खुदीराम बोस : जिंदा रहने के मौसम बहुत थे मगर…….

नयी दिल्ली, उसका बचपन बस बीता ही था, उसके साथी जब पढ़ाई परीक्षा के बारे में सोच रहे थे, वह क्रांति की मशाल रौशन कर रहा था, जिस उम्र में लोग जिंदगी के हसीन ख्वाब बुनते हैं, वह वतन पर निसार होने का जज्बा लिए हाथ में गीता लेकर फांसी के फंदे की तरफ बढ़ गया और देश की आजादी के रास्ते में अपनी शहादत का दीप जलाया। यह था अमर शहीद खुदीराम बोस।

खुदीराम के बगावती तेवरों से घबराई अंग्रेज सरकार ने मात्र 18 वर्ष की आयु में उन्हें फांसी पर लटका दिया, लेकिन उनकी शहादत ऐसा कमाल कर गई कि देश में स्वतंत्रता संग्राम के शोले भड़क उठे। बंगाल के जुलाहे एक खास किस्म की धोती बुनने लगे, जिसके किनारे पर ‘खुदीराम’ लिखा रहता था। स्कूल कालेजों में पढ़ने वाले लड़के इन धोतियों को पहनकर सीना तानकर आजादी के रास्ते पर चल निकले।

भारतीय स्वाधीनता संग्राम में जान न्योछावर करने वाले प्रथम सेनानी खुदीराम बोस माने जाते हैं। वह आज ही के दिन यानी 11 अगस्त को केवल 18 साल की उम्र में देश के लिए फांसी के फंदे पर झूल गए थे। उनकी शहादत ने हिंदुस्तानियों में आजादी की जो ललक पैदा की उससे स्वाधीनता आंदोलन को नया बल मिला।

खुदीराम बोस का जन्म बंगाल में मिदनापुर जिले के हबीबपुर गांव में हुआ था। 3 दिसंबर 1889 को जन्मे बोस जब बहुत छोटे थे तभी उनके माता-पिता का निधन हो गया। उनकी बड़ी बहन ने उनको पाला पोसा। बंगाल विभाजन (1905) के बाद खुदीराम बोस मात्र 16 वर्ष की आयु में स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े।

हालांकि, वह अपने स्कूली दिनों से ही जलसे-जलूसों में शामिल होकर ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ नारे लगाते थे। उन्होंने नौवीं कक्षा में पढ़ाई छोड़कर सिर पर कफन बांध लिया। बाद में वह रेवोल्यूशन पार्टी के सदस्य बने। 28 फरवरी 1906 को पुलिस ने उन्हें इश्तहार बांटते पहली बार पकड़ा, लेकिन वह भागने में सफल रहे। तीन महीने बाद 16 मई 1906 को वह एक बार फिर गिरफ्तार किए गए, लेकिन उनकी आयु कम होने के कारण उन्हें चेतावनी देकर छोड़ दिया गया।

देखते देखते खुदीराम क्रांति के रास्ते पर आगे निकल गए। 6 दिसंबर, 1907 को बंगाल के नारायणगढ़ रेलवे स्टेशन पर बम विस्फोट की घटना में वह शामिल थे। इस दौरान क्रांतिकारियों के खिलाफ कलकत्ता (अब कोलकाता) में किंग्सफर्ड चीफ प्रेजिडेंसी मजिस्ट्रेट के सख्त और क्रूर रवैये को देखते हुए क्रांतिकारियों ने उसकी हत्या का फैसला किया और इस काम के लिए खुदीराम बोस तथा प्रफुल्ल चंद को चुना गया।

दोनों क्रांतिकारियों ने आठ दिन किंग्सफर्ड की दिनचर्या नजर रखी। वह शाम को एक क्लब में जाया करते थे। दोनों ने उसके क्लब से निकलने के समय उसपर हमला करने की योजना के अनुरूप 30 अप्रैल 1908 को एक बग्घी पर बम फेंका, जिसमें किंग्सफर्ड के होने का अनुमान था, लेकिन उस दिन वह कुछ देर बाद क्लब से निकला और उसके धोखे में बग्घी में सवार दो महिलाओं की मौत हो गई।

हालांकि खुदीराम और प्रफुल्ल चंद को यही लगा कि कि किंग्सफर्ड मारा गया है। दोनों करीब 25 मील भागने के बाद एक रेलवे स्टेशन पर पहुंचे। बोस पर पुलिस को शक हो गया और पूसा रोड रेलवे स्टेशन (अब यह स्टेशन खुदीराम बोस के नाम पर है) पर उन्हें घेर लिया गया। खुद को घिरा देख प्रफुल्ल चंद ने स्वयं को गोली मार ली पर खुदीराम पकड़े गए।

खुदीराम बोस पर हत्या का मुकदमा चला और सिर्फ पांच दिन में मुकदमे का फैसला हो गया। 8 जून, 1908 को उन्हें अदालत में पेश किया गया और 13 जून को उन्हें मौत की सजा सुनाई गई। 11 अगस्त, 1908 को उन्हें फांसी पर चढ़ा दिया गया। इतिहासकारों के अनुसार खुदीराम सबसे कम उम्र में फांसी पर चढ़ने वाले क्रांतकारी थे।

मुजफ्फरपुर जेल में खुदीराम को फांसी पर लटकाया गया। इस मौके पर वहां मौजूद लोगों का कहना था कि खुदीराम बोस एक शेर की तरह निडर होकर फांसी के तख्ते की ओर बढ़े थे।

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