देश के आकार की तुलना में ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था नगण्य: मुखर्जी

नयी दिल्ली ,  पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने आज कहा कि देश में ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था का बेहद छोटा आकार होने तथा शिक्षा का लाभ अब भी दूरस्थ इलाकों तक नहीं पहुंच पाना चिंताजनक है और इसे ठीक किया जाना चाहिए।

मुखर्जी ने एक कार्यक्रम में निजी एवं सार्वजनिक क्षेत्र के कारोबारियों के समूह को संबोधित करते हुए यहां कहा कि यदि रोजगार सृजित नहीं किये गये तो देश के जनसांख्यिकीय लाभ के जनसांख्यिकीय त्रासदी में बदल जाने का जोखिम रहेगा।

उन्होंने 13 वें ‘ बीएमएल मुंजाल अवार्ड्स फोर बिजनेस एक्सीलेंस थ्रू लर्निंग एंड डेवलपमेंट ’ में कहा , ‘‘ भारत ने पिछले सात दशकों और खासकर उदारीकरण के बाद पिछले तीन दशकों में बेहतरीन तरक्की की है। लेकिन कुछ चुनौतियां हैं जिन्हें मैं इंगित करना चाहता हूं। ’’

उन्होंने कहा , ‘‘ हमारी वृद्धि की गति शानदार रही है पर संभावित तरीके से रोजगार सृ जन में सफल नहीं रही है। हमें रोजगार सृजित करने होंगे वर्ना जनसांख्यिकीय लाभ के जनसांख्यिकीय त्रासदी में बदलने का जोखिम रहेगा। ’’

युवाओं को कुशल बनाने के बारे में मुखर्जी ने कहा कि सरकार द्वारा काफी सराहनीय काम किया गया है लेकिन यह अभी ऊंट के मुंह में जीरा के समान है।