भगवान सूर्य ऊर्जा का अजस्त्र स्त्रोत

१४ जनवरी : मकर संक्रांति पर्व पर विशेष ….

सूर्य नारायण भगवान साक्षात् देवता है। वे ऊर्जा का अजस्त्र स्त्रोत है। सूर्य के बिना सृष्टि की कल्पना नहीं की जा सकती। भगवान सूर्य सबके आत्मा है, पृथ्वी पर चर-अचर, चराचर जीव जगत, वनस्पति सबके संचार का प्राण रुप सूर्य है। अग्नि में विधिपूर्वक डाली हुई आहुति सूर्य के पास ही पहूँचती है – सूर्य से वृष्टि होती है, वृष्टि से अन्न पैदा होता है अन्न से जीवन निर्वाह होता ह। अग्नि सूर्य ही है। क्षण, मुहूर्त, दिन, रात, पक्ष, मास, संवत्सर, ऋतु और युग इनकी काल संख्या सूर्य के बिना नहीं हो सकती। काल का ज्ञान हुए बिना कोई नियम नहीं चल सकता। सूर्य के बिना ऋतुओं का विभाग भी नहीं होगा और उसके बिना वृक्षों में फल और फूल कैसे लग सकते है? खेती कैसे पक सकती है? और विभन्न प्रकार के अन्न कैसे उत्पन्न हो सकते है? सूर्य के बिना जीवन संभव ही नहीं है।

नरेश सोनी ‘स्वतंत्र पत्रकार’

लगभग सभी धर्मों में सूर्य को जीवन प्रदाता माना गया है, देवता भी माना गया है – यह सूर्य का आध्यात्मिक पक्ष है, जिसमें विज्ञान भी अपनी निरंतर खोज करता रहता है। धूप में विटामिन डी होता है जो, शरीर को पुष्ट करता है।

 भारतीय संस्कृति में धर्मग्रंथों में मकर संक्रांति को सूर्य देव के पूजन का, उपासना का दिन माना गया है। सूर्य का मकर राशि में प्रवेश करना मकर संक्रांति कहलाता है। इस दिन से सूर्य उत्तराययण हो जाते हैं शास्त्रों में उत्तरायण की अवधि को देवताओं का दिन तथा दक्षिणायन को देवताओं की रात्रि कहा गया है।

  भारत में समय-समय पर हम पर्व को श्रद्धा, आस्था एवं उमंग के साथ मनाया जाता है। पर्व एवं त्यौहार प्रत्येक देश की संस्कृति तथा सभ्यता को उजागर करते हैं। मकर संक्रांति पर्व का हमारे देश में विशेष महत्व है। इस संबंध में संत तुलसीदास जी ने लिखा है –

  माघ मकरगत रबि जग होई।

 तीरथपतिहि आव सब कोई।।

अर्थात यह कि गंगा, यमुना और सरस्वती के संगम पर प्रयाग में मकर संक्रांति के पर्व के दिन सभी देवी-देवता अपना स्वरुप बदलकर स्नान के लिये आते है। अत: वहाँ मकर संक्रांति पर्व पर स्नान करना अनन्त पुण्यों को एक साथ प्राप्त करना माना जाता है। मकर संक्रांति पर्व प्राय: प्रतिवर्ष १४ जनवरी को पड़ता है।

                इस अवसर पर उत्तर भारत में गंगा यमुना के किनारे बसे गाँवों-नगरों में मेलों का आयोजन होता है। भारत में सबसे प्रसिद्ध मेला बंगाल में मकर संक्रांति पर्व पर ‘गंगासागर’ में लगता है। पौराणिक कथा है कि मकर संक्रांति को गंगा जी स्वर्ग से उतरकर-भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिलमुनि के आश्रम में जाकर सागर में मिल गयी। अत: वहां गंगा सागर नाम से तीर्थ विख्यात हुआ। अत: गंगासागर में प्रतिवर्ष १४ जनवरी को मेला लगता है। इसके अतिरिक्त दक्षिण बिहार के मदार क्षेत्र में भी एक मेला लगता है। मकर संक्रांति पर्व पर इलाहबाद (प्रयाग) के संगम स्थल पर प्रतिवर्ष लगभग एक मास तक माघ मेला लगता है। जहां श्रद्धालु कल्पवास करते है। प्रयाग में प्रति बारह वर्ष में कुम्भ एवं प्रति छ: वर्ष में अर्द्धकुम्भ मेला लगता है जो माघ में ही आयोजित होता है। इस वर्ष २०१९ में प्रयाग में अर्धकुम्भ मेले का प्रथम स्नान १५ जनवरी को होगा।

                यूं तो संपूर्ण भारत में मकर संक्रांति पर्व मनाया जाता है, किन्तु महाराष्ट्र में ऐसा माना जाता है कि मकर संक्रांति से सूर्य की गति तिल-तिल बढ़ती है इसलिए इस दिन तिल के विभिन्न मिष्ठान बनाए जाते हैं। उत्तर भारत में कई स्थानों पर पतंगबाजी होती है तथा उनके स्थानों पर खेल प्रतियोगिताओं के आयोजन होते है।

                पंजाब, जम्मू कश्मीर, दिल्ली, हरियाणा आदि क्षेत्रों पर यह पर्व लोहड़ी के नाम से बहुत ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है और प्राय: सभी स्थानों पर तिल के मिष्ठान बनाकर एक दूसरे को खिलाये जाते है। तमिलनाडु में मकर संक्रांति को ‘पोंगल’ के रूप में मनाया जाता है। इस दिन तिल, चावल, दाल की खिचड़ी बनायी जाती है। तथा नयी फसल को कृषि देवता को अर्पण किया जाता है।

                भारतीय ज्योतिष के अनुसार मकर संक्रांति पर्व को अंधकार से प्रकाश की ओर परिवर्तन माना जाता है।

                भगवान सूर्य ने प्रजापति दक्ष की कन्या अदिति जिनका विवाह कश्यपजी से हुआ था, के गर्भ से जन्म लिया था। प्रत्येक मनुष्य को सूर्य की उपासना करना चाहिए, सूर्य के बारह नाम है जो सामान्यत: सूर्य का ही बोध कराते हैं वैसे सूर्य के अनेक नाम है। जो बारह नाम है वे इस प्रकार है आदित्य, सविता, सूर्य, मिहिर, अर्क, प्रभाकर, मार्तण्ड, भास्कर, भानु, चित्रभानु, दिवाकर तथा रवि। सूर्योपासना से व्यक्ति आरोग्य को प्राप्त होता है।