स्वरूप संपत : मॉडलिंग और एक्टिंग के बाद मिला जीने का सही मकसद

नयी दिल्ली,  वह मिस इंडिया बनीं, टेलीविजन धारावाहिक में अपने शोख अभिनय से हर घर में जगह बनाई, फिल्मों में कई तरह के किरदार निभाए और फिर एक नये रास्ते पर निकल पड़ीं, जहां शिक्षा को उन्होंने अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया और दुनिया के एक प्रतिष्ठित सम्मान की दावेदार बन बैठीं। हम बात कर रहे हैं स्वरूप संपत रावल की।

3 नवंबर 1958 को जन्मीं स्वरूप को वर्की फाउंडेशन ग्लोबल टीचर प्राइज के 10 दावेदारों में चुना गया है और फाउंडेशन का कहना है कि स्वरूप की शैक्षणिक पद्धति सबके लिए उपयोगी है। वह आर्थिक और सामाजिक रूप से कमजोर वर्ग के बच्चों के साथ ही उच्च वर्ग के स्कूली बच्चों को शिक्षा के जरिए जिंदगी का एक नया फलसफा समझाती हैं।

हालांकि स्वरूप का मकसद शिक्षक बनना कभी नहीं था, लेकिन मां बनने के बाद और 37 बरस की उम्र में फिर से शिक्षा की ओर मुड़ने के बाद उन्हें महसूस हुआ कि शिक्षा के कुछ तरीके बच्चों को परेशान करते हैं, जिससे पूरे परिवार को तनाव होता है। यहीं से उन्होंने दो संकल्पों के साथ अध्यापन का रास्ता पकड़ लिया। उनका पहला संकल्प था – जीवन कौशल के माध्यम से बच्चों को शिक्षा के करीब लाया जाए और दूसरा संकल्प था – शिक्षा के नये तरीके ईजाद किए जाएं, जो बच्चों के व्यक्तित्व का हर तरह से विकास कर सकें।

वर्ष 1979 में मिस इंडिया का खिताब अपने नाम करने वाली स्वरूप का कहना है कि उन्हें चुप रहने से इंकार है इसलिए उन्होंने अध्यापन को चुना। वह शिक्षा को बच्चों का जीवन बेहतर बनाने का जरिया मानती हैं इसीलिए वह हर दिन अपने अभ्यास को धार देती हैं ताकि बच्चों को बेहतर तरीके से शिक्षा दे सकें। वह शिक्षा के नये नये तरीके अपनाती हैं, पाठ्यक्रम को नवाचारी बनाती हैं और बच्चों के लिए इस दुनिया को सुरक्षित और सुंदर बनाने के लिए ढेरों जतन करती हैं। उनकी दुनिया बच्चों और सिर्फ बच्चों के इर्द गिर्द घूमती है।

बरसों पहले कुंदन शाह के धारावाहिक ‘ये जो है जिंदगी’ से अभिनय की दुनिया में कदम रखने वाली स्वरूप संपत ने कुछ और धारावाहिकों और फिल्मों में काम किया और सशक्त अभिनेता परेश रावल से विवाह कर लिया। इसके बाद अभिनय की धारा शिक्षा की ओर मुड़ गई और उन्होंने वारसेस्टर विश्वविद्यालय से पीएचडी की उपाधि ली। उन्होंने अपने शोध को डिस्लेक्सिया से पीड़ित बच्चों पर केंद्रित करके नाटक अथवा ड्रामा को शिक्षा के एक माध्यम के रूप में इस्तेमाल करके बेहतर परिणाम हासिल करने में सफलता पाई।

अनिरूद्ध और आदित्य की मां स्वरूप रावल गुजरात के लवाड प्राइमरी स्कूल में पढ़ाती हैं, लेकिन इसके अलावा भी वह भारतीय समाज के विविध वर्गों तक पहुंचने के लिए शिक्षा के अपने अनूठे तरीकों का प्रयोग करती हैं। उनकी प्रतिभा और समाज को बेहतर बनाने के संकल्प का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि नरेन्द्र मोदी ने गुजरात के मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए उन्हें बच्चों के लिए एक विशेष शैक्षणिक कार्यक्रम का प्रमुख बनाया था। एक प्रशिक्षक के तौर पर वह पूरे देश में भ्रमण करती हैं और शिक्षकों के लिए कार्यशालाओं का आयोजन करती हैं, ताकि उनके अनुभव का लाभ ज्यादा से ज्यादा स्कूली बच्चों तक पहुंच सके।

वर्की फाउंडेशन ने 179 देशों से आए करीब 10 हजार आवेदनों में से दस लोगों का चयन किया है। अगले महीने दुबई में होने वाले ग्लोबल एजुकेशन एंड स्किल्स फोरम में इस पुरस्कार के विजेता की घोषणा की जाएगी, लेकिन इस बात में दो राय नहीं है कि इतने प्रतिष्ठित पुरस्कार के दावेदारों में आना भी अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है।

स्वरूप का कहना है कि अगर उन्हें दस लाख डॉलर का यह इनाम मिला तो वह प्राथमिक स्कूलों में विशेष पाठ्यक्रम तैयार करने के लिए एक थिंक टैंक का गठन करेंगी ताकि देश के हर बच्चे को एक बेहतर भविष्य का रास्ता दिखाया जा सके।