खुद को जाहिर करने के लिए जिएं

जीवन एक संग्राम है। इसमें हिम्मत और संकल्प के साथ जो जूझता है, वह विजयी होता है। जो हिम्मत हार गया, समझो जिंदगी का दांव हार गया। जीवन को सफल एवं सार्थक बनाने के लिये दृष्टिकोण साफ होना जरूरी है तभी आचार और व्यवहार भी साफ रहता है। संकल्प ही फलवान बनता है।

ललित गर्ग

हर व्यक्ति विकास करना चाहता है। कोई भी व्यक्ति जैसा है, वैसा ही नहीं रहना चाहता। वह मनुष्य की प्रकृति है कि वह अपनी वर्तमान स्थिति से संतुष्ट नहीं होता। वह आगे बढ़ना चाहता है, प्रगति करना चाहता है। वह स्वस्थ, सरस और सफल जीवन की चाह रखता है, उसके लिये  महत्वपूर्ण मंत्र है-सकारात्मक चिंतन। प्राचीन एवं अर्वाचीन युग की अनेक असाध्य बीमारियों की रामबाण औषध है-सकारात्मक विचारपूर्ण जीवन शैली। विधायक धारणा और यथार्थपरक सोच ऐसे शक्तिशाली हथियार हैं जिसका वार कभी खाली नहीं जाता। समाज में परिव्याप्त अधिकांश समस्याओं के दानवों का सफाया सकारात्मक चिंतन के शस्त्र से हुआ है, हो रहा है और होता रहेगा।

मनीषी विचारकों ने इसे महायज्ञ जैसा पवित्र माना है। इस महायज्ञ में हर कोई सम्मिलित हो सकता है। इस अनुष्ठान में निर्धन, निराश्रित, निम्नस्तरीय व्यक्ति भी शामिल हुए हैं और अपने जीवन में कल्पनातीत विकास किया है। जन्म से अंधी-बहरी हेलन कीलर ने आशा के तार पर चढ़कर जीवन की स्याह बनती रातों को उजालों से भर दिया था। सफल वक्ता और सुप्रसिद्ध लेखिका बनने में सम्यक् चिंतन ही प्रथम मददगार बना। अन्य सहायकों-श्रमशीलता, संकल्पबद्धता और सतत प्रोत्साहन ने उसे फर्श से अर्श तक पहुंचा दिया था।

जन्म से ही लकवाग्रस्त होने के कारण नौ वर्ष की आयु तक केलिपर्स के सहारे चलने वाली विल्मा रुडोल्फ ने सकारात्मक मनोवृत्ति के सहारे और मां की प्रेरणा से वह कर दिखाया जो असंभव लग रहा था। एक दिन उसने मां से कहा-मैं दुनिया की सबसे तेज धाविका बनना चाहती हूं पर डाॅक्टर ने तो चलने के लिए भी मना किया है कैसे अभ्यास करूं?

मां ने धीरज देते हुए कहा-स्वयं पर विश्वास, परमात्मा में आस्था, मेहनत और लगन से तुम जो चाहो वह प्राप्त कर सकती हो। बस नकारात्मक व निराशाजनक भावों की केंचुली को उतारकर फैंक दो। मां के शब्दों ने जादू का सा असर किया। विल्मा ने दौड़ प्रतियोगिता में हिस्सा लेना शुरू कर दिया। वह हमेशा आखिरी स्थान पर आती रही। परंतु निरंतर अभ्यास और उत्साह के सहारे एक दिन उसने प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त कर अपने सपने को सच कर दिखाया। यह बात इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गयी कि एक लकवाग्रस्त लड़की 1960 के रोम ओलम्पिक में दुनिया की सबसे तेज धाविका बन गई। अच्छा या बुरा, सब होता रहता है। मायने इसी बात के हैं कि आपके जेहन में क्या चल रहा है? आप क्या सोच रहे हैं? अपनी सोच के अलावा किसी और चीज पर हमारा काबू भी नहीं होता। हमारे ज्यादातर दुख हमारी अपनी उम्मीदों से पैदा होते हैं। जो हो रहा होता है, उसके लिए हमारे दिमाग में कोई और ही तस्वीर होती है। नतीजा ये कि ‘जो है’ से ज्यादा हम ‘जो होना चाहिए’ उस पर नहीं सोचते।

अमूमन आदमी भूत और भावी के चक्रव्यूह में उलझकर वर्तमान को विस्मृत कर देता है। याद रहे कि वर्तमान काल का मूल्यवान मोती स्मृतियों और कल्पनाओं के दरिये में खोने वाला मानव जिंदगी के हर मोड़ पर असफलता का दंश झेलने को विवश हो जाता है। कभी हम अवसरों का इंतजार कर रहे होते हैं तो कभी नतीजों का। ये इंतजार जितना लंबा होता है, बेचैनी उतनी बढ़ती जाती है। पर यहीं जरूरत होती है, चलते रहने की, काम करने की, और नया सीखने की। कवि युआन वूल्फंग वॉन गोइठा कहते हैं कि मायने इस बात के नहीं हैं कि लक्ष्य हासिल करके हमें क्या मिला? मायने इस बात के हैं कि हम उन्हें हासिल करने की प्रक्रिया में क्या बन गए हैं?

हिंदी भाषा में बीते हुए या हो चुके कार्य को भूत कहते हैं। भूत का एक अर्थ प्रेतात्मा भी होता है इसलिए भूत यानी गुजरी बातों को याद करने वाला ‘‘यथा मति तथा गति’’ के अनुरूप कदाचित् भूत भी बन सकता है। गड़े मुर्दे उखाड़ने वाला कभी भी सही धारणा को पुष्ट नहीं कर सकता और न कोई विशेष उपलब्धि हासिल कर सकता है। जब जिंदगी सही चल रही होती है तो हर चीज आसान लगती है। वहीं थोड़ी सी गड़बड़ होने पर हर चीज कठिन। या तो सब सही या सब गलत। संतुलन बनाना हमारे लिए मुश्किल होता है। लेखक जेम्स बराज कहते हैं, ‘आज में जिएं। याद रखें कि वक्त कैसा भी हो, बीत जाता है। अपनी खुशी और गम दोनों में खुद पर काबू रखें।’

महान् महर्षियों ने सही विचार को जीवन निर्माण की रीढ़ कहा है। इससे भी बढ़कर क्रांतिकारी उद्घोषणा करते हुए भगवान महावीर ने कहा-सकारात्मक चिंतन सम्यक् दर्शन का जनक है, धर्म है और मोक्ष का प्रथम सोपान है। इसके विपरीत नकारात्मक चिंतन मिथ्या-दर्शन का जनक है, पाप है और मोह का अभिन्न सहचर है।

निराशा, अकर्मण्यता, असपफलता और उदासीनता के अंधकार को मात्र एक आत्मविश्वास और आशा भरे दीप से पराजित किया जा सकता है। नतीजों के लिए धैर्य रखना आसान नहीं होता। हम कई बार ऐसे क्षणों में धैर्य खो बैठते हैं, जहां से बनी-बनाई चीजें भी बिगड़ने लगती हैं। दार्शनिक रूमी कहते हैं, ‘केवल खाली बैठना धैर्य नहीं होता। वो दूर तक देखने वाली नजर होती है। वो कांटों को देखते हुए गुलाब के नजारे लेती है। रात को देखते हुए सुबह के मजे लेती है। प्रेमी धैर्यवान होते हैं। वे जानते हैं कि चांद को पूनम का चांद बनने में समय लगता है।’

संस्कृत साहित्य में एक प्रश्न आता है-रत्नों का ज्ञान और उनकी परख किसे होती है? उत्तर दिया गया-इसका पता शास्त्र से नहीं होगा। शास्त्र में तो लक्षण बताए गए कि ऐसा हो तो समझा जाए कि हीरा है, पन्ना है या मोती, माणिक है। लेकिन वह सच्चा और खरा हीरा है या खोटा, यह शास्त्र नहीं बताएगा। यह तो बताएगी हमारी दृष्टि और हमारा अभ्यास। सब जगह अभ्यास की जरूरत होती है, हर अच्छी बात का अभ्यास करें मन में यह बात घर जाए कि अभ्यास के बिना किसी भी काम में सफलता नहीं मिलेगी। अभ्यास के द्वारा दृष्टि साफ होगी। दृष्टि साफ होगी तो विवेक का जागरण होगा और विवेक जाग गया तो सफलता ही सफलता है। हम अपने मन की कम जीते हैं, दूसरों की परवाह ज्यादा करते हैं। यही वजह है कि हम अकसर नाखुश दिखते हैं। तो क्या करें? कहा जाता है कि हमेशा अच्छे मकसद के लिए काम करें, तारीफ पाने के लिए नहीं। खुद को जाहिर करने के लिए जिएं, दूसरों को खुश करने के लिए नहीं। ये कोशिश ना करें कि लोग आपके होने को महसूस करें। काम यूं करें कि लोग तब याद करें, जब आप उनके बीच में ना हों।