आपदा की आहट पाने में नाकाम सूचना प्रणाली

मौसम की पूर्वानुमान संबंधी अनेक डिजिटल तकनीकों का विकास हो जाने के बावजूद हम प्राकृतिक आपदा की आहट पाने में नाकाम साबित हो रहे हैं। जबकि हमारे अनेक उपग्रह अंतरिक्ष में इन आपदाओं की निगरानी के लिए ही सक्रिय हैं। बावजूद बेखटके आंधी-तूफान, अंधड़-बवंडर और आकाषीय बिजली ने राजस्थान, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेष, मध्य प्रदेष और पष्चिम बंगाल में ऐसी तबाही मचाई कि करीब सवा सौ लोगों की जान चली गई और करोड़ो की संपत्ति नश्ट हो गई। केदारनाथ औा बद्रीनाथ के पट खुलते ही चारधाम यात्रा को अनायास आई भीशण बर्फबारी के कारण रोकना पड़ा है। यमुनोत्री के रास्ते में पहाड़ ढहने से मार्ग बंद हो गया। गोया, सवाल उठता है कि तमाम तकनीकी विकास के दावे किए जाने के बावजूद हमारे मौसम वैज्ञानिकों को आपदा की आहट क्यों नहीं मिल पा रही है। वह भी तब आए आंधी-तूफान की गति 100 से 120 किमी प्रतिघंटा की रही थी। इससे आवासीय बस्तियां तो तबाह हुई हीं, खेतों में लहलहाती और खलिहानों में रखी फसलें तबाह हो गईं।

प्रमोद भार्गव

हालांकि भारतीय मौसम विभाग ने 1 मई से 4 मई के बीच आंधी-तूफान और बारिष की भविश्यवाणी की थी, लेकिन यह पूर्वोत्तर के राज्य पष्चिम बंगाल, ओडिषा, असम, मेघालय, नागालैंड, मणिपुर, मिजोरम, त्रिपुरा और झारखंड के लिए थी। गोया, आपदा तो आई, लेकिन उसकी तबाही के केंद्र में पष्चिमी और उत्तरी भारत रहा। विभाग ने चार मई तक आपदा की षंका जताई थी, किंतु यह आठ मई तक लगातार तांडव मचाती रही। अब प्रष्न खड़ा होता है कि अरबों रुपए के उपग्रह, करोड़ों के उपकरण और मौसम विज्ञानियों का बड़ा जमावड़ा होने के बावजूद हम प्रकृति की चाल की भनक अनुभव करने में क्यों चूक रहे है। यही नहीं अब तो देष में निजी प्रबंधन से चलने वाले स्काईमेट नामक एजेंसी भी मौसम की जानकारी देने में लगी हुई है। वह भी कुदरत की इस कुरूपता का अनुमान लगाने में नाकाम रही। इससे यह आषंका उत्पन्न होती है कि हमारे वैज्ञानिक या तो कंप्युटर में दर्ज होने वाले संकेतों की भाशा पड़ने में चूक रहे हैं अथवा लापरवाही बरत रहे हैं। कतिपय वैज्ञानिक ऐसे भी हैं, जो वैज्ञानिक तो बन गए, किंतु अपने भीतर वैज्ञानिक चेतना का समावेष नहीं कर पाए हैं। वैज्ञानिकों में बढ़ती यह प्रवृत्ति देष और संस्थाओं के लिए घातक है। यह प्रवृत्ति न तो इंद्रियजन्य अनुभववादी ज्ञान के लिए उचित है और न ही विज्ञान के लिए ? जबकि हमारे देषज मौसम विज्ञानी घाघ और भड्डरी ने प्रकृति और पषु-पक्षियों की हलचल से ऐसा इंद्रियजन्य ज्ञान विकसित किया था कि उनकी मौसम संबंधी भविश्यवाणियों के अनुमान बिना किसी खर्च के लगभग सटीक बैठते थे।

अब हमारे मौसम विज्ञानी कह रहे है कि राजस्थान और उत्तर-प्रदेष में तबाही का कारण हरियाणा के वायुमंडल में बना चक्रवाती प्रवाह है। ऐसा जलवायु परिवर्तन से मौसम में तेजी से हो रहे छोटे-बड़े बदलावों के कारण हो रहा है। नतीजतन मौसम का चक्र बिगड़ रहा है। इसी का परिणाम है कि उत्तरी पाकिस्तान और राजस्थान में तापमान ज्यादा होने की वजह से गर्म हवाएं ऊपर की और उठ रही हैं, जिससे कम दबाव का क्षेत्र निर्मित हो रहा है। इसके साथ ही भूमध्यसागर और अरब सागर से चलने वाली पछुआ हवाओं से इस कम दबाव वाले क्षेत्र में बादल और चक्रवाती बवंडर उठ रहे है। गुजरे बवंडर का दायरा 250 किमी व्यास में था। मौसम विभाग के ये आंकड़े तब आए हैं, जब आपदा तबाही मचाकर कमोवेष ठहर गई है। इन आंकड़ों के जारी होने के बाद इस आषंका की पुश्टि होती है कि वैज्ञानिकों ने लापरवाही बरती है। क्योंकि ये आंकड़े तब बांचने में आए हैं, जब प्रकृति की तबाही मचाने वाली हलचलें कंप्युटर की बुद्धि में पहले ही दर्ज हो गईं थी, किंतु समय रहते वैज्ञानिकों ने इन्हें बांचने में कोताही बरती। वैसे भी अब हमारी वेधषालाओं में अत्याधुनिक संसाधन हैं, केवल इन पर हरकत करने वाली ध्वनि और वायु तरंगों पर सतर्क निगाह रखने की जरूरत है।

क्योंकि जब ओडिषा में भयंकर तूफान आया था, तब हमारे मौसम विभाग की भविश्यवाणियां सटीक साबित हुई थीं। तब मौसम विभाग के सेवानिवृत प्रमुख एलएस राठौर विदेषी वैज्ञानिकों के पूर्वानुमानों को नजरअंदाज करते हुए अपने पूर्वानुमान पर डटे रहकर केंद्र व राज्य सरकारों को बड़े पैमाने पर एहतियात बरतने की हिदायतें देते रहे थे। इस अवसर पर हमारे वैज्ञानिक सुपर कंप्युटर और डापलर राडार जैसी श्रेश्ठतम तकनीक के माध्यमों से चक्रवात के अनुमानित और वास्तविक रास्ते का मानचित्र एवं उसके भिन्न क्षेत्रों में प्रभाव के चित्र बनाने में भी सफल रहे थे। तूफान की तीव्रता और बारिष के अनुमान भी कमोबेष सही साबित हुए थे। इन अनुमानों को पढ़ने की भाशा को और कारगर बनाने की जरुरत थी, लेकिन अब लग रहा है कि वैज्ञानिकों से कहीं न कहीं बड़ी चूक हुई है। यदि सटीक सूचनाएं समय पूर्व मिलने लग जाएं, तो हम बाढ़, सूखे, भूकंप और बवंडरों से ठीक ढंग से सामना कर सकते हैं।

हमें मौसम संबंधी पूर्वानुमान की ऐसी निगरानी प्रणालियां विकसित करने की जरुरत है, जिनके मार्फत हर माह और हफ्ते में बरसात होने की राज्य व जिलेबार भविश्यवाणियां की जा सकें। इस नाते भौगोलिक सूचना प्रणाली (जीआईएस) और बाढ़ का पूर्वानुमान लगाने वाले टेलीमेट्री स्टेषन बड़ी संख्या में बनाए गए थे। लेकिन बीते साल भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) ने जो रिपोर्ट दी है, उससे पता चला है कि जो टेलीमेट्री स्टेषन बने हैं, उनमें से साठ प्रतिषत काम ही नहीं कर रहे है। 1997 से 2016 के बीच देषभर में 375 ये स्टेषन बनाए गए थे, जिससे बाढ़ के बारे में पूर्वानुमान लगाया जा सके। किंतु इनमें से 222 बंद पड़े है। रिपोर्ट के अनुसार पांच राज्यों की छह परियोजनाओं के लिए मंजूर 171,28 करोड़ रुपए की राषि का उपयोग ही नहीं हुआ। यदि ये वेधषालाएं बन जाती और टेलीमेट्री उपकरण काम करने लग जाते तो हर साल बाढ़ की जो तबाही देखने में आती है, उससे जान-माल की हानि कम की जा सकती थी। देष में कुल 4862 बड़े बांध हैं, जिनमें से 349 बांधों के लिए ही आपातकालीन प्रबंधन योजनाएं तैयार की गई है। साफ है, प्रकृत्ति के कहर का पूर्वानुमान लगाने के प्रति हम सचेत नहीं हैं।

दरअसल कार्बन फैलाने वाली विकास नीतियों को बढ़ावा देने के कारण धरती के तापमान में लगातार वृद्धि हो रही है। यही कारण है कि बीते 134 सालों में रिकार्ड किए गए तापमान के जो 13 सबसे गर्म वर्श रहे हैं, वे वर्श 2000 के बाद के ही हैं और आपदाओं की आवृत्ति भी इसी कालखण्ड में सबसे ज्यादा बढ़ी हैं। पिछले तीन दषकों में गर्म हवाओं का मिजाज तेजस्वी लपटों में बदला है। इसने धरती के 10 फीसदी हिस्से को अपनी चपेट में ले लिया है। यही वजह है कि अमेरिका में जहां कैटरिना, आइरिन और सैंडी तूफानों ने तबाही मचाई, वहीं नीलम, आइला, फेलिन और हुदहुद ने भारत व श्रीलंका में हालात बद्तर किए थे। बताया जा रहा है कि वैष्विक तापवृद्धि के चलते समुद्री तल खौल रहा है। फ्लोरिडा से कनाडा तक फैली अटलांटिक की 800 किमी चैड़ी पट्टी में समुद्री तल का तापमान औसत से तीन डिग्री सेल्सियस अर्थात् 5.4 फारेनहाइट ज्यादा है। यही उर्जा जब सतह से उठ रही भाप के साथ मिलती है तो समुद्री तल में अप्रत्याषित उतार-चढ़ाव षुरु हो जाता है, जो चक्रवाती बंवडरों को विकसित करता है। इन बवंडरों के वायुमंडल में विलय होने के साथ ही, वायुमंडल की नमी 7 फीसदी बढ़ जाती है, जो तूफानी हवाओं को जन्म देती है। प्राकृतिक तत्वों की यही बेमेले रासायनिक क्रिया भारी बारिष, आंधी, चक्रवात, अंधड़ और तूफान का आधार बनती है, नतीजतन कुदरत का कहर चंद क्षणों में ही तबाही की लीला रच देता है।