आसमान से धरती की निगरानी करेगा ‘हिसआइस’ उपग्रह

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान (इसरो) निरंतर उपलब्धियों का इतिहास रचने में लगा है। इसने 15 फरवरी 2017 को एक साथ 104 उपग्रह अंतरिक्ष में प्रक्षेपित किए। दुनिया के किसी भी देश ने अंतरिक्ष अभियान में इससे पूर्व इतने उपग्रह एक साथ कभी नहीं छोड़े थे। अब 2018 में हम देश का सबसे बड़ा, ताकतवर और वजनी स्वदेशी राॅकेट प्रक्षेपण यान, यानी जीएसएलवी मार्क-3 अंतरिक्ष में प्रक्षेपित करने में सफल हुए हैं। यह राॅकेट 640 टन मसलन 200 हाथियों के भार के बराबर था। अपनी पहली ही उड़ान में इसने 3136 किलोग्राम के जीसैट-19 उपग्रह को उसकी कक्षा में प्रक्षेपित कर दिया था। इस कामयाबी का भविष्य में सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि हमारे अंतरिक्ष यात्रियों को भी भेजने का सिलसिला शुरू हो जाएगा। बहरहाल,इससे इंटरनेट की गति बढ़ गई है और अन्य देशों के चार टन वजनी उपग्रहों को प्रक्षेपित करने का महंगा बाजार भी भारत के लिए खुल गया।

प्रमोद भार्गव

हल्के उपग्रह भेजने में भारत ने पहले ही दुनिया में व्यापारिक साख बना ली है। अब भारत ने इसरो द्वारा ही विकसित भू-प्रेक्षण उपग्रह ‘हाइपर स्पेक्ट्रल इमेजिंग सैटेलाइट (हिसआईएस) पीएसएलबी-सी 43‘ अंतरिक्ष में स्थापित कर अद्वितीय सफलता प्राप्त की है। भारतीय धरती के चप्पे-चप्पे पर यह उपग्रह फसलों के लिए उपयोगी जमीन के साथ पर्यावरण संबंधी हितों की खोज-खबर लेगा। इसरो के प्रमुख के सिवम ने बताया कि हिसआईएस पूरी तरह से स्वदेशी और सुपर शॉर्प आई से लैस है। यह कुल 65 प्रकार के रंगों की पहचान करने में सक्षम होगा। इसके काम करने की अवधि पांच साल की रहेगी। इसका प्रमुख उद्देश्य विद्युत चुंबकीय स्पैक्ट्रम के अवरक्त (इनफ्रारेड) और शॉर्टवेव अवरक्त क्षेत्रों के नजदीक दृश्य पृथ्वी की सतह का अध्ययन करेंगे। दुनिया में यह तकनीक कुछ ही देशों के पास हैं। श्री हरिकोटा से छोड़े गए इस राॅकेट के जरिए भारतीय उपग्रहों के अलावा 8 देशों के 30 अन्य उपग्रह भी सफलता पूर्वक अंतरिक्ष की कक्षा में स्थापित किए गए हैं। भारत के ध्रुवीय प्रक्षेपण यान (पीएसएलवी) ने उड़ान भरने के बाद हिसआईएस को प्रक्षेपण के 17 मिनट 27 सेकेंण्ड के बाद कक्षा में स्थापित कर दिया। जैसे ही यह उपग्रह सूर्य-समकालिक कक्षा (सन सिंक्रोनस पोलर आॅर्बिट) में स्थापित हुआ तो वैज्ञानिकों के चेहरे खिल गए। हालांकि 30 अन्य उपग्रह स्थापित करने के लिए चौथे स्तर के इंजन को दो बार फिर से चालू करना पड़ा। हिसआईएस 636.3 किमी की ऊंचाई पर जैसे ही स्थापित हुआ वैसे ही चौथा इंजन बंद हो गया था। नतीजतन इन उपग्रहों को स्थापित करने के लिए ऊंचाई 636.3 किमी से घटाकर करीब 504 किमी करनी पड़ी। इस स्थिति का सामना तब भी करना पड़ा था, जब देश के मौसम उपग्रह एसकैटसेट-1 और अन्य देशों के 5 उपग्रहों को 25 सितंबर 2016 को दो अलग-अलग कक्षाओं में स्थापित किया गया था। हिसआईएस के साथ 29 नैनो और एक माइक्रो उपग्रह स्थापित किए गए हैं। इनमें 23 अमेरिका के और एक-एक आस्ट्रेलिया, कनाडा, फिनलैंड, मलेषिया, नीदरलैंड और स्पेन के है। इन सभी उपग्रहों को इसरो की व्यापरिक ईकाई ‘एंट्रिक्स कार्पोरेषन लिमिटेड‘ के मध्ययम से वाणिज्यिक अनुबंध के तहत शुल्क लेकर प्रक्षेपित किया गया है। मनुष्य का जिज्ञासु स्वभाव उसकी प्रकृति का हिस्सा रहा है। मानव की खगोलीय खोजें उपनिषदों से शुरू होकर उपग्रहों तक पहुंची हैं। हमारे पूर्वजों ने शून्य और उड़न तश्तरियों जैसे विचारों की परिकल्पना की थी। शून्य का विचार ही वैज्ञानिक अनुसंधानों का केंद्र बिंदु है। बारहवीं सदी के महान खगोलविज्ञानी आर्यभट्ट और उनकी गणितज्ञ बेटी लीलावती के अलावा वराहमिहिर,भास्कराचार्य और यवनाचार्य ब्रह्मांण्ड के रहस्यों को खंगालते रहे हैं। इसीलिए हमारे वर्तमान अंतरिक्ष कार्यक्रामों के संस्थापक वैज्ञानिक विक्रम साराभाई और सतीश धवन ने देश के पहले स्वदेशी उपग्रह का नामाकरण ‘आर्यभट्ट‘ के नाम से किया था। अंतरिक्ष विज्ञान के स्वर्ण-अक्षरों में पहले भारतीय अंतरिक्ष यात्री के रूप में राकेश शर्मा का नाम भी लिखा गया है। उन्होंने 3 अप्रैल 1984 को सोवियत भूमि से अंतरिक्ष की उड़ान भरने वाले यान ‘सोयूज टी-11 में यात्रा की थी। सोवियत संघ और भारत का यह साझा अंतरिक्ष कार्यक्रम था। तय है,इस मुकाम तक लाने में अनेक ऐसे दूरदर्शी वैज्ञानिकों की भूमिका रही है,जिनकी महत्वाकांक्षाओं ने इस पिछड़े देश को न केवल अंतरिक्ष की अनंत उंचाइयों तक पहुंचाया, बल्कि अब धन कमाने का आधार भी मजबूत कर दिया। ये उपलब्धियां कूटनीति को भी नई दिशा देने का पर्याय बन रही हैं। दरअसल प्रक्षेपण तकनीक दुनिया के चंद छह-सात देशों के पास ही है। लेकिन सबसे सस्ती होने के कारण दुनिया के इस तकनीक से महरूम देश अमेरिका, रूस, चीन, जापान का रुख करने की बजाय भारत से अंतरिक्ष व्यापार करने लगे हैं। इसरो इस व्यापार को अंतरिक्ष निगम के जरिए करता है। इसरो पर भरोसा करने की दूसरी वजह यह भी है कि उपग्रह यान की दुनिया में केवल यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी को छोड़ कोई दूसरा ऐसा प्रक्षेपण यान नहीं है,जो हमारे पीएसएलवी-सी के मुकाबले का हो। दरअसल यह कई टन भार वाले उपग्रह ढोने में दक्ष है। व्यावसायिक उड़ानों को मुंह मांगे दाम मिल रहे हैं। यही वजह है कि अमेरिका, जर्मनी और ब्रिटेन जैसे विकसित देश अपने उपग्रह छोड़ने का अवसर भारत को दे रहे हैं। हमारी उपग्रह प्रक्षेपित करने की दरें अन्य देशों की तुलना में 60 से 65 प्रतिशत सस्ती हैं। बावजूद भारत को इस व्यापार में चीन से होड़ करनी पड़ रही हैं। मौजूदा स्थिति में भारत हर साल 5 उपग्रह अभियानों को मंजिल तक पहुंचाने की क्षमता रखता है। जबकि चीन की क्षमता दो यान प्रक्षेपित करने की है। बाबजूद इस प्रतिस्पर्धा को अंतिरक्ष व्यापार के जानकार उसी तरह से देख रहे हैं, जिस तरह की होड़ कभी वैज्ञानिक उपलब्धियों को लेकर अमेरिका और सोवियत संध में हुआ करती थी। दूसरे देशों के छोटे उपग्रहों को अंतरिक्ष की कक्षा में स्थापित करने की शुरुआत 26 मई 1999 में हुई थी। और जर्मन उपग्रह टब सेट के साथ भारतीय उपग्रह ओशन सेट भी अंतरिक्ष में स्थापित किए थे। इसके बाद पीएसएलवी सी-3 ने 22 अक्टूबर 2001 को उड़ान भरी। इसमें भारत का उपग्रह बर्ड और बेल्जियम के उपग्रह प्रोबा शामिल थे। ये कार्यक्रम परस्पर साझा थे, इसलिए शुल्क नहीं लिया गया। पहली बार 22 अप्रैल 2007 को ध्रुवीय यान पीएसएलवी सी-8 के मार्फत इटली के ‘एंजाइल‘उपग्रह का प्रक्षेपण शुल्क लेकर किया गया था। हालांकि इसके साथ भारतीय उपग्रह एएम भी था,इसलिए इसरो ने इस यात्रा को संपूर्ण वाणिज्यिक दर्जा नहीं दिया। दरअसल अंतरराष्ट्रीय मानक के अनुसार व्यावसायिक उड़ान वही मानी जाती है,जो केवल दूसरे उपग्रहों का प्रक्षेपण करे। इसकी पहली शुरुआत 21 जनवरी 2008 को हुई, जब पीएसएलवी सी-10 ने इजारइल के पोलरिस उपग्रह को अंतरिक्ष की कक्षा में छोड़ा। इसके साथ ही इसरो ने विश्वस्तरीय मानकों के अनुसार उपग्रह प्रक्षेपण मूल्य वसूलना भी शुरू कर दिया। यह कीमत 5 हजार से लेकर 20 हजार डाॅलर प्रति किलोग्राम पेलोड (उपग्रह का वजन) के हिसाब से ली जाती है। सूचना तकनीक का जो भूमंडलीय विस्तार हुआ है,उसका माध्यम अंतरिक्ष में छोड़े उपग्रह ही हैं। टीवी चैनलों पर कार्यक्रमों का प्रसारण भी उपग्रहों के जरिए होता है। इंटरनेट पर बेबसाइट, फेसबुक, ट्विटर, ब्लाॅग और वाॅट्सअप की रंगीन दुनिया व संवाद संप्रेषण बनाए रखने की पृष्ठभूमि में यही उपग्रह हैं। मोबाइल और वाई-फाई जैसी संचार सुविधाएं उपग्रह से ही संचालित होती हैं। अब तो शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, मौसम, आपदा प्रबंधन और प्रतिरक्षा क्षेत्रों में भी उपग्रहों की मदद जरूरी हो गई है। भारत आपदा प्रबंधन में अपनी अंतरिक्ष तकनीक के जरिए पड़ोसी देशों की सहयता पहले से ही कर रहा है। हालांकि यह कूटनीतिक इरादा कितना व्यावहरिक बैठता है और इसके क्या नफा-नुकसान होंगे,यह अभी भविष्य के गर्भ में है। लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि इसरो की अंतरिक्ष में आत्मनिर्भरता बहुआयामी है और यह देश को भिन्न-2 क्षेत्रों में अभिनव अवसर हासिल करा रही है। चंद्र और मंगल अभियान इसरो के महत्वाकांक्षी अंतरिक्ष कार्यक्रम के ही हिस्सा हैं। अब इसरो शुक्र ग्रह पर भी यान उतारने की तैयारी में है।