दलबदलुओं से कलंकित होती राजनीति

पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त जेएम लिंगदोह ने अपनी सेवा निवृति से पूर्व राजनीति में प्रवेश होने की अटकलों से संबंधित पूछे गए सवाल के जवाब में कहा था कि-मैं राजनीतिज्ञों को अपने पास बिठाना भी पसंद नहीं करता।’ उन्होंने भारतीय राजनेताओं की निम्नस्तरीय हरकतों तथा उनकी स्वार्थपूर्ण व विचार व सिद्धांतविहीन राजनीति से दु:खी होकर ऐसा उत्तर दिया था। निश्चित रूप से भारतीय राजनीति दिन-प्रतिदिन अपना स्वरूप कुछ ऐसा ही बनाती जा रही है जिसे देखकर कोई भी सिद्धांतवादी,विचारवान,उज्जवल राष्ट्र की कल्पना करने वाला तथा सच्चे मन से राष्ट्र की सेवा का संकल्प करने वाला सज्जन व्यक्ति राजनीति में प्रवेश करने की कल्पना भी नहीं कर सकता। चाहे आप धर्म व जाति के आधार पर देश में नफरत फैलाने का बढ़ता ‘कारोबार’ देखें या देश को लूटकर खाने और अपनी भविष्य की दस पुश्तों तक के लिए अकूत धन-संपत्ति की व्यवस्था करने की हवस,आपको राजनीतिज्ञ ही सबसे आगे दिखाई देंगे। देश के लोकतंत्र के चारों स्तंभों में सबसे अधिक अपराधी देश की संसदीय व्यवस्था में ही पाए जाएंगे। राष्ट्र निर्माण तथा देश के विकास का स्वयंभू ठेका लेने वाले व नीति निर्माताओं के इसी ‘गिरोह’ में आपको सबसे अधिक अज्ञानी व अनपढ़ लोग नज़र आएंगे। किसी अपराधी को गृहमंत्री बना देना, बीमार व्यक्ति को स्वास्थ्य मंत्री बनाना,अशिक्षित व अज्ञानी को शिक्षामंत्री का पद देना यह सब भारतीय राजनीति के ही कमाल हैं। और इन्हींं में एक सबसे बड़ी व दुर्भाग्यपूर्ण विसंगति है पद तथा सत्ता पाने के लिए विचारों तथा सिद्धांतों की राजनीति को खंूटी पर लटकाकर कभी भी किसी भी विचारधारा के दल में शामिल हो जाना। और इससे भी बड़ा आश्चर्य तब होता है जब मतदाता तथा जनता ऐसे सिद्धांतविहीन,अवसरवादी तथा सत्तालोभी नेताओं को बार-बार अपने सिर पर बिठाती है तथा उन्हें अलग-अलग विचारधारा रखने वाले दलों से निर्वाचित कर उनके  दलबदल करने के स्वार्थपूर्ण हौसले को बुलंद करती है।

निर्मल रानी

इन दिनों भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह अपने इसी मिशन में लगे हुए हैं वे अन्य दलों के उन नेताओं पर गहरी नज़र रखते हैं जो किसी भी कारण से अपनी पार्टी से नाराज़ हो चुके हैं। निश्चित रूप से आज देश में राजनीति का स्तर वह नहीं रहा जो तीन-चार दशक पूर्व तक हुआ करता था। आज देश में भले ही वामपंथी शासन वाले राज्य कम क्यों न होते जा रहे हों परंतु इसमें कोई संदेह नहीं कि वामपंथी दलों में सत्तालोभी तथा सिद्धांतविहीन दलबदलुओं की संख्या अन्य दलों की तुलना में कहीं कम मिलेगी। शेष दल चाहे वे स्वयं को दक्षिणपंथी कहें,समाजवादी अथवा मध्यमार्गी परंतु इन सभी दलों में सत्तालोभी तथा विचारहीन नेताओं की भरमार देखी जा सकती है। यहां तक कि स्वयं को अनुशासित तथा सांस्कृतिक राष्ट्रवादी कहने वाले राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रशिक्षित कार्यकर्ता केशूभाई पटेल व शंकरसिंह वाघेला जैसे कई नेता सत्ता संघर्ष को लेकर वैचारिक दलबदल करते देखे जा चुके हैं। इसी कड़ी में ताज़ी घटना नरेश अग्रवाल नामक उत्तर प्रदेश के एक नेता के दलबदल से जुड़ी हुई है। नरेश अग्रवाल ने अपने राजनैतिक जीवन की शुरुआत युवा कांग्रेस के कार्यकर्ता के रूप में की थी। कांग्रेस पार्टी ने ही उसे 70 व 80 के दशक में पहचान दिलाई तथा पहली बार वे कांग्रेस के टिकट पर ही विधायक बने। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी तथा बहुजन समाज पार्टी के बढ़ते प्रभाव के बाद जब कांग्रेस सिकुडऩे लगी उसी समय अग्रवाल ने कांग्रेस का दामन छोड़ दिया और कभी अपना संगठन बनाया तो कभी समाजवादी पार्टी के दरवाज़े पर जा खड़े हुए। अपनी सत्ता के दौरान इन्होंने बेहिसाब धन-संपत्ति तो इक_ा की ही साथ-साथ अपने पुत्र सहित परिवार के कई सदस्यों को राजनीति में भी आगे किया। वे अपने विवादित बोलों के लिए जाने जाते रहे हैं। पिछले दिनों उन्होंने समाजवादी पार्टी छोड़ भारतीय जनता पार्टी का दामन केवल इसलिए थाम लिया क्योंकि सपा ने पार्टी की ओर से राज्यसभा का उम्मीदवार जया बच्चन को बना दिया। अग्रवाल को यह बात नागवार गुज़री और उन्होंने सपा छोड़ भाजपा में जाने का फैसला किया।

भारतीय लोकतंत्र में किसी भी विचारधारा से जुडऩा अथवा किसी भी राजनैतिक दल का सदस्य बनना उसकी स्वेच्छा पर निर्भर करता है। लोकतंत्र में पक्ष-विपक्ष तथा भिन्न-भिन्न विचारधाराओं का होना तथा इन सब वैचारिक भिन्नताओं के बावजूद लोकतंत्र का मज़बूती के साथ आगे बढऩा ही हमारे भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी विशेषता व मज़बूती है। परंतु जब नेतागण आए दिन कपड़ों की तरह विचारधारा बदलने लगें और अपनी उज्जवल राजनैतिक भविष्य को मद्देनज़र रखते हुए दल-बदल करते देखे जाने लगें या फिर अनेक नेता इसलिए पार्टी छोड़ दें क्योंकि उन्हें पार्टी ने किसी पद विशेष हेतु चयनित नहीं किया या प्रत्याशी नहीं बनाया अथवा उन्हें मंत्री नहीं बनाया गया या उनके लाडले पुत्र,पत्नी अथवा भाई या साले-साली को टिकट नहीं दिया गया या फिर उन्हें उनकी मजऱ्ी का मंत्रालय आबंटित नहीं किया गया,ऐसे रीढ़ विहीन,विचारविहीन, सिद्धांतविहीन तथा सत्तालोभी नेताओं से देश या देश की जनता आिखर क्या उम्मीद रख सकती है? ज़रा सोचिए कि जो उमा भारती कल तक गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को विनाश पुरुष कहकर संबोधित करती थी आज वही उमा भारतीय नरेंद्र मोदी के मंत्रिमंडल की सम्मानित सदस्या हैं। एक वीडियो में उन्हें साफतौर पर यह कहते सुना जा सकता है कि-’ मैं मोटा भाई को सन् 73 से जानती हूं वह विकास पुरुष नहीं विनाश पुरुष हैं उन्होंने गुजरात का विनाश किया है’। उन्होंने यह भी कहा था कि-‘गुजरात भययुक्त राज्य हो गया है यह नरेंद्र मोदी की देन है’।

इसी प्रकार दल बदल के ताज़ातरीन नायक नरेश अग्रवाल भी राज्यसभा में हिंदू देवी-देवताओं के विरुद्ध अभद्र टिप्पणी कर चुके हैं। वे पाकिस्तान की जेल में बंद भारतीय नागरिक कुलभूषण जाधव को लेकर भी राज्यसभा में विवादित बयान दे चुके हैं। और तो और 2013 में इसी नरेश अग्रवाल ने नरेंद्र मोदी के बारे में ऐसे अपशब्द इस्तेमाल किए थे जो किसी अन्य नेता ने नहीं किए। उन्होंने एक सार्वजनिक सभा में कहा था कि-‘मोदी प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं लेकिन चाय की दुकान से निकल कर आए व्यक्ति की सोच राष्ट्रव्यापी नहीं हो सकती’। अपने विरुद्ध दिए जाने वाले ऐसे बयानों का राजनैतिक लाभ उठाने में पूरी महारत रखने वाले नरेंद्र मोदी ने भी उसी समय नरेश अग्रवाल की बात का जवाब एक सभा में देते हुए यह कहा था कि-‘यह सिर्फ मोदी का मामला नहीं है, इससे पता चलता है कि अमीर परिवारों में कैसे लोग पैदा होते हैं, जो शाही जि़ंदगी गुज़ारते हैं और गरीबों का मज़ाक उड़ाते हैं। यही वजह है कि यह लोग ऐसी भाषा का इस्तेमाल करते हैं’। आज यही नरेश अग्रवाल भारतीय जनता पार्टी के सम्मानित सदस्य बन चुके हैं। अब संभवत: उनके सभी कटु वचन मधुर वचन में परिवर्तित हो चुके हैं। अब वही भाजपाई जो कल तक राज्यसभा में दिए गए उनके विवादित बयानों पर हंगामा खड़ा करते दिखाई देते थे वही अब उनके गले में बाहें डाले दिखाई देंगे। ऐसे में बार-बार यही सवाल उठता है कि क्या देश की जनता हमारे देश के भोले-भाले मतदाता ऐसे सिद्धांतविहीन,सत्तालोभी,स्वार्थी तथा राजनीति को भी राष्ट्रसेवा का माध्यम समझने के बजाए कमाने-खाने का धंधा समझने वाले लोगों पर भविष्य में भी विश्वास करती रहेगी? ऐसे दलबदलुओं को सबक सिखाना मतदाताओं का धर्म है।