देवी अनसूया का पातिव्रत्यधर्म, तीन देवियों का घमंड चूर किया

२२ दिसम्बर : भगवान श्री दत्तात्रेय जयंती पर विशेष …

अगहन (मार्गशीर्ष) मास की पूर्णिमा बड़ा ही महत्वपूर्ण दिन है, यह भगवान दत्तात्रेय के आविर्भाव का दिन है जिसे ‘दत्तात्रेय जयंती’ के रूप में मनाया जाता है।

 पुत्र की प्राप्ति के लिये महर्षि अत्रि ने तप किया था, उनके तप से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने महर्षि अत्रि से कहा, ‘‘दत्तों मयाहमिति यद् भगवान स दत्त:’’ अर्थात मैंने अपने आपको तुम्हें दे दिया। फिर विष्णु ही अत्रि के यहां पुत्र रूप में अवतरित हुए।

नरेश सोनी ‘स्वतंत्र पत्रकार’

 भगवान दत्तात्रेय के प्रकट होने के साथ ही, उनके प्रकट होने का संदर्भ महर्षि अत्रि की पत्नी अनसूया के प्रतिव्रतधर्म से जुड़ा है। अनसूया से बढ़ कर उस काल में कोई पतिव्रता स्त्री नहीं थी। श्री लक्ष्मीजी, श्री सतीजी और श्री सरस्वतीजी को अपने पतिव्रत होने का अति गर्व था।

                भगवान को अपने भक्त का अपमान सहन नहीं होता, उन्होंने तीनों देवियों के घमंड को चूर करने के लिये, लीला रची, भगवान को नारद जी के मन में प्रेरणा उत्पन्न की।

                नारद जी घूमते-घूमते देवलोक पहूँचे और तीनों देवियों के समक्ष बारी-बारी से जाकर कहा – अत्रिपत्नी देवी अनसूया के समक्ष आपका सतीत्व नगण्य है। तीनों देवियों को बुरा लगा, उन्होंने अपने-अपने स्वामियों विष्णु, महेश और ब्रह्मा से नारदमुनि की बात बतायी और अपने पतियों से अनसूया के पतिव्रत धर्म की परीक्षा करने को कहा देवताओं ने बहुत समझाया कि, माता अनसूया की परीक्षा मत लो किन्तु देवियों के हठ के सामने उनकी एक न चली। साधू वेश बनाकर तीनों देवता महर्षि अत्रि के आश्रम पहँुचे, उस समय अत्रि आश्रम में नहीं थे।

 अतिथियों को आया देख देवी अनसूया ने उन्हें प्रणाम् किया। फल-मूलादि अर्पित किये किन्तु वे बोले हम लोग तब तक आतिथ्य स्वीकार नहीं करेंगे जब तक आप निर्वस्त्र हो हमारे सामने नहीं आयेंगी।

यह सुनकर देवी अनसूया अवाक् रह गयी। किन्तु आतिथ्यधर्म का अपमान नहीं हो यह सोचकर उन्होंने नारायण तथा अपने पतिदेव का स्मरण किया और फिर मन ही मन बोली यदि मेरा पतिव्रत धर्म सत्य है तो ये तीनों साधू छ: छ: माह के शिशु हो जाय, इतना कहना था कि, तीनों देव छ: मास के शिशु हो गये और रुदन करने लगे। तब माता ने उन्हें गोद में लेकर स्तनपान कराया फिर पालने में झुलाने लगी। ऐसे ही कुछ समय व्यतीत हो जाने पर देवलोक में तीनों देव नहीं पहँुचे तो तीनों देवियाँ अत्यन्त व्याकुल हो गयी। उनके पास नारदजी आये और उन्होंने सही स्थिति को बताया तब तीनों देवियाँ अनसूया के पास आयी और उनसे क्षमा माँगी। अनसूया ने अपने पातिव्रत्य से तीनों देवों को पूर्व रूप में कर दिया। तीनों देवियों ने स्वीकार किया कि माता अनसूया से अधिक कोई पतिव्रता स्त्री नहीं है। तीनों देवों ने माता अनसूया से वर मांगने को कहा, देवी बोली आप तीनों मुझे पुत्ररुप में प्राप्त हो, ‘तथास्तु’ कह कर तीनों देव-देवियां अपने लोक चले गये।

कालान्तर में  तीनों देव अनसूया के गर्भ से प्रकट हुए। ब्रह्मा के अंश से चन्द्रमा, शंकर के अंश से दुर्वासा तथा विष्णु के अंश से दत्तात्रेय जी का जन्म हुआ। इस प्रकार अत्रि तथा अनसूया के पुत्र रूप में दत्तात्रेय जी भगवान् विष्णु के ही अवतार है। तथा अगहन मास की पूर्णिमा को दत्त जयंती मनायी जाती है।

 उज्जैन में दत्त अखाड़ा श्री पंच दशनाम जूना अखाड़ा का क्षिप्रा तट पर स्थान है। वर्तमान में अष्ट कौशल महंत सुंदरपुरी जी महाराज गादीपति है। गादीपति को पीरजी भी कहा जाता है। दत्त अखाड़ा चैतन्य स्थान है।