दिग्विजय सिंह : नर्मदा यात्रा के बहाने कांग्रेस क्षत्रप से फिर ठोकी ताल

नयी दिल्ली, कभी दलित एजेंडा, कभी दस वर्ष तक कोई पद न लेने का ऐलान तो कभी अपने विवादित बयानों के कारण चर्चा में रहे मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह अपनी 3300 किलोमीटर की छह माह चली नर्मदा परिक्रमा यात्रा को लेकर एक बार फिर चर्चा में हैं।

दिग्विजय सिंह का राजनीतिक ग्राफ धीरे धीरे आगे बढ़ा और फिर प्रदेश की राजनीति से लेकर केन्द्र में सत्ता के गलियारों तक उनकी पैठ बराबर बनी रही। कांग्रेस के दिग्गज रणनीतिकारों में शुमार दिग्विजय सिंह को राजनीति विरासत में मिली।

ब्रिटिश इंडिया की होल्कर रियासत में इंदौर में 28 फरवरी 1947 को राघोगढ़ के राजा बल भद्रसिंह के यहां जन्मे दिग्विजय की शिक्षा इंदौर में ही हुई। उन दिनों उनके पिता राघोगढ़ से ही जनसंघ के सांसद हुआ करते थे। 1969 से 1971 के बीच वह राघोगढ़ नगर पालिका के अध्यक्ष रहे। इस दौरान 1970 में उन्हें विजयराजे सिंधिया ने जनसंघ में आने का न्यौता दिया, जिसे उन्होंने ठुकरा दिया और बाद में कांग्रेस में शामिल हो गए।

1977 में कांग्रेस के टिकट पर राघोगढ़ के विधायक के रूप में मध्य प्रदेश विधानसभा पहुंचे। बाद में वह अर्जुन सिंह के नेतृत्व वाली मध्यप्रदेश की कांग्रेस सरकार में 1980-84 के बीच पहले राज्य मंत्री और फिर केबिनेट मंत्री बने। 1985 और 1988 के बीच वह मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष रहे। 1984 के वह राघोगढ़ लोकसभा सीट जीतकर संसद पहुंचे। हालांकि अगले लोकसभा चुनाव में भाजपा ने यह सीट उनसे छीन ली, लेकिन 1991 में वह एक बार फिर जीत दर्ज करने में कामयाब रहे।

कांग्रेस आलाकमान से दिग्विजय की नजदीकी रंग लाई और 1993 में उन्हें मध्य प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया गया। 1998 में कांग्रेस ने एक बार फिर सत्ता में वापसी की और दिग्विजय सिंह को सोनिया गांधी ने दूसरी बार राज्य की कमान सौंप दी।

2003 के चुनाव में दिग्विजय सिंह तो विजयी हुए, लेकिन कांग्रेस को भाजपा के हाथों सत्ता गंवानी पड़ी। हालांकि इस चुनाव को लेकर उन्होंने दलित एजेंडा के तहत जिस तरह से कायदे-कानून बदले, उससे उन्हें राज्य के 36 प्रतिशत दलित-आदिवासी मतदाताओं के वोट मिलने का भ्रम हो गया था, लेकिन चुनाव परिणामों ने उनके सारे अनुमानों को गलत साबित कर दिया।

हार से आहत दिग्विजय सिंह ने अगले एक दशक तक चुनाव न लड़ने का ऐलान किया और कांग्रेस के संगठन को मजबूत करने में दिलचस्पी दिखाई। उन्हें अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी का महासचिव बनाया गया और कई राज्यों का प्रभार सौंपा गया। युवा लोगों को राजनीति में लाने की इच्छा जताते हुए दिग्विजय सिंह ने अपने पुत्र जयवर्द्धन को 2013 में राघोगढ़ से पार्टी का टिकट दिलाया और पारिवारिक राजनीति की सीढ़ी चढ़ते हुए वह विधानसभा तक जा पहुंचे।

जनवरी 2014 में दिग्विजय सिंह मध्यप्रदेश से राज्यसभा के लिए चुने गए।

दिग्विजय सिंह के राजनीतिक जीवन में चुनावी हार जीत के अलावा कई तरह के उतार चढ़ाव आए। 2011 में उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप लगे, लेकिन सीबीआई ने उन्हें क्लीन चिट दी।

दिग्विजय का नाम कई तरह के विवादों से भी घिरा रहा। उनके मुख्यमंत्री काल के दौरान 1998 में किसानों पर फायरिंग के लिए उनकी आलोचना हुई। 2011 में बटला हाउस मुठभेड़ को फर्जी बताकर उन्होंने बड़ी मुसीबत मोल ले ली और कांग्रेस आलाकमान ने उनसे दूरी बना ली। 2013 में एक महिला सांसद के बारे में दिग्विजय की टिप्पणी ने उन्हें फिर सांसत में डाल दिया। उन्होंने मंदसौर से कांग्रेस की विधायक मीनाक्षी नटराजन के बारे में आपत्तिजनक बात कही, लेकिन चहुं ओर से आलोचना से घिरे दिग्विजय ने यह कहकर अपनी जान बचाई कि उनकी बात का गलत मतलब निकाला गया।

एक और मसले पर दिग्विजय की टिप्पणी ने आला कमान को नाराज किया, जब उन्होंने 2011 में बिन लादेन के शव को समुद्र में डालने के अमेरिका के फैसले पर एतराज किया और उसके धर्म का सम्मान किए जाने की बात कही। बाद में दिग्विजय सिंह ने जैसे तैसे इस विवाद से पीछा छुड़ाया।

मध्य प्रदेश के विधानसभा चुनाव में अब छह महीने बाकी हैं और दिग्विजय सिंह का नर्मदा परिक्रमा के बहाने एक बार फिर राज्य की राजनीति की नब्ज टटोलना ऐसे संकेत दे रहा है कि ‘‘पिक्चर अभी बाकी है मेरे दोस्त।’’

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