मसीही धर्म आध्यात्मिक मानवतावाद का हामी

विश्व के सभी धर्म सत्य अथवा ईश्वर की खोज में हैं। मसीही धर्म भी कहता है कि सत्य को जानो और सत्य तुम्हें स्वतन्त्र करेगा। आज के युग में तरह-तरह के मानवतावाद की चर्चा की जाती है जिसको निरपेक्ष मानवतावाद, वैज्ञानिक मानवतावाद, शैक्षणिक मानवतावाद अस्तित्ववादी मानवतावाद आदि के नाम दिये जाते हैं किन्तु यह भुला दिया जाता है कि मानव एक आध्यात्मिक प्राणी भी है और उसे उस परम सत्ता ईश्वर से दूर किये जाने का प्रयत्न किया जाता है।

   विक्रम विश्वविद्यालय के दर्शन अध्ययनशाला के भूतपूर्व आचार्य डॉ.ए.बी. शिवाजी ने मसीही धर्म  का प्राथमिक परिचय और उसकी विशेषता-प्रासङ्गिकता आदि बिन्दुओं पर प्रकाश डालते हुए अपने सारगर्भित व्याख्यान में कहा कि यीशु मसीह का जीवन मानव-कल्याण के लिए समर्पित जीवन था। उसके जीवन की एक-एक घटना मानवीयता लिए हुई थी। उसका चरणी में उत्पन्न होना, उपदेश देना, बीमारों को चंगा करना, मुर्दों को जिलाना और क्रूस पर च़ढ़ना और वहाँ से यह कहना कि ‘‘हे पिता, इन्हें क्षमा कर, क्योंकि यह जानते नहीं कि क्या करते हैं और तीसरे दिन कब्र से जी उठना। वे श्रीमती ओमवती शर्मा जनसेवा ट्रस्ट द्वारा आयोजित धर्मव्याख्यानमाला में मध्यप्रदेश दलित साहित्य अकादमी के मंच से बोल रहे थे।

 डॉ. शिवाजी ने कहा कि मानवता के माध्यम से यीशु-मसीह पृथ्वी को स्वर्ग बनाना चाहते थे। उन्होंने  शुद्ध मन, शुद्ध भाषा, शुद्ध और निर्मल भक्ति, मिलनसारी, मृदुभाव, दया ये सब जो मानवता के अंग हैं, इनका प्रचार किया। मसीही धर्म में दलित शब्द को बाइबल में दु:खी, दुर्बल, पीड़ित, असहाय, दीन-दरिद्र, पापी शब्दों के द्वारा अभिव्यक्ति दी गई है। जिस प्रकार भारत में वर्ण एवं जाति के आधार पर शूद्रों को दलित की कोटि में रखा गया है, उसी प्रकार बाइबल की पुराने नियम की पुस्तकों में  दु:खी, पीड़ित, असहाय, निम्न कोटि के मनुष्यों की चिन्ता कर भेदभाव, अस्पृश्यता को हटा, आध्यात्मिक मानववाद को पुष्ट करने का प्रयत्न किया गया है।

  उनका मत था कि सारी प्राकृतिक त्रासदियों के लिए मनुष्य ही उत्तरदायी है क्योंकि उसने नैतिकता का पालन नहीं किया। प्रकृति और मानव के सम्बन्ध को नहीं जाना। प्रकृति जिसका निर्माता ईश्वर है, उसको नहीं पहचाना और भूमि, वृक्ष, जल आदि पर अपना आधिपत्य समझ मनमानी का परिचय दिया। संत बोनावेंचर की पुस्तक ‘‘ब्रेनीलोगियून्स’ में सन्त अन्सेलम की पंक्तियों को उद्धृत किया गया है जिसका सार है कि मनुष्य प्रकृति को प्रदूषित करता है और प्रदूषित प्रकृति मनुष्य को प्रदूषित करती है।

  वर्तमान में वैज्ञानिक भूमि से दो-तीन फसल उगाने पर बल देते हैं और अच्छी एवं अधिक फसल के लिए तरह-तरह के रासायनिक खाद डालने एवं कीटनाशक औषधियों के उपयोग की सलाह देते हैं। किन्तु मसीही धर्म में भूमि को विश्राम देने की बात कही गई है।  ‘‘लैव्यव्यवस्था’ की पुस्तक (अध्याय २३:१०) में कहा गया कि छ: वर्ष तो अपनी भूमि पर बोना और सातवें वर्ष उसको पड़ती रहने देना, ताकि भूमि को विश्राम मिले।

उन्होंने आगे कहा कि बाइबल में सात का अपना महत्त्व है जिसमें सात सील, सात मण्डली, सात तारे, सात सिर और दस सींग, सात पहाड़, सात दीपक, सात मुहर, सात तुरहियों का फूंका जाना,  सात दृष्टान्त रूपी चिह्न हैं। सात कटोरों की चर्चा आती है जो सब भविष्य की घटनाओं की ओर इशारा करती है। इस अवसर पर डॉ. शिवाजी द्वारा लिखित पुस्तक मसीही धर्म और हम का लोकार्पण और वितरण भी किया गया।

   कार्यक्रम के मुख्य अतिथि के पद से मसीही मन्दिर उज्जैन के धर्मगुरु रेवरेह्न श्री कैलाश ताण्डी ने कहा कि किसी एक मनुष्य का पाप दूसरा मनुष्य माफ नहीं कर सकता। मनुष्य अपने अच्छे-बुरे कर्म के लिए स्वतन्त्र भी है और जिम्मेदार भी। जाति, धर्म और सम्प्रदाय का महत्त्व नहीं है बल्कि आत्मा और अध्यात्म का महत्त्व है। अध्यक्षीय वक्तव्य में मध्यप्रदेश दलित अकादमी के सचिव श्री पी.सी.बैरवा ने कहा कि श्रीमती ओमवती शर्मा जनसेवा ट्रस्ट अलग ढंग से समाज की सेवा कर रहा है।

   इससे पूर्व ट्रस्ट के अध्यक्ष डॉ. सूर्यप्रकाश व्यास ने अपने स्वागत वक्तव्य में कहा कि धर्म पर चर्चा कभी अप्रासङ्गिक और व्यर्थ नहीं होती – चाहे वह चर्चा धर्मसामान्य पर हो या धर्मविशेष पर। अलग-अलग देश, संस्कृति, खान-पान और रीति-रिवाज की तरह धार्मिक सम्प्रदायों की अनेकता भी व्यावहारिक सत्य है। हम किसी भी धर्म को मानने वाले हों या धर्मनिरपेक्ष हों, दूसरे धर्मों के अनुयायियों के साथ रहना हमारी नियति है। इसलिए क्या यह उचित नहीं है कि हम अपने धर्म को सही रूप में जानकर उसका ईमानदारी से अनुकरण करें और दूसरे धर्मों के बारे में न्यूनतम जानकारी तो रखें ताकि आडम्बर और टकराव को अधिकतम टाला जा सके।

व्याख्यान कार्यक्रम का प्रमुख आयाम प्रश्नोत्तर था। इसमें प्रो. आर.के. छजलानी ने प्रश्न किया कि ईसाई धर्म के विकास में कैथोलिक और प्रोटेस्टेन्ट का क्या योगदान है? डॉ. रामकुमार अहिरवार ने कैथोलिक और प्रोटेस्टेन्ट में ईश्वर की अवधारणा पर मतभेद का आधार जानने का प्रयत्न किया। डॉ. वीरबाला छाजेड़ ने मसीही धर्म में मनुष्य के पुरुषार्थ और आत्मज्ञान के मार्ग की जिज्ञासा की।  डॉ. शिव नागरिया ने बाइबिल और रामचरितमानस के दृष्टिभेद पर प्रकाश डालने की प्रार्थना की। श्री प्रकाश झांझरी ने ईश्वर द्वारा संचालित संसार में विकृतियों के औचित्य पर प्रश्न उठाया और कहा कैसी विडम्बना है कि राम-रहीम में कभी झगड़ा नहीं हुआ फिर इनके अनुयायी क्यों झगड़ते हैं? डॉ. तारा परमार की समस्या थी कि कुमार्ग पर चलने वालों को ईश्वर सही राह क्यों नहीं दिखाता? डॉ. तुलसीदास परौहा ने जिज्ञासा रखी की ईसामसीह से पूर्व इस धर्म की क्या सत्ता थी और हिन्दू धर्म के प्रति इसका दृष्टिकोण क्या है? डॉ. एच.एम. बरुआ को जानना था कि स्वर्ग और नरक की अवधारणा की इस धर्म में क्या तार्किक  संगति है? श्री अशोक परमार ने नूह की नाव का तात्पर्य जानना चाहा। प्रो.एच.पी.सिंह ने प्रश्न किया कि किसी परिवार में जन्म लेने से धर्म का क्या सम्बन्ध है? विद्वान् वक्ता ने सभी प्रश्नों का विस्तार से उत्तर दिया।

  कार्यक्रम के प्रारम्भ में मसीही मन्दिर उज्जैन के साधकों ने एक सुमधुर संगीतमय भजन प्रस्तुत किया। उपस्थित वक्ताओं और श्रोताओं के प्रति आभार व्यक्त करते हुए डॉ.वीरबाला छाजेड़ ने कहा कि हम व्यक्तिगत जीवन में किसी भी धर्म को मानें किन्तु समाज की शान्ति और प्रगति के लिए सभी धर्मों का प्राथमिक ज्ञान सभी के लिए आवश्यक है और ट्रस्ट इसी दिशा में कार्यरत है।