दीवारों पर लिखी इबारत को पढि़ए मान्यवर?

हमारे देश का अन्नदाता किसान इन दिनों राष्ट्रीय स्तर की एक अनोखी हड़ताल पर है। पूरे देश में किसानों ने सब्ज़ी,दूध व फल आदि की शहरी आपूर्ति ठप्प कर दी है। दूध व सब्जि़यां सडक़ों पर फेंके जा रहे हैं। इस हड़ताल से जहां किसानों को भारी आर्थिक नुकसान का सामना करना पड़ रहा है वहीं दैनिक उपयोग की इन सामग्रियों के अभाव के चलते आम जनता भी बुरी तरह प्रभावित हो रही है। दूध व सब्ज़ी उत्पादकों की तरह ही देश का गन्ना किसान भी काफी परेशान है। सभी किसानों की मोटे तौर पर एक ही मांग है कि उन्हें उनके उत्पाद की सही कीमत मिल सके और सरकार कम से कम इतना मुनाफा सुनिश्चित करे ताकि उनकी लागत भी निकल सके और वे मुनाफे से अपने परिवार का भरण-पोषण भी कर सकें। इसी प्रकार गन्ना किसान उचित समय पर गन्ने का उचित मूल्य प्राप्त न होने की वजह से सरकार से नाराज़ है। दरअसल सरकार के विरुद्ध किसानों की नाराज़गी का सबसे बड़ा कारण यही है कि 2014 के चुनाव अभियान में सत्तारूढ़ दल ने देश के किसानों को जो सब्ज़बाग दिखाए थे सरकार उनपर अमल नहीं कर पा रही है। इसी प्रकार कभी बैंक कर्मचारियों की हड़ताल,कभी शिक्षकों की तो कभी सफाई कर्मचारियों की हड़ताल होती सुनाई दे रही है।

तनवीर जांफरी

अभी पिछले दिनों देश की चार लोकसभा तथा 10 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव संपन्न हुए। इनमें केवल एक लोकसभा व एक विधानसभा सीट ही भारतीय जनता पार्टी जीत सकी। शेष 12 सीटें गैर भाजपाई दलों ने जीतीं। लोकसभा उपचुनाव में सबसे दिलचस्प मुकाबला पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कैराना लोकसभा सीट पर हुआ। इस सीट पर संयुक्त विपक्ष की उम्मीदवार तब्बसुम हसन ने लगभग पचास हज़ार मतों से भाजपा उम्मीदवार को पराजित किया। विश£ेषकों द्वारा हालांकि यह कहा जा रहा है कि चूंकि उत्तर प्रदेश के सभी विपक्षी दल गठबंधन की उम्मीदवार को समर्थन दे रहे थे इसलिए भाजपा को पराजित किया जा सका। इस बात में काफी हद तक सच्चाई तो ज़रूर है। परंतु इसके साथ-साथ इस जीत का दूसरा मुख्य अर्थ पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों की नाराज़गी से भी जुड़ा है। देश की जनता इस समय यह बड़े गौर से देख रही है कि चाहे वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी,भाजपा अध्यक्ष अमितशाह हों या उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ। इन सभी नेताओं की कार्यशैली तथा इनका जनता से वोट मांगने का तरीका तथा चुनावी बिसात बिछाने का ढंग रणनीतिकारी व लोकलुभावन भले ही हो परंतु इसमें आम जनता खासतौर पर किसानों,बेरोज़गारों व गरीबों का कल्याण व लोकहित दिखाई नहीं देता। उदाहरण के तौर पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गन्ना किसान गन्ने के सही मूल्य व समय पर भुगतान के लिए संघर्षरत था। परंतु योगी जी ने एक चुनाव सभा में फरमाया कि गन्ना हालांकि उनकी प्राथमिकता है परंतु वे ‘जिन्ना’ की फोटो भी नहीं लगने देंगे। गौरतलब है कि अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के एक सभागार में मोहम्मद अली जिन्ना के चित्र के लगे होने पर कैराना चुनाव से ठीक पहले कुछ हिंदूवादी संगठनों ने भाजपा के साथ मिलकर जिन्नाह की फोटो लगे होने पर बड़ा विवाद खड़ा कर दिया था।

कैराना उपचुनाव में सांप्रदायिकता को भी हवा देने की कोशिश की गई। चार वर्ष पूर्व मुज़फ्फरनगर व उसके आसपास के क्षेत्रों में सांप्रदायिक हिंसा भडक़ी थी। उस समय धर्म आधारित ध्रुवीकरण का पूरा लाभ भाजपा ने उठाया था। परंतु इस बार वही मतदाता जो 2014 में धार्मिक आवेश का शिकार होकर भाजपा के पक्ष में मतदान कर चुके थे वही इस बार अपनी पिछली गलतियों को सुधारते दिखाई दिए। हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर मुख्यमंत्री योगी तक ने कैराना सीट जीतने के लिए एड़ी-चोटी का ज़ोर तक लगा दिया। खासतौर पर गोरखपुर व फूलपुर संसदीय सीट हाथ से निकलने के बाद कैराना जीतना भाजपा के लिए एक बड़ा चुनौती थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तो चुनाव की तिथि अर्थातृ 28 मई से मात्र एक दिन पहले ही कैराना से बिल्कुल सटे बागपत में एक जनसभा संबोधित की। उन्होंने दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेस वे के एक छोटे से टुकड़े का उद्घाटन कर इसपर लंबा रोड शो भी कर डाला। परंतु कैराना के मतदाताओं पर प्रधानमंत्री के रोड शो,उनके बागपत के भाषण अथवा मुख्यमंत्री योगी की अथाह मेहनत व जनसभाओं का तो कोई असर नहीं पड़ा जबकि बागपत क्षेत्र में ही धरने पर बैठे चंद किसानों ने कैराना के किसानों को अपना संदेश ज़रूर दे दिया। इस धरने में बैठे एक किसान की मौत भी हो गई थी।

सवाल यह है कि किसानों के गुस्से के रूप में सत्ता के विरुद्ध दीवारों पर मोटे अक्षरों में लिखी जा रही सत्ता विरोधी यह इबारत सत्ता के नशे में चूर अहंकारी नेतृत्व को दिखाई क्यों नहीं देती? क्या इन सत्ताधारी चुनावी रणनीतिकारों का भरोसा केवल चुनावी मार्किटिंग,ध्रुवीकरण की राजनीति,राज्यपालों के दुरुपयोग,पीडीपी व जेडीयू जैसे मौकापरस्त गठबंधन, मणिपुर,गोआ व त्रिपुरा जैसे सत्ता गठन तथा स्वयं को अपराजेय बताने व कांग्रेस तथा नेहरू-गांधी परिवार के जन्मजात विरोध पर ही टिकी हुई है? क्या देश के अल्पसंख्यकों,दलितों,किसानों,बेरोज़गारों तथा युवाओं की अनदेखी कर केवल गैर ज़रूरी व विघटनकारी मुद्दों के बल पर चुनाव जीतने को ही यह रणनीतिकार अपनी राजनैतिक सफलता मानते हैं? कैराना लोकसभा तथा नूरपुर विधानसभा सीट तथा बिहार की एक विधानसभा सीट पर अल्पसंख्यक समुदाय के मतों की संख्या भी अच्छी-खासी थी। गत् वर्षों में भाजपा ने तीन तलाक जैसे विषय को लेकर देश में कोहराम पैदा कर दिया। इसके विरुद्ध कानून बनाने की कोशिश की तथा यह जताने का प्रयास किया कि भारतीय जनता पार्टी मुस्लिम महिलाओं के हितों की रक्षा चाहती है इसलिए वह तीन तलाक जैसी कुप्रथा के विरुद्ध है। सवाल यह है कि यदि वास्तव में भाजपा में मुस्लिम महिलाओं की हितों के मद्देनज़र तीन तलाक के प्रचलन का विरोध किया था फिर आिखर इन चुनाव क्षेत्रों में मुस्लिम महिलाओं के वोट भाजपा के पक्ष में क्यों नहीं गए? इसकी वजह यही है कि मुस्लिम महिलाएं भी जानती हैं कि तीन तलाक के विरोध का मतलब मुस्लिम महिलाओं का हित नहीं बल्कि मुस्लिम रीति-रिवाजों व प्रचलित परंपराओं में दखल अंदाज़ी करना था।

इन उपचुनावों में मिली हार के बाद भी भाजपा का नेतृत्व इसे पूरी ईमानदारी के साथ न तो देखना चाहता है और न समझना चाहता है। कभी वह राष्ट्रीय स्तर पर चल रहे किसान आंदोलन को कांग्रेस की चाल बता रहा है तो कभी उपचुनावों में हो रही हार को विपक्षी दलों की बौखलाहट का नाम दे रहा है। प्रधानमंत्री तो अपने विरोध को देश का विरोध अथवा राष्ट्रविरोध का नाम तक देने से नहीं हिचकिचाते। अकेले मध्यप्रदेश राज्य में  गत् 24 घंटों में तीन किसान मौत को गले लगा चुके हैं जिनमें दो किसानों ने तो कजऱ् से परेशान होकर खुदकशी की जबकि एक किसान कृषि मंडी में वहां की अव्यवस्थाओं से परेशान होकर चल बसा। परंतु अहंकारी सत्ताधारियों को किसानों से किए गए वादे,उनकी दु:ख-तकलीफ,नफा-नुकसान आदि नज़र नहीं आता बल्कि वे आंदोलन के पीछे की साजि़श तलाशने में लग जाते हैं। दरअसल हमारे देश का लोकतंत्र लोकलाज व लोकहित से चलने वाला लोकतंत्र है न कि तानाशाही,जुगतबाज़ी,साजि़श,विभाजन,ध्रुवीकरण तथा वैमनस्य फैलाकर सत्ता हासिल करने का खेल। संभव है कि 2014 में धर्म के नाम पर कुछ मतदाताओं ने मतदान किया भी हो परंतु भाजपा को सत्ता दिलाने वाले अधिकांश मतदाता वही थे जिन्हें तरह-तरह के सब्ज़बाग दिखाए गए थे और जिनसे अच्छे दिनों का वादा किया गया था। ज़ाहिर है वही मतदाता अब स्वयं को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं जिसका परिणाम उपचुनावों के नतीजों के रूप में सामने आ रहा है।