गुरु को मत ढूंढो, अपने अंदर पात्रता पैदा करो तो वह स्वयं आ जाएगा- संत सुमनभाई

उज्जैन। गुरु को मत ढूंढो, अपने अंदर शिष्य बनने की पात्रता पैदा करो तो सद्गुरु तुम्हें स्वयं ही खोज लेगा। गुरु कोई पदार्थ नहीं, जिसे तुम भौतिक तुला पर तौल लो। गुरु एक तत्व है जो तुम्हें दृष्टि देता है। अगर तुम अपने अहंकार को विसर्जित करने के लिए तैयार हो तभी अपने जीवन में गुरु बनाओ। एक कुम्हार की तरह गुरु शिष्य को घड़े की तरह तैयार करता है, पात्र बनाता है। जीवन में गुरु ही ऐसा होता है, जिसे तुम अपनी सभी बातें बता सकते हो। ये उद्गार श्री मौनतीर्थ पीठ के पीठाधीश्वर गुरुदेव संत श्री सुमनभाई ‘मानस भूषणÓ ने श्री मौनतीर्थ पीठ में गुरुपूर्णिमा महोत्सव पर व्यक्त किए। इस अवसर पर संत श्री ने करीब डेढ़ हजार अनुयायियों को दीक्षा भी दी।

श्री मौनतीर्थ पीठ में नवनिर्मित ब्रह्मलीन श्री श्री मौनीबाबा जी महाराज के समाधि स्थल पर संत श्री सुमनभाई ने श्रद्धालुओं का मार्गदर्शन किया। उन्होंने कहा अगर आप गुरु को खोजने जाएंगे तो किसी के भी प्रभाव में आ जाएंगे, जैसा कि अभी समाज में देखने को मिल रहा है। संतश्री ने कहा मेरे जीवन में जो प्राण चल रहे हैं, वे मेरे सद्गुरु श्री श्री मौनीबाबाजी महाराज की असीम कृपा के कारण है। जन्म के 24 घंटे बाद ही उनके प्राण निकल गए थे, लेकिन श्री मौनीबाबाजी महाराज ने अपनी साधना से मेरे शरीर में प्राणों का संचार कर चेतना लौटाई। इस तरह मात्र 7 दिन की आयु में ही द्विज हो गया था। मेरे सद्गुरु ने मुझे दूसरा जन्म दिया, जिससे द्विज हुआ। बाबा कहा करते थे शरीर न रहने पर भी वे सूक्ष्म शरीर में समाधि स्थल पर रहेंगे और भक्तों का कल्याण करेंगे। ऐसा भी हो रहा है, अनेक भक्तगण यहां श्री श्री मौनीबाबा की विशाल प्रतिमा की 108 परिक्रमा कर अपनी मुरादे लेकर आ रहे हैं।

संतश्री ने कहा श्री श्री मौनीबाबा मेरे सद्गुरु थे, मेरे पिता और मित्र भी थे। हम सभी जीवन में किसी न किसी को अपना मित्र बनाते हैं। बहुत सी बातें हम माता से, पिता से और परिवार के अन्य लोगों से छिपा लेते हैं, लेकिन मित्र से साझा कर लेते हैं। कुछ बातें ऐसी भी होती हैं, जो मित्र से साझा नहीं कर सकते, वे केवल गुरु के समक्ष ही प्रकट कर सकते हैं। इसलिए हमारे जीवन में किसी न किसी गुरु का होना आवश्यक है। कबीर ने कहा है- ‘गुरु कुम्हार, सिष कुंभ है, गढ़गढ़ काढ़ै खोट।Ó अर्थात् गुरु की भूमिका हमारे जीवन में उस कुम्हार की तरह होती है, जो मिट्टी के घड़े बनाता है। ये संपूर्ण जगत् सद्गुरु की चाक है, जिस पर हम सब घूम रहे हैं। हम जगत् में हैं और जगत् के साथ घूम रहे हैं। जिस तरह चाक पर रखी माटी घूमती है। सद्गुरु की दृष्टि हम पर टिकी हुई है। सही समय पर वह सद्गुरु हमारा जगत् से संबंध ठीक वैसे ही काट देता है जिस तरह एक कुम्हार चाक पर घूमती माटी को एक धागे से काटकर अलग कर देता है। फिर वह अपनी साधना और तपस्या की अग्नि से तपाकर पात्रों को पकाता है, परिपक्व करता है। वह गुरु हमें पात्र बनाता है। यह कार्य कोई सद्गुरु ही कर सकता है। परंतु इसके लिए शिष्य को सर्वप्रथम समर्पण करना होता है। चाक की माटी अलग होकर सद्गुरु के हाथ में जब पहुंचती है तो वह पूर्णत: सद्गुरु को समर्पित हो जाती है। ऐसा समर्पण ही हमारे अंदर आ जाए तभी हम पात्र बनकर निखर सकते हैं। समर्पण के बाद सद्गुरु पर सब छोड़ देना चाहिए। पात्र बनाने के लिए वह हमें कष्ट भी देगा, अहंकार पर चोट भी करेगा और तपस्या की अग्नि में तपने के लिए भी छोड़ेगा। जिस तरह कुम्हार अपने कच्चे घड़ों को अग्नि में तपाने के लिए छोड़ देता है। गुरु के प्रति ऐसा समर्पण, ऐसा विश्वास का भाव उत्पन्न करने आती है गुरुपूर्णिमा। मेरे बाबा, मेरा सद्गुरु अंतर्यामी था, तभी तो उसने मेरे भीतर की पात्रता को देखकर मृत्यु के मुख से मुझे निकालकर प्राणों का संचार कर दिया।

गुरुपूर्णिामा यह संदेश देने भी आती है कि हम जीवन में अच्छे शिष्य बनें। कुम्हार जब मिट्टी के पात्र बनाता है तो वह सबसे पहला काम यही करता है कि अच्छी मिट्टी कौनसी है। अर्थात् मिट्टी में पात्रता होना अत्यंत आवश्यक है। अगर आप पात्र हो तभी शिक्षक बन सकते हो, डॉक्टर बन सकते हो। जैसी पात्रता वैसा फल प्राप्त होता है, लक्ष्य प्राप्त होता है। लक्ष्य जितना उंचा होगा वही हमें प्राप्त हो सकता है। अगर हम गुरु का चयन करने निकलेंगे तो हमारा चयन गलत भी हो सकता है। मिट्टी के पात्र बनाने के लिए मिट्टी का चयन करने तो एक कुम्हार ही निकलता है। इतना अवश्य हो सकता है कि परिस्थिति आपको सद्गुरु के द्वार तक पहुंचा दे और उसकी दृष्टि आप पर पड़ जाए। इतना भी हो जाए तो बहुत है। यह घटना प्रारब्ध के कारण ही हो सकती है। परंतु पात्र व्यक्ति का, शिष्य का चयन गुरु ही कर सकता है। गुरु की दृष्टि पहचान लेती है कि किसमें शिष्य बनने का सामर्थ्य है।

भंडारे में प्रसादी ग्रहण की भक्तों ने
गुरुपूर्णिमा महोत्सव पर देशभर से अनेक श्रद्धालुजन श्री मौनतीर्थ पीठ आए और उन्होंने श्रीमौनतीर्थ पीठ परिसर स्थित श्री श्री मौनीबाबा महाराज के दिव्य समाधि स्थल पर गुरुपाद पूजन किया और आशीर्वाद प्राप्त किए। भक्तों ने संतश्री सुमनभाई जी की भी चरण वंदना की। गुरुपाद पूजन किया गया। संत श्री ने समाधि स्थल पर श्रीश्री मौनीबाबा की दिव्य, चेतनामय प्रतिमा के सान्निध्य में सभी भक्तजनों को आशीर्चाचन दिया।

श्रावण महोत्सव में पार्थिव शिव लिंग निर्माण
श्री मौनतीर्थ पीठ में गुरुपूर्णिमा महोत्सव के साथ ही श्रावण महोत्सव आरंभ हुआ, जो 26 अगस्त तक निरंतर चलेगा। इस वर्ष संत श्री सुमनभाई के सान्निध्य में पार्थिव शिवलिंग निर्माण व महारूद्राभिषेक का आयोजन हो रहा है। शिवभक्त श्री मौनतीर्थ पीठ में प्रतिदिन आस्था और भक्ति के साथ मिट्टी के शिवलिंग बनाएंगे। सवा करोड़ शिवलिंग का निर्माण यहां होगा। सवा करोड़ पार्थिव शिवलिंग निर्माण के उपरांत वैदिक पद्धति से महाभिषेक व महारूद्राभिषेक के साथ विसर्जन होगा। श्रावण मास देवाधिदेव शिव का प्रिय मास है। ज्योतिर्लिंग महाकालेश्वर की नगरी में शिव-आराधना का अत्यंत महत्व है।