध गुस्सा दिलाने लगता है। छोटी-सी सफलता अहंकार बढ़ाने लगती है। थोड़ा-सा दुख अवसाद का कारण बन जाता है। कुल मिलाकर सोच ही गड़बड़ा जाती है। अमेरिकी अभिनेता जॉर्ज क्लूने कहते हैं, ‘अपने ही बोले हुए को सुनते रहना ज्यादा सीखने नहीं देता।’ जरूरत इस बात की है कि किसी भी दशा में निरंतर प्रयास करने के बाद भी यदि वांछित सफलता न मिले तो हताश, उदास एवं निराश नहीं होना है। एंथनी डि एंजेलो ने एक बार कहा था-‘‘जीवन का अर्थ आनंद उठाना है, उसे झेलना नहीं।’’ इस जगत में सदैव मनचाही सफलता किसी को भी नहीं मिली है और न ही कभी मिल सकती है। लेकिन यह भी सत्य है कि किसी का पुरुषार्थ कभी निष्फल नहीं गया है। बेंजामिन फ्रेंकलिन के शब्दों को याद करें-‘‘जो चीजें दुःख पहुंचाती हैं, वे सिखाती भी  हैं।’’

जीवन में कई दफा ऐसा ही होता है, जब हमें अपने आप पर बहुत गर्व होता है। हमें अपने स्वाभिमानी होने का एहसास होता है। पर धीरे-धीरे यह स्वाभिमान अहंकार का रूप लेने लगता है। हम अहंकारी बन जाते हैं और दूसरों के सामने दिखावा करने लगते हैं। यह भूल जाते हैं कि हम चाहें कितने ही सफल क्यों ना हो जाएं, व्यर्थ के अहंकार और झूठे दिखावे में पड़ना हमें शर्मिंदा कर सकता है। फिर भी मनुष्य की यह दुर्बलता कायम है कि उसे कभी अपनी भूल नजर नहीं आती जबकि औरों की छोटी-सी भूल उसे अपराध लगती है। काश! पडोसी के छत पर बिखरा गन्दगी का उलाहना देने से पहले हम अपने दरवाजे की सीढ़िया तो देख लें कि कितनी साफ है? सच तो यह है कि अहं ने सदा अपनी भूलों का दण्ड पाया है। तभी किताब ‘इगो इज एनिमी’ में लेखक रेयान हॉलिडे लिखते हैं, ‘अहंकार सफलता और संतुष्टि दोनों का दुश्मन है। इस पर कड़ी नजर बनाए रखना जरूरी है।’