नई लोकसभा की तकदीर लिखेंगे युवा

देष की सत्रहवीं लोकसभा की तकदीर लिखने में युवाओं की अहम् एवं निर्णायक भूमिका होगी। गोया, सभी राजनीतिक दलों की निगाहें युवाओं पर टिकी हैं। बढ़ती बेरोजगारी को लेकर युवा नरेंद्र मोदी सरकार से नाराज दिख रहे थे, लेकिन पुलवामा में सुरक्षाबल पर हुए आत्मघाती हमले और फिर बालाकोट में की गई वायुसेना की एयर स्ट्राइक के बाद ऐसा लग रहा है कि राश्ट्रीय सुरक्षा ने युवाओं के भीतर राश्ट्रवाद को जबरदस्त ढंग उभारा है। सोषल मीडिया ने इस ज्वार को उभारने में तीव्रता की भूमिका निभाई है। बहरहाल, 2019 के आम चुनाव में 8.1 करोड़ ऐसे मतदाता होंगे, जो पहली बार अपने मत का उपयोग करेंगे ? इन्होंने 2014 के लोकसभा चुनाव के बीते छह माह के भीतर 18 वर्श की उम्र पूरी की है। इनमें से अनेक ऐसे भी रहे हैं, जिन्होंने 2018 के अंत में हुए पांच विधानसभाओं के चुनाव में भी मतदान किया है। यानी अनेक की मतदान की ललक मतदान के पहले अनुभव में तब्दील हो चुकी है।

प्रमोद भार्गव

2019 के लोकसभा चुनाव की ढपली अब बजने वाली है। इसमें नए मतदाताओं की भूमिका यदि वे विवेक से मतदान करें तो निर्णायक हो सकती है। क्योंकि निर्वाचन आयोग द्वारा जारी किए, ताजा आंकड़ों के मुताबिक 282 लोकसभा सीटों पर उम्मीदवारों की किस्मत की कुंजी उन्हीं के हाथ में है। आयोग द्वारा उम्रवार मतदाताओं के वर्गीकरण व विष्लेशण की जो रिपोर्ट आई है, उसके अनुसार इस चुनाव में 8.1 करोड़ नए मतदाता होंगे। ये युवा मतदाता 29 राज्यों की कम से कम 282 सीटों पर चुनावी समीकरणों को प्रभावित करेंगे। प्रत्येक लोकस्सभा सीट पर करीब 1.5 लाख मतदाता ऐसे होंगे, जो पहली बार मतदान करेंगे। रिपोर्ट के मुताबिक 2014 के लोकसभा चुनाव में 282 सीटों पर मिली जीत के अंतर के लिहाज से इन मतदाताओं की संख्या ज्यादा है। 1997 और 2001 के बीच जन्में इनमें से कुछ युवा मतदाताओं ने विधानसभा चुनाव में मतदान किया है, लेकिन आमचुनाव में वे पहली बार मतदान करेंगे।

रिपोर्ट के अनुसार विभिन्न राज्यों में 2015 में हुए विधानसभा चुनावों के नए मतदाताओं से लेकर 2018 तक के विधानसभा चुनावों के नए मतदाताओं की संख्या का औसत निकाला गया है। इसमें पाया गया है कि 12 प्रांतों के नए मतदाताओं की संख्या 2014 के लोकसभा चुनाव में 217 सीटों पर जीत के अंतर से कहीं ज्यादा है। इन राज्यों में पष्चिम बंगाल में 32, बिहार 29, उत्तर प्रदेष 24, कर्नाटक 20, तमिलनाडू 20, राजस्थान 17, केरल 17, झारखंड 13, आंध्र प्रदेष 12, महाराश्ट्र 12, मध्य-प्रदेष 11 व असम 10 सीटें हैं। देष में सबसे ज्यादा 80 सीटों वाले उत्तर प्रदेष में नूतन मतदाताओं की औसत संख्या 1.15 लाख है। यह 2014 के चुनावों में यहां की लोकसभा सीटों पर जीत के औसत अंतर 1.86 लाख से कम है। तब सपा एवं बसपा ने अलग-अलग रहते हुए चुनाव लड़ा था। किंतु अब अखिलेष यादव और मायावती ने अपने दलों को गठबंधन का रूप देकर वोट के विभाजन को कम करने का काम कर लिया है। फिलहाल इस गठबंधन में कांग्रेस षामिल नहीं है। कांग्रेस भी यदि कालांतर में गठबंधन का हिस्सा बन जाती है तो इस बंटे विपक्ष की ताकत बढ़ जाएगी। बावजूद जरूरी नहीं कि राश्ट्रवाद के ज्वार से व्याकुल युवा इस गठबंधन को वोट दे ही ? क्योंकि राहुल गांधी और मायावती समेत कांग्रेस व विपक्ष के अनेक नेता एयर स्ट्राइक में मरे आतंकवादियों की संख्या और सबूत बताने की जो जिद्द कर रहे हैं, उससे वे नुकसान उठाने की जद में आते जा रहे हैं।

1997-2001 के वर्शें में जन्मा यह मतदाता 2014 के चुनाव में मतदान के योग्य नहीं था। अब उत्तर-प्रदेष में 24 सीटें ऐसी हैं, जिनके भाग्य का फैसला युवा मतदाता करेगा। यदि 18 से 35 वर्श के मतदाताओं को युवा मतदाताओं की श्रेणी में रखें तो उत्तर-प्रदेष में इनकी संख्या 12 करोड़ 36 लाख बैठती है। जाहिर है, ये नई लोकसभा की तकदीर लिखने में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं। वैसे भी सबसे ज्यादा सांसद देने के कारण उत्तर-प्रदेष के साथ यह विषेशण जुड़ा हुआ है कि देष की सरकार और प्रधानमंत्री बनने का रास्ता उत्तर-प्रदेष से ही निकलता है। गोया, युवा ठान लें तो इस परंपरा की एक बार फिर से पुनरावृत्ति हो सकती है।
ब्हरहाल, इस लोकसभा चुनाव में युवाओं की मंषा और हवा का रुख जो भी रहे, उसमें युवाओं द्वारा लाए जाने वाले बदलाव की झलक मिलना तय है। ऐसी धरणा है कि युवा मतदाता जब 18 वर्श की आयु पूरी होने पर पहली बार मतदान करता है तो वह समझ के स्तर पर कमोबेष अपरिपक्व होता है। इसलिए उसमें रूढ़िवादी, सांप्रदायिक और जातीय जड़ता नहीं होती है। इसलिए वह निर्लिप्त भाव से निश्पक्ष मतदान करता है। यह युवा अभिभावक की इच्छा के मुताबिक भी मतदान करता रहा है। किंतु अब मुठ्ठी में मोबाइल होने के कारण वह धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक और हरेक राजनीतिक घटनाक्रम की जानकारी हासिल कर लेता है और अपनी मानसिकता इन प्रभावों के अनुरूप ढाल लेता है। इसलिए वह सोषल साइटों पर अपनी बेवाक प्रतिक्रिया भी उजागर कर देता है और किस राजनीतिक नेतृत्व के प्रभाव में क्यों है, इस भाव का भी प्रगटीकरण कर देता है। समाचार चैनल उसे प्रभावित तो करते हैं, लेकिन मीडिया के राजनीतिक प्रबंधन की चालाकी को वह समझने में परिपक्व हो गया है। इसलिए फर्जी या उत्सर्जित समाचार और वास्तविक समाचार के अंतर को वह भलिभांति समझने लगा है। इस असलियत को चित्र व दृष्य के माध्यमों से जानने के उसके पास अनेक स्रोत हैं, इसलिए वह इन्हें देखकर स्वयं तुलनात्मक विष्लेशण करता है और अपनी राय बनाता है।

पुलवामा हमले से पहले और उसके बाद आतंकी षिविरों पर की गई एयर स्ट्राइक ने युवाओं के मन को मथने का काम किया है। इन घटनाचक्रों से पहले तक युवाओं के मन में रोजगार का संकट बड़ी समस्या के रूप में घर कर गया था। लेकिन पुलवामा में 44 सैनिकों की षहादत और फिर अभिनंदन की बहादुरी ने युवाओं के मन में गहरा राश्ट्रीयता का भाव जगाने का काम किया है। इसे कई मतवाद से ग्रस्त पूर्वाग्रही अंध राश्ट्रवाद कहकर इन युवाओं को बुद्धिहीन भी ठहराने की भूल कर रहे हैं। युवा समझ रहा है कि आतंकियों की संख्या बताने के जो बयान विपक्षी नेता दे रहे हैं, वे सिर्फ अपने राजनीतिक हित साधने के लिए हैं। सेना के पराक्रम पर संदेह ज्यादातर युवाओं के मन को बेचैन कर रहा है। ऐसे में यह कष्मकष उनके भीतर उमड़-धुमड़ रही है कि वंषवादी, परिवारवादी और जातीवादी राजनीति के क्या राश्ट्रहित हो सकते हैं ? राश्ट्रीय सुरक्षा, आतंकवाद व देष के भीतर ही अलगाववाद की चिंगारी को भड़काने में लगे देषद्रोहियों पर नियंत्रण का षिकंजा कौन कस सकता है ? इस तरह के जिन राश्ट्रीय मुद्दों को लेकर पुलवामा हमले के बाद ज्वार आया हुआ है, वह पारंपारिक राजनीतिक विचारधारा से भिन्न है। नतीजतन यह युवा मतदाता परिवारिक विचारधारा के प्रतिकूल जाकर भी मतदान कर सकता है। दरअसल युवाओं को पता है एयर स्ट्राइक हुई है। ऐसे मामलों में दुनिया का कोई भी देष सरकार और सेना से सबूत नहीं मांगता है। फिर भी अपने ही देष के कुछ नेताओं को एयर स्ट्राइक पर संदेह है तो युवा उनकी देषभक्ति पर भी प्रष्नचिन्ह खड़े करने लग गए हैं। इसे सोषल साइटों पर युवाओं द्वारा की जा रही टिप्पाणियों से आसानी से समझा जा सकता है ? फिर भी युवा मतदाता राश्ट्रवाद के ज्वार में बहकर इकतरफा मतदान करेगा, ऐसा मानना भी भूल होगी ? बाबजूद विपक्षी राजनेता यदि अनर्गल प्रलाप से बचते तो ज्यादा बेहतर होता। क्योंकि इस प्रलाप से जाने-अनजाने युवाओं में यह संदेष गया है कि आतंक से लड़ने की विपक्षी नेताओं में साहस मोदी की तुलना में कम है। इसीलिए पुलवामा हमले के बाद केन्द्र सरकार द्वारा की गई जबाबी कार्यवाही को युवा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दुस्साहसिक पहल मान रहे हैं। गोया इन युवाओं का झुकाव भाजपा के पक्ष में जाता दिख रहा है।