रजत शर्मा : खुदी को कर बुलंद इतना……

नयी दिल्ली,  टेलीविजन के पर्दे पर बड़े बड़े नेताओं, अभिनेताओं, संतों और खिलाड़ियों को कटघरे में बिठाकर उनपर संगीन इलजाम लगाने वाले रजत शर्मा अब एक नयी पारी खेलने के लिए तैयार हैं। दिल्ली जिला क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष पद का चुनाव जीतना चुनावी राजनीति में उनका पहला कदम कहा जा सकता है।

रजत शर्मा एक ऐसा नाम है, जो माटी से उठकर आसमान छू लेने के संघर्ष और सफलता की एक प्रेरक कहानी कहता है। वह कहने को भले ही टीवी एंकर हैं, लेकिन उनके राजनीतिक कद का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि वह जिस पद पर चुने गए हैं, उसपर 1998 से 2013 तक वित्त मंत्री अरूण जेटली काबिज थे।

इंडिया टीवी के चेयरमैन और एडिटर इन चीफ रजत शर्मा के लोकप्रिय शो ‘‘आप की अदालत’’ और ‘‘आज की बात’’ उन्हें सफलता के उस पायदान तक ले गए, जहां पहुंचने का लोग सपना देखा करते हैं। इस शो के लिए उन्हें कई बार बेस्ट एंकर के अवार्ड से नवाजा गया। उन्हें इंडियन टेलीविजन एकेडमी ने लाइफटाइम एचीवमेंट अवार्ड भी दिया।

18 फरवरी 1957 को दिल्ली में जन्मे रजत शर्मा का बचपन बहुत मुफलिसी में बीता। कपिल शर्मा के एक शो के दौरान अपनी जिंदगी के संघर्ष का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया था कि पुरानी दिल्ली में, सब्जी मंडी के पास तीन मंजिला मकान की तीसरी मंजिल पर एक छोटे से कमरे में वह अपने माता पिता, सात भाई बहनों के साथ रहते थे। उन्होंने रूंधे गले से कहा था कि बहुत बार घर में खाने के पैसे नहीं होते थे तो पूरा परिवार भूखे पेट सो जाता था।

रजत सरकारी स्कूल में पढ़ते थे। मिडिल स्कूल में उनके अच्छे नंबर आये तो एक मेहरबान टीचर ने उनका दाखिला रामजस स्कूल में करा दिया। स्कूल उनके घर से खासा दूर था, लेकिन किराए के पैसे न होने के कारण रोज पैदल आना जाना होता था। यह सिलसिला तीन साल तक चला।

हायर सेकेंड्री में अच्छे नंबर आये तो रजत का एडमिशन श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स में हो गया। यह ऐसा संस्थान था जहां बहुत बड़े-बड़े घरों के लोग पढ़ने आते थे। यहां उन्हें अरुण जेटली, रंजन भट्टाचार्य, अतुल कुंज, रोहिंटन नरीमन जैसे लोगों का साथ मिला और उनके लिए एक नयी दुनिया के रास्ते खुलने लगे। हालांकि उन्होंने ऊंची उड़ान के लिए अपने पंख नहीं तौले और बस बीकॉम ऑनर्स करके फोर फिगर वेतन की उम्मीद लगाए थे।

वह खुद नहीं जानते थे कि किस्मत उनके सपनों में धीरे धीरे रंग भर रही थी। बी कॉम करने के बाद उन्होंने एम कॉम करने का इरादा किया। इस दौरान वे जनार्दन ठाकुर से मिले, जिन्हें अपने फीचर सिंडिकेशन के लिए एक रिसर्चर की जरूरत थी। रजत उनके लिए काम करने लगे और इस दौरान अन्य पत्रिकाओं में भी अपने लेख भेजने लगे।

‘ऑनलुकर’ पत्रिका में लिखे उनके लेख के लिए उन्हें 500 रूपए मिले और पत्रिका के संपादक ने बुलाकर काम करने का न्यौता दिया। इस तरह 1982 में उन्हें पहली नौकरी मिली और तीन साल में वह पत्रिका के संपादक बन गए।

इस दौरान ओत्तावियो क्वात्रोच्चि पर पहली स्टोरी और इंटरव्यू रजत शर्मा ने किया, चंद्रास्वामी को एक स्टिंग ऑपरेशन के तहत एक्सपोज किया, गिरफ्तार होकर तिहाड़ जेल पहुंचे और वहां इंदिरा गांधी के हत्यारे सतवंत सिंह से बातचीत करके स्टोरी की। इसके बाद वह ‘संडे ऑब्जर्बर’ अखबार से जुड़े और उसके संपादक बने।

1992 में जी न्यूज के प्रमुख सुभाष चंद्रा से उनकी मुलाकात उनके भाग्य का निर्णायक मोड़ साबित हुई। उन्होंने ‘आपकी अदालत’ पर चर्चा की और यह शो शुरू हुआ। ‘आपकी अदालत’ के बाद का किस्सा किसी परीलोक की गाथा जैसा है। 1995 में उन्होंने भारत के पहले प्राइवेट टेलीविजन न्यूज़ चैनल की शुरुआत की और यह भारतीय मीडिया के इतिहास में एक मील का पत्थर साबित हुआ।

किसी भी व्यक्ति की सफलता को उसके भाग्य का परिणाम बता देना उस व्यक्ति की प्रतिभा को नजरअंदाज करने जैसा है। उन्होंने अपनी सफलता के रास्ते खुद बनाए, हां उनके भाग्य ने इतना साथ जरूर दिया कि उनके रास्ते में आने वाली कठिनाइयों में भी उनका हौसला कम नहीं होने दिया। किसी ने शायद रजत शर्मा के लिए ही कहा है, ‘‘खुदी को कर बुलंद इतना, कि हर तकदीर से पहले, खुदा बंदे से खुद पूछे, बता तेरी रजा क्या है?’’

Leave a Reply