भूपेन हजारिका : गंगा से बहने की वजह पूछने वाला ब्रह्मपुत्र का कवि

नयी दिल्ली,  कला की हर विधा की सांस्कृतिक यात्रा करते खुद को यायावर बताने वाले संगीत-साहित्य के महाप्राण भूपेन हजारिका की कलम की धार ऐसी कि दिल हूम हूम करे और संगीत की तान ऐसी कि कहीं दूर उठती लहरों की गूंज सरसराती हुई कानों के पास से निकल जाए।

वह कला की हर विधा में लोक संस्कृति के रंग भरते हुए कवि, कहानीकार, गायक, लेखक संगीत निर्देशक, पत्रकार और फ़िल्मकार के रूप में अपनी यात्रा पर आगे बढ़ते हैं। उन्होंने असम की सांस्कृतिक विरासत को राष्ट्रीय मानचित्र पर स्थापित करने के साथ ही भारत की कला और संगीत की समृद्ध परंपरा को वैश्विक मंच पर जगह दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की।

असम के तिनसुकिया जिले के सादिया गांव में 8 सितंबर 1926 को नीलकांत और शांतिप्रिया के यहां जन्मे भूपेन 10 भाई-बहनों में सबसे बड़े थे। मां ने नन्हें भूपेन का असमिया और परंपरागत बांग्ला संगीत से परिचय कराया और बहुत छोटी उम्र से ही वह गीत लिखने और गाने लगे। उन्होंने 1938 में 11 वर्ष की उम्र में असम में ऑल इन्डिया रेडियो के लिए पहला गीत गाया और उसके कुछ ही समय बाद असमिया फ़िल्म इन्द्रमालती में बाल कलाकार के रूप में अभिनय किया और गीत भी गाया।

लेखन और संगीत में रूचि के बावजूद उनकी पढ़ाई में कहीं कोई बाधा नहीं आई और उन्होंने गुवाहाटी के कॉटन कॉलेज से 1942 में इंटरमीडिएट और उसके बाद बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से स्नातक और स्नातकोत्तर स्तर की पढ़ाई की।

उन्हीं दिनों भूपेन दा को अमेरिका में मास कम्युनिकेशन पर शोध करने का प्रस्ताव मिला। कोलंबिया विश्वविद्यालय में अपने पांच वर्ष के शोध काल में भूपेन ने दुनिया की विभिन्न संस्कृतियों को करीब से देखा और उसमें भारत की सांस्कृतिक विरासत के रंग भर दिए। भूपेन दा की कालजयी रचना ‘ओ गंगा बहिचे केनो’ (ओ गंगा बहती हो क्यों?) भी उन्हीं दिनों के संस्कृतियों के संगम का परिणाम थी।

मशहूर अश्वेत अमेरिकी गायक पॉल राब्सन और मिसीसिपी नदी पर लिखे उनके अंग्रेजी गीत ‘‘ओल्ड मैन रिवर’’ को भला कौन नहीं जानता। भूपेन दा ने अपने अमेरिका प्रवास के दौरान पॉल के साथ मिलकर उनकी रचना का यह बांग्ला संस्करण तैयार किया।

सात समंदर पार रहते हुए भूपेन की मुलाकात प्रियंवदा पटेल से हुई और दोनों ने 1950 में विवाह कर लिया। अमेरिका में ही उनके पुत्र तेज का जन्म हुआ। 1953 में वह अपने परिवार के साथ स्वेदश लौट आए और हजारिका ने कुछ समय तक गुवाहाटी विश्विवद्यालय में नौकरी की। इस बीच पत्नी के साथ उनका अलगाव हो गया और वह पूरी तरह से साहित्य और संगीत के हो गए।

1956 में उन्होंने ‘एरा बाटर सुर’ के रूप में पहली असमिया फिल्म का निर्माण किया और अपनी पहली फिल्म से ही अपने फन का लोहा मनवा लिया। फिल्मकार के रूप में उनका सफर बेहतरीन रहा और उन्हें कई राष्ट्रीय पुरस्कारों के अलावा दादा साहब फालके पुरस्कार से भी नवाजा गया।

हाल में ‘भारत रत्न’ से सम्मानित भूपेन हजारिका की लेखनी और आवाज देश की ऐसी धरोहर है, जो गंगा की धारा की तरह सदा अविरल रहेगी।

 

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