ईद को लेकर पसोपेश पैदा कर सकती है रमजान के चांद से जुड़ी नाइत्तेफाकी

लखनऊ,  इस बार रमजान के चांद को लेकर देश के विभिन्न इलाकों में पैदा हुई नाइत्तेफाकी अब ईद के सिलसिले में पसोपेश के हालात पैदा कर सकती है। उलेमा ने इसे तकलीफदेह करार देते हुए सभी चांद कमेटियों से राय लेकर चांद के ऐलान के रिवाज को मजबूती से कायम रखने की जरूरत बतायी है।

भारत में इस दफा रमजान की शुरुआत को लेकर मुस्लिम समाज बंटा हुआ नजर आया और उनमें से कुछ ने 17 मई को तो बाकी ने 18 मई को पहला रोजा रखा। आमतौर पर सऊदी अरब में चांद दिखायी देने के एक दिन बाद भारत में उसके दीदार होते हैं, मगर इस दफा 16 मई को अरब के साथ-साथ यहां भी चांद दिखने की तस्दीक (पुष्टि) की गयी।

अरब से जुड़ी इस पुरानी रवायत पर अटूट विश्वास रखने वाले बहुतेरे मुसलमानों ने इस तस्दीक को नहीं माना और 17 के बजाय 18 मई को पहला रोजा रखा। रमजान में 29 या 30 रोजे होते हैं। इनकी संख्या ईद का चांद दिखने से तय होती है। अब पेंच यह है कि अगर गुरुवार 14 जून को ईद का चांद नजर आता है तो 29 रोजे ही होंगे। ऐसे में 18 मई को रोजे की शुरुआत करने वालों के 28 रोजे ही होंगे और उनका एक रोजा छूट जाएगा। वह रोजा ईद के दिन नहीं रखा जा सकेगा, क्योंकि ईद के दिन का रोजा हराम माना जाता है।

कमोबेश यही हाल ‘ अलविदा ’ जुमे की नमाज का भी है। जहां ज्यादातर मस्जिदों में आठ जून को यह नमाज अदा की गयी, वहीं कुछ मस्जिदों में ऐसा नहीं हुआ। अब अगर कल 14 जून को ईद का चांद नजर आता है तो जुमे (शुक्रवार) को ईद होगी। ऐसे में जहां आठ मई को अलविदा जुमा की नमाज नहीं हुई, वहां ईद के दिन अलविदा की नमाज हो ही नहीं सकती है।

दिल्ली की जामा मस्जिद के शाही इमाम सैयद अहमद बुखारी ने ‘