हिन्दी कथा-उपन्यास साहित्य के पुरोधा-पुरुष

संसार में विरले ही ऐसे हुए जिन्होंने सृजन को इतनी उत्कट बेचैनी लेकर जिया। उनके शब्दों में जादू था और जीवन इतना विराट कि देश-काल की सीमाएं समेट नहीं पाई उनके वैराट्य को। उन्होंने हिन्दी कथा-साहित्य के क्षेत्र में कथ्य और शिल्प दोनों में आमूलचूल बदलाव किया। लेखन की एक सर्वथा मौलिक किन्तु सशक्त धारा जिनसे जन्मी, वे हैं मुंशी प्रेमचन्द। इतिहास और साहित्य में ऐसी प्रतिभाएं कभी-कभी ही जन्म लेती हैं। वाल्मीकि, वेदव्यास, कालिदास, तुलसीदास, कबीर और इसी परम्परा में आते हैं प्रेमचन्द। 31 जुलाई 2019 को उनका 140वां जन्मदिन है, जिनसे भारतीय साहित्य का एक नया और अविस्मरणीय दौर शुरू हुआ था। जिनके सृजन एवं साहित्य की गूंज भविष्य में लम्बे समय तक देश और दुनिया में सुनाई देती रहेगी। आज जब हम बहुत ठहरकर बहुत संजीदगी के साथ उनका लेखन देखते हैं तो अनायास ही हमें महसूस होता है कि वे अपने आप में कितना विराट संसार समेटे हुए हैं। ऐसा भी प्रतीत होता है कि शायद वे कहानियां सुनाने ही धरती पर आए थे। इसीलिये तो उन्हें कथा-सम्र्राट भी कहा जाता है।

ललित गर्ग

मुंशी प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई 1880 को उत्तर प्रदेश के वाराणसी के लमही ग्राम में हुआ था। उनका वास्तविक नाम धनपतराय था। उनके पिता अजायबराय डाकखाने में एक क्लर्क थे। बचपन में ही इनकी माता का स्वर्गवास हो गया था तथा उसके बाद सौतेली मां के नियंत्रण में रहने के कारण उनका बचपन बहुत ही कष्ट में बीता। धनपत को बचपन से ही कहानी सुनने का बड़ा शौक था। इसी शौक ने इन्हें महान कहानीकार व उपन्यासकार बना दिया। प्रेमचंद की शिक्षा का प्रारंभ उर्दू से हुआ। लगभग चैदह वर्षों तक केवल उर्दू में लिखने के बाद उन्होंने जब हिन्दी की ओर अपना पहला कदम रखा, तभी हिन्दी साहित्य जगत में अनुभव किया गया कि हिन्दी कथा-उपन्यास साहित्य के क्षेत्र में एक युगांतरकारी परिवर्तन आ गया है। इस साहित्यिक क्रांति का यह आश्चर्यजनक पहलू था कि यह ऐसे लेखक की कलम से उपजी थी, जो उर्दू से हिन्दी में आया था।

मुंशी प्रेमचंद बहुत ही आदर्शवादी व ईमानदार व्यक्ति थे। कुछ दिन शिक्षा विभाग में नौकरी की लेकिन बाद में गांधीजी के आह्वान पर नौकरी छोड़ दी और साहित्य सृजन में लग गये। एक प्रकार से प्रेमचंद आर्यसमाजी व विधवा विवाह के प्रबल समर्थक भी थे। 1910 में मुंशी प्रेमचंद की रचना सोजे वतन (राष्ट्र का विलाप) के लिए हमीरपुर के जिला कलेक्टर ने तलब किया और उन पर जनता को भड़काने का आरोप लगाया। सोजे वतन की सभी प्रतियां जब्त कर ली गयीं। जिलाधीश ने उन्हें अब और आगे न लिखने के लिए कहा और कहा कि यदि दोबारा लिखा तो जेल भेज दिया जायेगा। इस समय तक धनपत राय मुंशी प्रेमचंद के नाम से लिखने लग गये थे। उनकी पहली कहानी सरस्वती पत्रिका में 1915 के दिसम्बर अंक में ‘सौत’ प्रकाशित हुई और अंतिम कहानी ‘कफन’ नाम से। मुंशी प्रेमचंद ने हिंदी में यथार्थवाद की शुरूआत की। भारतीय साहित्य का बहुत-सा विमर्श जो बाद में प्रमुखता से उभरा चाहे वह दलित साहित्य हो या फिर नारी साहित्य उसकी जड़ें प्रेमचंद के साहित्य में दिखाई पड़ती हैं। उनके प्रमुख उपन्यासों में सेवासदन, गोदान, गबन, कायाकल्प, रंगभूमि प्रेमाश्रय, कर्मभूमि आदि हैं।  उनकी ‘बांका जमींदार’, ‘विध्वंस’, ‘सवा सेर गेहूं’, ‘घासवाली’, ‘ठाकुर का कुआं’, ‘गुल्ली डंडा’, ‘दूध का दाम’, ‘सद्गति’ आदि कहानियांें में दलित जीवन की पीड़ा एवं वेदना के चित्र हैं। उनके साहित्य में स्त्रर-विमर्श का व्यापक संसार भी है। उनकी लगभग 50 कहानियों में किसानी जिन्दगी एवं संस्कृति का मर्मस्पर्शी चित्रण भी देखने को मिलता है। जीवन का ऐसा कोई क्षेत्र या समस्या नहीं है जिस पर उन्होंने कलम न चलाई हो।

प्रेमचन्द भारतीयता एवं राष्ट्रीयता के लेखक थे और उनके साहित्य की प्रमुख धारा भारतीय संस्कृति, राष्ट्र-भाव, सामाजिक जाग्रति, लघु मानव का उत्कर्ष, समरसता एवं कल्याण, भेदरहित संतुलित समाज की रचना, रूढ़ि-मुक्ति, नैतिक एवं चारित्रिक मूल्यों की स्थापना एवं आदर्श जीवनशैली की रचना था। प्रेमचन्द को ‘आदर्शोन्मुख यथार्थवाद’ से ही समझा जा सकता है, न कि केवल यथार्थवाद से। उनके साहित्य की आत्मा है- ‘मंगल भवन अमंगल हारी।’ इस दृष्टि से तुलसीदासजी एवं प्रेमचन्द एक ही राह के पथिक हैं और यही कारण है कि प्रेमचन्द को तुलसीदास के ही समान लोकमानस में प्रतिष्ठा एवं अमरत्व प्राप्त है। गांधी ने जब स्वराज्य आन्दोलन की एक नई राजनीतिक चेतना उत्पन्न की तो प्रेमचन्द इस नई सांस्कृतिक-राजनीतिक चेतना के सबसे सशक्त कथाकार के रूप में उभरकर सामने आये।

मुंशी प्रेमचंद ने अपने 36 वर्षों के साहित्यिक जीवन में करीब तीन सौ कहानियाँ, एक दर्जन उपन्यास, चार नाटक और अनेक निबन्धों के साथ विश्व के महान् साहित्यकारों की कुछ कृतियों का हिन्दी में अनुवाद भी किया और उनकी यह साहित्य-साधना निश्चय ही उन्हें आज भी अमरता के शीर्ष-बिन्दु पर बैठाकर उनकी प्रशस्ति का गीत गाते हुए उन्हें ‘उपन्यास सम्राट्’ और कालजयी कहानीकार की उपाधि से विभूषित कर रही है। उपन्यास के क्षेत्र में उनके योगदान को देखकर ही बंगाल के विख्यात उपन्यासकार शरतचंद्र चट्टोपाध्याय  ने उन्हें ‘उपन्यास सम्राट्’ से संबोधित किया। मुंशी प्रेमचंद सही मायने में आज भी सच्ची भारतीयता की पहचान हैं। उनका कहना था कि साहित्यकार देशभक्ति और राजनीति के पीछे चलने वाली सच्चाई नहीं अपितु उसके आगे मशाल दिखाती हुई चलने वाली सच्चाई है। यह बात उनके साहित्य में उजागर हुई है। उन्होंने कुछ महीने तक मर्यादा पत्रिका का संपादन किया और फिर लगभग छह साल तक माधुरी पत्रिका का संपादन किया। 1932 में उन्होंने अपनी मासिक पत्र हंस शुरू की। 1932 में जागरण नामक एक और साप्ताहिक पत्र निकाला। गोदान उनकी कालजयी रचना है। उन्होंने बाल पुस्तकें भी लिखीं तथा सम्पादकीय, भाषण, भूमिका, पत्र आदि की भी रचना की लेकिन जो यश और प्रतिष्ठा उन्हें उपन्यास और कहानियों से प्राप्त हुई वह अन्य विधाओं से प्राप्त नहीं हो सकी। उन्होंने समाज सुधार, देशप्रेम, स्वाधीनता संग्राम आदि से संबंधित कहानियां लिखीं। उनकी ऐतिहासिक व प्रेम कहानियां भी काफी लोकप्रिय हैं। प्रेमचंद हिंदी साहित्य के युग प्रवर्तक हैं। हिंदी कहानी में आदर्शोन्मुख यथार्थवाद की उन्होंने एक नयी परम्परा की शुरूआत की। वे मानवीय मूल्यों के उपासक थे। उनके लिये साहित्य जीवन की आलोचना है, सच्चाइयों का दर्पण है, अच्छाई-बुराई का संग्राम स्थल है और मानवीय मूल्यों का सर्जक है। साहित्य विध्वंस नहीं, निर्माण करता है, मनोवृत्तियों का परिष्कार करता है। उनके साहित्य में यथार्थवाद एवं आदर्शवाद दोनों का समावेश था। उनकी कहानियों का यथार्थ जीवन की सच्चाइयों से परिचित कराता है और आदर्शवाद हमें जीवन की ऊंचाइयों तक ले जाता हैं। यही कारण है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ‘मन की बात’ रेडियो कार्यक्रम में उनकी कहानियों की इन्हीं विशेषताओं की लम्बी चर्चा करते हुए आधुनिक सन्दर्भों में उन्हें जीवंत कर दिया। उनकी लगभग सभी रचनाओं का हिंदी, अंग्रेजी में रूपांतर किया गया और चीनी, रूसी आदि विदेशी भाषाओं में कहानियां प्रकाशित हुईं। मरणोपरांत उनकी कहानियों का संग्रह मानसरोवर आठ खंडों में प्रकाशित हुआ। मुंशी प्रेमचंद ने अपनी रचनाओं में सामाजिक कुरीतियों का डटकर विरोध किया है। मुंशी प्रेमचंद जनजीवन और मानव प्रकृति के पारखी थे। बाद में उनके सम्मान में डाक टिकट भी निकाला गया। उन्हें कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। गोरखपुर में प्रेमचंद साहित्य संस्थान की स्थापना की गयी जहां भित्तिलेख है व उनकी प्रतिमा भी स्थापित है। प्रेमचन्द ने 1923 में बनारस में ‘सरस्वती प्रेस’ की स्थापना की। सरस्वती प्रेस घाटे में चलने लगा। इसी बीच माधुरी के भी सम्पादक बने। माधुरी के लिए पहली बार जैनेन्द्र जी ने अपनी कहानी भेजी तो मुंशी प्रेमचंद ने इसे यह लिख कर लौटा दिया कि कहीं यह अनुवाद तो नहीं है? मगर उनकी ही दूसरी कहानी ‘अंधों का भेद’ विशेषांक के लिए चुन ली गई और इसके साथ ही जैनेन्द्र जी से उनका सम्बन्ध प्रगाढ़ होता गया।

आज मुंशी प्रेमचंद की तुलना दुनिया के चोटी के साहित्यकार मोरित्ज, गोर्की, तुर्गनेव, चेखब और टॉल्स्टोय  आदि के साथ करते हुए हमें उन पर गर्व होता है। एक बार बनारसी दास चतुर्वेदी ने उनसे पूछा- दुनिया का सबसे बड़ा कहानीकार आप किसे मानते हैं? मुंशी प्रेमचंद ने सहज ढंग से कहा- चेखब को ! और यह भी एक सुखद आश्चर्य ही है कि रूस के प्रसिद्ध विद्वान् ए. पी. बरान्निकोव ने भी उनकी तुलना चेखब से की। प्रेमचंद ने हिन्दी कहानी और उपन्यास की एक ऐसी परंपरा का विकास किया जिसने पूरी सदी के साहित्य का मार्गदर्शन किया। अक्षर-पुरुष एवं गहन मानवीय चेतना के चितेरे कथा-सम्राट को उनके जन्म दिन पर शत-शत नमन!