काव्य एवं समीक्षा गोष्ठी आयोजित

उज्जैन। राष्ट्रकवि स्व. श्रीकृष्ण ‘सरलÓ जन्मशती वर्ष के अंतर्गत संस्था सरल काव्यांजलि का दशहरा मिलन समारोह सुदामानगर में आयोजित हुआ। यह जानकारी देते हुए संस्था सचिव डॉ. संजय नागर ने बताया कि इस कार्यक्रम में चुनिंदा रचना पाठ एवं उन पर चर्चा का आयोजन हुआ। सर्वप्रथम आजाद हिन्द सरकार के ७५ वर्ष पूर्ण होने पर नेताजी सुभाषचन्द्र बोस का स्मरण किया गया तथा हाल ही में अमृतसर में हुए हादसे में मारे गए नागरिकों को श्रद्धांजलि अर्पित की गई। शायर श्री विजयसिंह गेहलोत ‘साकित उज्जैनीÓ ने ‘खोने का दर्द, पाने की चाहत बनी रही, आँखों में आँसुओं की जरूरत बनी रहीÓ गजल पढ़ी, जिस पर आशीष श्रीवास्तव ‘अश्कÓ ने टिप्पणी करते हुए बिहारी के दोहे से साकित के शेर की तुलना की। डॉ. मोहन बैरागी ने ‘व्योम व्याकरण व्यथा हमारी, देह धरा दर्पण बदले-जीवन पृष्ठों के रचने पर कैसे भाव समर्पण बदलेÓ कविता पढ़ी, जिस पर चर्चा करते हुए डॉ. पुष्पा चौरसिया ने इसे आंतरिक और बाह्य संवेदना तथा विद्रूपता का कुशल चित्रण बताया। हेमन्त भोपाळे ने ‘पनघट पर बनते हैं कुछ महीन से रिश्ते, कुछ कहने की व्याकुलता से बनते हैं कुछ महीन से रिश्तेÓ कविता पढ़ी, जिस पर चर्चा करते हुए राजेन्द्र देवधरे ‘दर्पणÓ ने रिश्तों के कमतर होते जाने की कवि की चिंता पर सहमति जताई। आशीष श्रीवास्तव ‘अश्कÓ ने ‘भले ही वो रंजिशो में जलता रहा, मगर चलने को साथ चलता रहाÓ, गजल पढ़ी जिस पर डॉ. विजय सुखवानी ने विस्तार से चर्चा करते हुए अश्कजी के भाव पक्ष और तकनीकी पक्ष दोनों को प्रबल बताया। कोमल वाधवानी ‘प्रेरणाÓ की कविता ‘रावण का प्रश्नÓ के वाचन पर संतोष सुपेकर ने इन्हें आज के ज्वलंत एवं सामयिक प्रश्न बताया। आशागंगा शिरढोणकर ने लघुकथा ‘नकाबपोशÓ का पाठ किया, जिस पर चर्चा करते हुए संतोष सुपेकर ने इसे आज की पीढ़ी को सबक देती, लेखकीय कौशल से भरपूर रचना बताया। दौलतसिंह कुशवाह, डॉ. विजय सुखवानी, हरीश अंधेरिया, धनसिंह चौहान, संतोष सुपेकर, राजेन्द्र देवधरे ‘दर्पणÓ ने भी कविता पाठ किया। अतिथि पूर्व न्यायाधीश शशिमोहन श्रीवास्तव एवं वरिष्ठ साहित्यकार एवं चित्रकार श्री राजेन्द्र सक्सेना थे। अध्यक्षता डॉ. पुष्पा चौरसिया ने की। अतिथि स्वागत श्री एम.जी. सुपेकर ने किया। सरस्वती वंदना हरीश अंधेरिया ने गाई। संचालन राजेन्द्र देवधरे ‘दर्पणÓ ने तथा अंत में आभार प्रदर्शन संतोष सुपेकर ने किया।