हिमा दास : विश्व एथलेटिक्स चैंपियनशिप के नक्शे पर भारत के नाम की पहली सुनहरी मोहर

नयी दिल्ली, असम के एक छोटे से गांव की सांवली छरहरी सी लड़की जब दौड़ी तो एक मिनट से भी कम समय में विश्व एथलेटिक्स के नक्शे पर भारत के नाम की पहली सुनहरी मोहर लगा दी। अपने कारनामे का एहसास होते ही गले में असमी गमछा और कंधों पर तिरंगा लपेट लिया। विजेता मंच पर पहुंची तो राष्ट्रगान बजते ही उसकी निगाहें अपलक राष्ट्रीय ध्वज का निहारती रहीं और आंखों से आंसू बह निकले।

यह है रातोंरात देश की सनसनी बनी 18 बरस की हिमा दास, जिसने फिनलैंड के तांपेरे में आयोजित आईएएएफ विश्व अंडर 20 एथलेटिक्स चैंपियनशिप की 400 मीटर स्पर्धा के फाइनल में 51.46 सेकंड का समय लेकर स्वर्ण पदक जीता। यह ट्रैक स्पर्धा में भारत की पहली स्वर्णिम सफलता है।

हिमा की जीत पर राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी, खेल मंत्री राज्यवर्द्धन सिंह राठौर और क्रिकेट तथा बॉलीवुड की दुनिया के बहुत से लोगों ने उन्हें बधाई दी और उन्हें देश का गौरव बताया।

देश को यह अद्भुत सम्मान दिलाने वाली हिमा की सफलता की कहानी कोई बहुत पुरानी नहीं है। पिछले कुछ ही समय में वह आंधी की तरह उठी और स्वर्ण पदक ले उड़ी। फेडरेशन कप में 400 मीटर की दौड़ 51.97 सेकंड में जीतने के बाद उसने कॉमनवेल्थ खेलों में दौड़ने का हक हासिल किया और आस्ट्रेलिया के गोल्ड कोस्ट में अप्रैल में हुए कॉमनवेल्थ खेलों में वह 400 मीटर दौड़ के फाइनल में छठे स्थान पर रही, लेकिन महत्वपूर्ण बात यह रही कि उसने क्वालीफाइंग दौर में 51.53 का समय निकला, जो उसके अब तक के सर्वश्रेष्ठ समय से .44 सेकंड कम था।

फिनलैंड जाने से पहले हिमा ने पिछले महीने गुवाहाटी में इंटर स्टेट सीनियर एथलेटिक्स चैंपियनशिप में जीत हासिल करके अपनी अगली जीत की सुनहरी लकीर खींचना शुरू कर दिया था। चैंपियनशिप में वह 51.13 का समय लेकर अव्वल रही। उसकी जीत की उम्मीद इसलिए बढ़ गई क्योंकि फिनलैंड में 400 मीटर स्पर्धा में भाग लेने वाली खिलाड़ियों में सिर्फ अमेरिका की एक खिलाड़ी ने उससे कम समय निकाला था।

मध्य असम के ढिंग कस्बे से करीब पांच किलोमीटर के फासले पर स्थित कंधूलीमारी गांव में धान की खेती करने वाले रंजीत दास और जोमाली के यहां जन्मी हिमा के चार और भाई बहन थे और सीमित साधनों के साथ उसके पिता के पास इतना पैसा नहीं था कि उसकी कोचिंग का बड़ा खर्च बर्दाश्त कर सकें। हालांकि यह मुश्किल हालात हिमा को आगे बढ़ने से रोक नहीं पाए।

परिवार को जानने वाले लोगों का कहना है कि हिमा अपने पिता के धान के खेतों में दौड़ लगाया करती थी और लड़कों के साथ फुटबाल खेलती थी। यह करीब दो साल पहले की बात है कि उसके दौड़ने का अंदाज और बिजली की सी कौंध देखकर एक स्थानीय कोच ने उसे एथलेटिक्स में हाथ आजमाने की सलाह दी।

हिमा के एक शुरूआती कोच का कहना है कि उन्होंने हिमा को कुछ बुनियादी प्रशिक्षण दिया और उसकी कुदरती रफ्तार में कोई तब्दीली नहीं की। अपने दौड़ने के नैसर्गिक अंदाज के साथ हिमा अपने से कहीं तगड़ी लड़कियों पर भारी पड़ी और पीछे मुड़कर नहीं देखा। उल्लेखनीय है कि दुनियाभर में धावकों को तमाम तरह का प्रशिक्षण दिया जाता है, जबकि हिमा की औपचारिक ट्रेनिंग बहुत कम हुई और उसने स्थानीय स्तर पर जब दौड़ स्पर्धाओं में हिस्सा लेना शुरू किया तो उसके पास अच्छे जूते तक नहीं थे।

दुनिया के नक्शे पर भारतीय एथलेटिक्स को पहली बार जगह दिलाने वाली हिमा की उम्र अभी बहुत कम है और उम्मीद है कि कई और बड़ी प्रतियागिताओं में वह इसी तरह भारत के नाम का परचम लहराएगी।