देश की छवि बट्टा लगाने की भूमिका

इससे दुर्भाग्यपूर्ण और क्या हो सकता है कि सबसे ज्यादा समय तक शासन करने वाली तथा इस समय भी राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के बाद दूसरे नंबर की पार्टी कांग्रेस के अध्यक्ष विदेश की धरती पर जाकर लगातार ऐसे बयान दें जिनसे न केवल देश की छवि को बट्टा लगे बल्कि वे स्वयं हास्य के पात्र बन जाएं। वास्तव में अत्यंत दुख के साथ हर विवेकशील भारतीय को यह स्वीकार करना पड़ रहा है कि राहुल गांधी ने जर्मनी के हैम्बर्ग से लेकर लंदन तक के अपने बयानों में भारत को वाकई नीचा दिखाने की भूमिका अदा की है। हालांकि कांग्रेस पार्टी के पास अपने अध्यक्ष के वक्तव्यों की रक्षा करने तथा उसके पक्ष में तर्क देने के अलावा कोई चारा नहीं है, लेकिन पार्टी के अंदर भी आम सोच यही होगी कि राहुल जी को इस तरह नहीं बोलना चाहिए। वैसे भी वो देश की स्थिति का जैसा डरावाना दृश्य प्रस्तुत कर रहे हैं वह सच नहीं है। आम भारतीय यह समझ रहा है कि राहुल गांधी विदेश में भी एक विपक्षी नेता की तरह ऐसे आरोप सरकार पर लगा रहे हैं जिनसे मोदी विरोध की जगह देश का विरोध हो रहा है। पता नहीं यह समझ राहुल गांधी और उनके सलाहकारों-रणनीतिकारों के अंदर क्यों नहीं पैदा हो रही?

हैम्बर्ग के बुसेरियस समर स्कूल में हुए कार्यक्रम में राहुल ने कहा कि दलितों, अल्पसंख्यकों, आदिवासियों को अब सरकार से कोई फायदा नहीं मिलता। उनको फायदा देने वाली सारी योजनाओं का पैसा चंद बड़े कॉर्पाेरेट के पास जा रहा है। क्या इसे स्वीकार किया जा सकता है? आप देखेंगे इनके कल्याण की योजनाओं की राशि हर बजट में बढ़ती गई है तथा अनेक नई योजनाएं चलाईं गई हैं। इसी तरह यह भी सच नहीं है कि रोजगार गारंटी योजना, भोजन का अधिकार, सूचना का अधिकार, बैंकों का राष्ट्रीयकरण ये सारे विचार ही काफी हद तक नष्ट हो गए हैं।  किंतु ये सच है या झूठ इससे ज्यादा महत्व की बात है कि आप कहां यह सब बोल रहे हैं। जहां वे बोल रहे थे वहां 23 देशों के प्रतिनिधि थे। आप अपने देश में सरकार पर जितना आरोप लगाना है लगाइए। विदेश में जब आप ऐसा बोलते हैं तो देश की छवि यह बनती है कि इससमय भारत में अल्पसंख्यों, दलितों, आदिवासियों के लिए कयामत के दिन आ गए हैं, नागरिकों के सारे अधिकार छीने जा रहे हैं और बैंकों को बेच दिया जा रहा है। एक ओर दुनिया में भारत की छवि उभरती हुई महाशक्ति की बन रही है, हर मंच पर हमारे प्रधानमंत्री या किसी मंत्री की बात को गौर से सुना जाता है, उसको महत्व मिलता है और दूसरी ओर हमारे विपक्षी दल के नेता देश की एक अराजक तस्वीर पेश करते हैं।

उन्होंने भीड़ द्वारा हिंसा का मुद्दा उठा दिया और कहा इसका कारण बेरोजगाारी है। उनकी बात सुनिए, ‘कुछ साल पहले प्रधानमंत्री जी ने भारतीय अर्थव्यवस्था में नोटबंदी का फैसला किया उसके बा और एमएसएमई के नकद प्रवाह को बर्बाद कर दिया, अनौपचारिक क्षेत्र में काम करने वाले लाखों लोग बेरोजगार हो गए। बड़ी संख्या में छोटे व्यवसायों में काम करने वाले लोगों को वापस अपने गांव लौटने को मजबूर होना पड़ा। जीएसटी को गलत तरीके से लागू किया उससे कारोबार खत्म हो रहा है। इससे लोग काफी नाराज हैं। लिंचिंग के बारे में जो कुछ भी हम सुनते हैं, वो इसी का परिणाम है।’ उन्होंने कहा कि भारत में लंबे-लंबे भाषण देकर नफरत फैलाई जा रही है। किसान आत्महत्या करने को मजबूर हैं। नौजवान अपना सुरक्षित भविष्य नहीं देख पा रहा। जरा सोचिए, इससे भारत की कैसी छवि बनेगी? यह व्याख्या भी विचित्र है। उनके कहने से तो यही ध्वनि निकलती है कि नोटबंदी के कारण बंद कारखानों से व्यवसायों से वापस लौटे कामगार गांवों में समूह बनाकर हत्याएं कर रहे हैं। एक दूसरे समुदायों के विरुद्ध नफरत फैलाया जा रहा है। जिसे भारत के बारे में सच नहीं पता वह तो यही सोचेगा कि यहां तो बिल्कुल कानून का राज खत्म हो गया है और सरकार की नीतियों से बेरोजगार हुए लोग भारी संख्या में हिंसा कर रहे हैं और उसे रोक पाना नामुमकिन हो रहा है। देश के बेरोजगारों का समूह केवल हिंसा कर रहा है। विदेशियों के बीच ऐसा बोलना शर्म का विषय है। उच्चतम न्यायालय ने 17 जुलाई को भीड़ द्वारा हिंसा पर फैसला देते हुए कहा था कि पिछले 10 सालोें में 86 घटनाएं हुईं जिनमें 33 लोग मारे गए।

राहुल ने खूंखार आतंकवादी संगठन आईएसआईएस की पैदाइश और भारत में इसके पनपने की जो व्याख्या की वह तो अद्भुत है। उन्होंने कहा कि 2006 में अमेरिका-इराक युद्ध के बाद कबाइली लोगों को नौकरी से बाहर कर दिया। इन लोगों ने धीरे-धीरे नेटवर्क फैलाया और आईएसआईएस बनाया। यही नहीं उन्होंने यह भी कह दिया कि भारत में भी बेरोजगारी बढ़ रही है। प्रधानमंत्री के पास कोई विजन नहीं है। अगर हम कोई विजन नहीं देंगे तो वहां भी आईएसआईएस पैदा हो जाएगा। यह केवल भारत और यहां की सरकार की आलोचना नहीं है, अपने का हास्यास्पद बनाना भी है। यूरोप और अमेरिका के लोगों को आईएसआईएस, अल कायदा जैसे आतंकवादी संगठनों के पैदा होने का कारण बेहतर पता है। वे जानते हैं कि उसके पीछे बेरोजगारी की कोई भूमिका है ही नहीं। ये दुनिया मंें इस्लामिक साम्राज्य स्थापित करने की उन्मादी मंसूबे से खड़े संगठन हैं। ये सम्पूर्ण आधुनिक सभ्यता जिसमें वर्तमान शिक्षा व्यवस्था, अर्थव्यवस्था और रोजगार के ढांचे हैं उनको ही नष्ट करने का लक्ष्य रखते हैं। राहुल के भाषण सुनने वाले या मीडया में उसे पढ़ने-देखने वाले यही सोच रहे होंगे कि भारत इतने अज्ञानियों का देश है जहां दूसरे सबसे बड़े दल के नेता को आतंकवादी संगठनों की पृष्ठभूमि और मंसूबों तक का नहीं पता। यह हमारे लिए भी चिंता का विषय है कि हमारे देश के इतने बड़े नेता की ऐसे अज्ञानी की छवि बनी है।

कांग्रेस ने पिछले दो वर्षों से यह रणनीति बनाई है कि राहुल गांधी को विदेश दौरा कराकर ऐसे कार्यक्रम किए जाएं जिनसे उनकी छवि में निखार आए। राहुल के रणनीतिकार मानते हैं कि जिस तरह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को विदेशी दौरों में दिए गए भाषणों से प्रवासी भारतीयों, विदेशी नेताओं के साथ देश के अंदर भी लोकप्रियता मिली है उसका मुकाबला करने के लिए ऐसा किया जाना जरुरी है। आज कांग्रेस कह रही है कि मोदी स्वयं विदेशों मेें इसी तरह आलोचना करते रहते हैं तो हम क्यों नहीं करे? मोदी ने प्रवासी भारतीयों की सभाओं में पूर्व सरकार की आलोचना कई जगह अवश्य की, लेकिन उसमें उन्होंने देश को निचा दिखाने की जगह एक उभरती हुई शक्ति और आत्मविश्वास से लबरेज समाज की छवि प्रस्तुत की। उससे बाहर रहने वाले भारतवंशियों के अंदर ही नहीं देश के अंदर भी भारत के सुखद भविष्य के प्रति नए आत्मविश्वास का संचार हुआ है। मोदी ने विदेशियों के बीच बोलते हुए कभी पूर्व सरकारों या विपक्ष की चर्चा नहीं की है, केवल भारत का पक्ष मजबूती से रखा है। आपके भाषण उसके विपरीत हैं। आपने भाजपा, संघ एवं मोदी की आलोचना में देश की छवि को ही दांव पर लगा दिया। विकास के मुद्दे पर लड़खड़ता हुआ, बेरोजगारों के गुस्से से हिंसा में जलता, समुदायों में घृणा वाले ….यानी हर स्तर पर डरावनी स्थिति का सामना करने वाला देश बना दिया है। आप कह रहे हैं कि संघ सत्ता में आने के बाद हर संस्था पर कब्जा करता है। उसमें आपने उच्चतम न्यायालय तक का नाम ले लिया। महिलाओं की स्थिति पर बोलते-बोलते कह दिया कि अंततः यह संस्कृति का प्रश्न है। यानी भारत की संस्कृति में ही पुरुषों का स्त्रियांें पर दबदबा रहा है या पुरुष स्त्री को दोयम दर्जे का मानते रहे हैं। केवल वर्तमान ही नहीं भारत के अतीत की भी आपने छीछालेदर कर दी। विदेश की सरकारों, अंतर्राष्ट्रीय संस्थाआंे के पास भारत को जानने के अपने स्रोत हैं, अन्यथा इसे वे स्वीकार लें तो न यहां कोई निवेश आएगा, न पर्यटक आएंगे, न रेटिंग एजेंसियां भारत की अच्छी रेटिंग करेंगी। यही नहीं राहुल की बातों को स्वीकार लें तो लोकतांत्रिक अधिकारों के दमन के नाम पर भारत पर कई तरह के प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। आप विदेश में विदेशियों के समक्ष अपने देश की इस तरह मिट्टी पलीद करेंगे और फिर यह उम्मीद करेंगे कि भारतीय आपके नेतृत्व में कांग्रेस को चुनावों में वोट दें। यह नहीं हो सकता। किंतु यह चुनावी लाभ हानि से ज्यादा हमारे देश की छवि का प्रश्न है जिसको बट्टा लगाने वाले का हरसंभव विरोध करना होगा।

अवधेश कुमार