ब्लिंक टू स्पीक : पलकें झपका कर बताइए, कैसे हैं आप

नयी दिल्ली, किसी गंभीर बीमारी के कारण हाथ पैर हिलाने और बोलने से लाचार लोगों के लिए अब पलकें झपका कर अपनी बात दूसरों तक पहुंचाने की एक अनूठी भाषा तैयार की गई है और इसे नाम दिया गया है ‘‘ब्लिंक टू स्पीक’’।

हालांकि बाजार में ऐसे बहुत से उपकरण हैं, जो मरीजों और उनके परिवार के सदस्यों के बीच संवाद का जरिया होते हैं, लेकिन बेबसी के आलम में बिस्तर पर पड़े मरीज की नफीस संवेदनाएं उसी मुलायमियत से तीमारदार तक पहुंचाने की कुव्वत लोहे के पुर्जों से बनी खुरदरी मशीन में कहां? लिहाजा एक ऐसी भाषा तैयार करने की जरूरत महसूस की गई, जिससे बस पलक झपकते ही मरीज अपनी बात अपने करीब मौजूद तीमारदार तक पहुंचा दे।

एक विज्ञापन एजेंसी टीबीडब्ल्यूए ने आंखों की भाषा की इस परिकल्पना को अमली जामा पहनाया और देश में मोटर न्यूरोन डिजीज :एमएनडी: तथा एमियोट्रोफिक लेटरल सेरोसिस :एएलएस: के मरीजों के लिए काम करने वाले गैर सरकारी संगठन आशा एक होप के साथ मिलकर इस गाइड को करीब एक माह पहले जारी किया।

टीबीडब्ल्यूए की भारत शाखा के अधिकारी परीक्षित भट्टाचार्य बताते हैं कि इन दोनो और स्नायु तंत्र से जुड़ी कई अन्य बीमारियों में मरीज की मांसपेशियां कमजोर होने लगती हैं और उनका अपने शरीर के अंगों के परिचालन पर कोई नियंत्रण नहीं रहता। बीमारी बढ़ने के साथ मरीज की गतिविधियां घटने लगती हैं और एक वक्त ऐसा आता है कि मरीज पूरी तरह से चलने फिरने और हिलने डुलने से भी लाचार हो जाता है।

अब जरा कल्पना कीजिए कि लाचारी के उस आलम में मरीज को अगर यह कहना है कि उसे बेचैनी हो रही है या उसे डाक्टर की जरूरत है तो वह कैसे बता पाएगा, लेकिन अब आंखों की एक जुंबिश से वह अपनी परेशानी अपने परिवार के सदस्यों तक पहुंचा पाएगा और उसकी समस्या का तत्काल समाधान हो जाएगा। खतरे से लेकर किसी जरूरत तक के तमाम संकेत बस आंख के एक इशारे से सामने वाले तक पहुंच जाएंगे।

भट्टाचार्य ने मरीजों के लिए इस गाइड को तैयार करने के विचार की जानकारी देते हुए बताया कि उनकी टीम के सदस्यों में शामिल गीत राठी अपने घर पर एएलएस के एक मरीज की देखभाल कर रही थीं। मरीज का शरीर धीरे धीरे जवाब दे रहा था और उसकी कोई बात समझने के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ती थी।

भट्टाचार्य बताते हैं कि गीत ने बेबसी के इस आलम में मरीज से बात करने का एक तरीका ईजाद किया। उसे जब कोई भी बात पूछनी होती थी तो वह कमरे की दीवार या पर्दे पर लिख देती थी और मरीज अपनी पलकें झपकाकर उसका जवाब देता था। बस यहीं से गीत को संवाद के इस नए तरीके का विचार सूझा और कुछ लोगों के सामूहिक प्रयासों से इसे अमली जामा पहनाया गया।

तंत्रिका तंत्र की बीमारियों से जूझ रहे मरीजों के बारे में और अधिक जानकारी हासिल करने के लिए उन्होंने आशा एक होप फाउंडेशन की संस्थापक डा. हिमांगी साने से संपर्क किया और इस काम पर लगाई गई एक टीम ने आंखों के 50 इशारों के साथ एक पूरी भाषा बना डाली।

टीबीडब्ल्यूए की क्रिएटिव डायरेक्टर गीत राठी का कहना है कि इस नयी ब्लिंक टू स्पीक भाषा को समझना बेहद आसान है और इसके रहते महंगे सहायक उपकरणों की जरूरत खत्म हो जाती है। यह किताब इंटरनेट से निशुल्क डाउनलोड कर सकते हैं और इसे बेहद आसान और सहजग्राह्य तरीके से तैयार किया गया है। मरीज कुछ ही दिन में इस किताब में दिए गए आंखों को इशारों को समझ लेते हैं और वह खामोशी से बस पलकों की जुंबिश से अपनी बात समझा पाते हैं।

मरीज से बात करने के दौरान आपने कुछ पूछा और मरीज एक बार पलकें झपकाए तो समझिए कि उसका जवाब हां है, दो बार पलकें झपकें तो मतलब है नहीं। आपने हाल चाल पूछा और मरीज ने तीन बार पलकें झपकाईं तो समझिए सब ठीक है। एक बार बाएं देखकर दाएं देखा और फिए एक बार पलकें झपकाईं तो मरीज को ठीक नहीं लग रहा है। एक बार पलक झपका कर दाईं और देखा तो मरीज को डाक्टर की जरूरत है।

इसी तरह आंखों के जरिए मरीज आई लव यू, थैंक यू, आई वांट ए हग और आई वांट टू टॉक जैसी अपनी तमाम भावनाएं तीमारदार तक पहुंचा देता है।

इस भाषा के जरिए अपनी बात बता देने का एहसास जहां मरीज को खुशी और उम्मीद देता है वहीं परिवार के सदस्यों को यह संतोष रहता है कि वह मरीज की तमाम जरूरतें पूरी करके उसे बीमारी से लड़ने और अपने बेबस जीवन को कुछ बेहतर कर पाने का मौका दे रहे हैं।