खाद्य तेल उद्योग की बेहतरी के लिये आयात पर अंकुश जरूरी: तेल उद्योग

नयी दिल्ली,  वनस्पति तेल उद्योग का मानना है कि सरकार को घरेलू उद्योग और तिलहन किसानों की बेहतरी के लिये खाद्य तेलों के बढ़ते आयात पर अंकुश लगाने को लेकर ठोस कदम उठाने चाहिये।

उद्योग का सुझाव है कि सरकार खाद्य तेलों का आयात कम करने और तिलहन किसानों की आय बढ़ाने के लिये आयात शुल्क को तर्कसंगत बनाने के साथ-साथ आयातित तेलों पर ऊंची दर से माल एवं सेवाकर (जीएसटी) लगा सकती है।

उल्लेखनीय है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने संसद में खाद्य तेलों का आयात घटाकर शून्य करने की बात कही है। प्रधानमंत्री ने कहा है कि जिस प्रकार दलहन का आयात कम करने और उत्पादन बढ़ाने के लिये किसानों को प्रेरित किया गया उसी प्रकार खाद्य तेलों के आयात को भी कम किया जा सकता है और इसके लिये किसानों को प्रेरित किया जाना चाहिये। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भी खाद्य तेलों के आयात पर अंकुश लगाने पर जोर दिया है।

उद्योग का कहना है कि देश में खाद्य तेलों का आयात लगातार बढ़ता जा रहा है और 2017-18 में जहां 155-156 लाख टन का आयात हुआ था वहीं 2018-19 में यह बढ़कर 162 लाख टन तक पहुंच गया। यह हर साल बढ़ रहा है। खाद्य तेल आयात बिल 70 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है और जिस गति से यह बढ़ रहा है उसे देखते हुये इसके एक लाख करोड़ रुपये तक पहुंच जाने का अनुमान है। किसानों के पास सरसों और सोयाबीन का स्टॉक अभी तक बिना बिका पड़ा है जबकि अगले कुछ महीनों में नई सोयाबीन की आवक होने लगेगी।

पंजाब आयल मिल्स एसोसिएशन के अध्यक्ष सुशील जैन का कहना है कि सरकार को वास्तव में यदि घरेलू स्तर पर तिलहन उत्पादन बढ़ाना है और किसानों को उनकी उपज पर न्यूनतम समर्थन मूल्य उपलब्ध कराना है तो सबसे पहले आयात पर अंकुश लगाना जरूरी है।

जैन ने सुझाव देते हुये कहा कि सोयाबीन, सनफ्लावर, रेपसीड पर आयात शुल्क को 35 प्रतिशत से बढ़ाकर 45 प्रतिशत कर दिया जाना चाहिये। इनके रिफाइंड तेल का आयात देश में नहीं होता है। कच्चे पॉम तेल पर आयात शुल्क को 40 प्रतिशत से बढ़ाकर 45 प्रतिशत किया जाना चाहिये। इसके साथ ही कच्चे तेल के आयात पर 18 प्रतिशत और आयातित रिफाइंड तेल पर 28 प्रतिशत की दर से जीएसटी लगाया जा सकता है ताकि आयातित कच्चे तेल और रिफाइंड तेल में अंतर बना रहे। नेपाल से आयात होने वाले शुल्क मुक्त घी पर भी 28 प्रतिशत की दर से जीएसटी लगाया जा सकता है। इससे घरेलू तेल-तिलहन उद्योग को काफी सहारा मिलेगा।

उन्होंने कहा कि वर्ष 2000- 2001 में खाद्य तेलों के आयात पर 80 प्रतिशत तक शुल्क था जिसे बाद में घटाकर अधिकतम 45 प्रतिशत कर दिया गया। यह घरेलू उद्योग के लिये नुकसानदायक साबित हुआ।

दिल्ली वनस्पति तेल व्यापारी संघ (डिवोटा) के सदस्य पुनीत जैन के मुताबिक सरकार ने सरसों का न्यूनतम समर्थन मूल्य 4,250 रुपये क्विंटल किया है जबकि थोक बाजार में सरसों का भाव 4,000 रुपये से नीचे चल रहा है। इसी प्रकार सायोबीन का न्यूनतम समर्थन मूल्य 3,700 रुपये क्विंटल किया गया है। यह भी बाजार में समर्थन मूल्य से नीचे बिक रही है।

उन्होंने कहा कि विदेशों से खाद्य तेल का सीधा आयात होने की वजह से देश में खल की तंगी अखरने लगी है। बिनौला और मक्का खल महंगी हो रही है। घरेलू खाद्य तेलों का उत्पादन कम होने की वजह से पशु एवं मुर्गीचारा के लिये खल की तंगी बढ़ रही है जिससे इनके भाव भी चढ़ रहे हैं। इसलिये सरकार को खाद्य तेलों के आयात पर अंकुश लगाने के लिये ठोस कदम उठाने होंगे।