राजनीतिक अपराध का एक और काला पृष्ठ

मूल्यों पर आधारित राजनीति करने का आश्वासन देने वालों से उन्नाव की एक घटना कुछ सवालों के जवाब मांग रही हैं। मुख्य सवाल तो यही है कि राजनीति का अपराधीकरण हो रहा है या अपराध का राजनीतिकरण? एक और सवाल यह है कि राजनीति के अपराधीकरण ने सिस्टम को नाकारा बना दिया है। आखिर लोग जाएं तो जाएं कहां? मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अगर यूपी को अपराधमुक्त बनाना चाहते हैं तो इस मामले में दोषी विधायक को राजनीति एवं प्रशासनिक संरक्षण क्यों मिला? भले ही यह यूपी का मामला है, पर पूरे देश की नजरें इस पर टिकी हैं क्योंकि यह मामला उस सत्ताधारी पार्टी के विधायक से जुड़ा है जो राजनीति को अपराधमुक्त बनाने की बात करती है। अब यह राज्य सरकार पर है कि वह इस धारणा की कसौटी पर खरी उतरती है या नहीं? इस मामले की जल्द से जल्द निष्पक्ष जांच सुनिश्चित नहीं होती है तो इसके दुष्परिणाम झेलने के लिये तैयार रहना होगा।

ललित गर्ग

उन्नाव की यह घटना राजनीति में अपराध की बढ़ती ताकत को ही उजागर कर रही है। घटना दर्दनाक एवं त्रासद है जिसमें  इस गांव की लड़की का आरोप है कि विधायक कुलदीप सेंगर और उनके साथियों ने उसके साथ सामूहिक बलात्कार किया। लड़की थाने में शिकायत करने गई तो रपट दर्ज नहीं की गई। अदालत के आदेश पर कई दिनों बाद मामला दर्ज हुआ तो मुकद्दमा वापिस लेने के लिए परिवार पर दबाव बनाया गया, मारपीट की गई, जान से मारने की धमकियां दी गईं। पीड़िता जब थाने में तहरीर देने गई तो फर्जी मामला बनाकर उसके पिता को जेल भेज दिया गया। पीड़िता जब मुख्यमंत्री के आवास पर मिलने पहुंची तो उसे वहां भी हताशा ही मिली। उसने और उसके परिजनों को इतना परेशान किया गया कि आखिर उन्होंने मुख्यमंत्री आवास के सामने आत्मदाह करने की कोशिश की। कोई भी इस तरह अपनी जीवन लीला को समाप्त करने के लिये खुद को आग लगाता है तो इसका सहज ही अर्थ है कि उसे चारों तरफ से निराशा और हताशा मिली है, उसके साथ हुए अन्याय की सुनवाई कहीं नहीं है।

पीड़िता के साथ सत्ता के मद में पागल लोगों का अत्याचार कहीं भी रूकने का नाम नहीं ले रहा था, उनके सामने इंसानियत से बड़ी सत्ता बन गयी थी। यही कारण है कि लड़की के पिता को कुछेक आरोपों में गिरफ्तार कर लिया गया, कस्टडी में ही उनकी तबीयत खराब हुई और मौत हो गई। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में साफ है कि उनकी मौत पिटाई से हुई। फिर यह भी पता चला कि जिस जेल में पीड़िता के पिता बंद थे, उसमें कई चीजों की सप्लाई का जिम्मा विधायक के एक रिश्तेदार का था। पीड़ित परिवार का कहना है कि पुलिस प्रशासन विधायक को बचा रहा है, जबकि आरोपी विधायक पीड़िता के परिवार और अपने परिवार के बीच पुरानी रंजिश का हवाला देते हुए इसे अपने खिलाफ साजिश बता रहे हैं। इस मामले ने लोगों में प्रचलित इस धारणा को और पक्का किया है कि ताकतवर व्यक्ति या समुदाय आज भी पूरे तंत्र को उंगलियों पर नचा रहे हैं और एक साधारण व्यक्ति का सुरक्षित रहना सिर्फ एक संयोग है, और तो और, उसके साथ अन्याय होने पर उलटे उसी को दोषी भी ठहरा दिया जाता है।

मुख्यमंत्री योगी अब कह रहे हैं कि दोषी बख्शे नहीं जाएंगे लेकिन बड़ा सवाल यह है कि भाजपा विधायक को अब तक क्यों बचाया जाता रहा। योगी धर्म को धारण करने वाले व्यक्ति हंै। वे उत्तर प्रदेश की राजनीति को ही नहीं, समूचे प्रदेश को अपराध मुक्त करना चाहते हैं, उनकी मंशा एवं भावना में कोई खोट नहीं है, उनके न केवल पार्टी में बल्कि अन्य दलों में भी कायल लोग हैं। लेकिन विडम्बनापूर्ण तो यह है कि वे ऐसे लोगों से घिरे हैं, जिनका लक्ष्य सुख भोगना है, देश के धन को जितना अधिक अपने लिए निचोड़ा जा सके, निचोड़ लेना है, सत्ता का दुरुपयोग करना है। वे ऐसी ही स्वार्थी एवं अपराधी राजनीति से घिरे हुए हैं। इस चक्रव्यूह को भेद कर उन्हें न्याय का मार्ग निकालना है और पीड़ित परिवार को इंसाफ दिलाना है, यह बड़ी चुनौती है। कथनी और करनी को एक दिखाने के लिये यह करना जरूरी भी है। लेकिन लग रहा है इंसाफ गहरे धुंधलकों में दूबक गया है।

हमारी राजनीति का अपराधी एवं भ्रष्ट चरित्र देश के समक्ष गम्भीर समस्या बन चुका है। हमारी बन चुकी मानसिकता में आचरण की पैदा हुई बुराइयों ने पूरे तंत्र और पूरी व्यवस्था को प्रदूषित कर दिया है। स्वहित और स्वयं के सुखभोग में ही लोकहित है, यह सोच हमारे समाज मंे घर कर चुकी है। यह राजनीति रोग मानव की वृत्ति को इस तरह जकड़ रहा है कि हर राजनीतिक व्यक्ति लोक के बजाए स्वयं के लिए सब कुछ कर रहा है। भ्रष्ट आचरण और व्यवहार अब हमें पीड़ा नहीं देता। ताकतवर लोग अपनी सब बुराइयों, कमियों, अपराधों को इस तरह प्रस्तुत करते हैं कि जैसे वे तो दुध के धुले हैं। जबकि सच तो यह है कि बुराई लोकतांत्रिक व्यवस्था में नहीं, बुरे तो हमारे राजनेता हैं। वैसे हर क्षेत्र में लगे लोगों ने ढलान की ओर अपना मुंह कर लिया है चाहे वह क्षेत्र राजनीति का हो, पत्रकारिता का हो, प्रशासन का हो, सिनेमा का हो, शिक्षा का हो या व्यापार का हो। राष्ट्रद्रोही स्वभाव हमारे लहू में रच चुका है। अपराध करना अपना अधिकार मानने लगे हैं, भ्रष्टाचार शिष्टाचार हो गया है। यही कारण है कि हमें कोई भी कार्य राष्ट्र के विरुद्ध नहीं लगता और न ही ऐसा कोई कार्य हमें विचलित करता है। यह रोग भी राजरोग बन रहा है। कुल मिलाकर जो उभर कर आया है, उसमें आत्मा, नैतिकता व न्याय समाप्त हो गये हैं।

उन्नाव की विसंगति को दूर करना जरूरी है और नैतिकता की भी मांग है कि अपने अपराध को ढंकने के लिये अथवा राजनीतिक स्वार्थ के लिए हकदार का हक नहीं छीना जाए, जिसके साथ अन्याय हुआ है, उसे न्याय मिले। जो भी हो, मामले की गहराई से जांच होनी चाहिए और इसका हर पहलू सामने आना चाहिए। उत्तर प्रदेश की जनता को उम्मीद है कि शायद भगवा पहनने वाले योगी आदित्यनाथ उनकी परेशानियों को दूर कर देंगे और अपराधिक शक्तियों को ताकतवर नहीं बनने देंगे।