थालियों में ज़हर, सरकारें मौन

एक ओर तो देश की जनता पहले ही मंहगाई की मार से बुरी तरह से जूझ रही है। खासतौर पर रोज़मर्रा के इस्तेमाल में आने वाले खाद्य पदार्थ,अन्न,दालें,तेल,घी, सब्जि़यां तथा रसोई में काम आने वाली ऐसी अनेक दैनिक उपयोगी वस्तुओं के मूल्य आसमान को छू रहे हैं। यदि ऐसे में नागरिकों को मंहगे मूल्य पर मिलने वाला कोई सामान भी असली के बजाए नकली अथवा रसायनयुक्त मिले या उन्हें कृत्रिम तरीकों से तैयार की गई ज़हरीली सामग्री परोस दी जाए फिर तो यह जले पर नमक छिडक़ने जैसी ही बात है। परंतु यह एक ऐसी हकीकत है जो भले ही सरकार की चाटुकारिता में लीन कारपोरेट घरानों के स्वामित्व में चलने वाले टीवी चैनल्स अथवा बड़े समाचार पत्रों द्वारा क्यों न नज़रअंदाज़ कर दी जाए परंतु इंटरनेट और सोशल मीडिया के अनियंत्रित माध्यमों ने तो इनकी पेाल खोल कर रख ही दी है। आए दिन फेसबुक,व्हाट्सएप और दूसरे माध्यमों से आम जनता कोई न कोई ऐसे राज़ खोलती रहती है जिससे आम जनता स्वयं को असहाय एवं ठगा हुआ सा महसूस करती है। इस प्रकार से खुलेआम बाज़ार में ऐसी रसायन युक्त,कृत्रिम तथा नकली व ज़हरीली वस्तुओं का उसके उत्पादन स्त्रोत से लेकर बाज़ारों व गली-कूचों तक की दुकानों तक पहुंचाना निश्चित रूप से बेहद चिंता का विषय है। परंतु बड़े दु:ख की बात है कि जिधर देखिए उधर सरकारें केवल अपनी पीठ थपथपाने में व्यस्त हैं। जिस आम जनता को उसकी मेहनत की कमाई के बदले में शुद्ध व स्वच्छ खाद्य सामग्री मिलनी चाहिए वह तो नहीं मिल पा रही है परंतु जनता के टैक्स के पैसों से राजनेता पूरी ऐशपरस्ती के साथ चुनाव लडऩे की मुद्रा में हर समय ज़रूर दिखाई देते हैं। क्या एक प्रगतिशील देश की यही परिभाषा है?

निर्मल रानी

एक-दो या चार नहीं बल्कि सैकड़ों वीडियो इस आशय के सोशल मीडिया पर अलग-अलग लोगों द्वारा वायरल किए जा चुके हैं जिनमें यह दिखाया जाता है कि आम आदमी की थाली में इन दिनों प्लास्टिक अथवा किसी अन्य कृत्रिम तरीके से तैयार किए गए चावल पहुंच चुके हैं। यह चावल केवल दुकानों में ही नहीं मिल रहे बल्कि इनकी आपूर्ति रेलवे कैंटीन व रेल पैंट्री कार तक भी हो चुकी है। इस संबंध में वीडियो तैयार करने वाले जागरूक उपभोक्ताओं ने हर बार यह दिखाने की कोशिश की कि किस प्रकार उनकी थाली में परोसे गए चावल को देखकर जब उन्हें संदेह हुआ तो वे पके हुए चावल को मु_ी में लेकर उसे टेनिस बॉल की तरह मु_ी में दबाकर गोल गेंद की शक्ल देते हैं। उसके बाद जब उस टेनिस बॉल रूपी चावल की गेंद को टेबल अथवा ज़मीन पर ज़ोर से फेंकते हैं तो वह बिल्कुल गेंद की ही तरह उछलती है। जबकि प्राकृतिक चावल के साथ ऐसा नहीं होता। ऐसी वीडियो दिखाने वालों ने बाद में जब रेस्टोरेंट अथवा कैंटीन के मालिक से इस विषय पर अपना प्रतिरोध दर्ज कराया तो वे आनाकानी करते, वीडियो बनाने से रोकते तथा उस संदेहपूर्ण चावल की थाली को बदलकर दूसरा असली चावल उनकी थाली में परोसते भी दिखाई दिए। हद तो तब हो गई जबकि एक जागरूक रेल यात्री ने संदेह होने पर रेल पैंट्री में परोसे गए ऐसे ही कथित प्लास्टिक अथवा कृत्रिम चावल की गेंद उछालती हुई वीडियो बना डाली। कोई आश्चर्य नहीं कि यदि भ्रष्टाचारियों व अपराधियों का संयुक्त नेटवर्क यूं ही फलता-फूलता रहा तो भविष्य में प्रस्तावित बुलेट ट्रेन में भी ऐसे ही चावल परोसे जाएं। इसी प्रकार की एक वीडियो में  कई जागरूक नागरिकों  ने यह साबित करने की कोशिश की कि चीनी के टुकड़ों में भी इसी प्रकार के प्लास्टिक के अथवा किसी केमिकल के क्रिस्टल बड़ी मात्रा में मिलाए गए हैं। इसका निरीक्षण करने के लिए जब उसने चीनी को गर्म पानी में मिलाया तो चीनी पूरी तरह से घुल गई। परंतु जब वही चीनी उसने एक चाय की छलनी में डालकर उस पर ठंडा पानी डाला तो चीनी के दाने तो घुल गए परंतु उन्हीं चीनी के दानों के साथ बड़ी मात्रा में मिलाए गए कृत्रिम चीनी के टुकड़े जोकि प्लास्टिक अथवा किसी अन्य रसायन से तैयार किए गए प्रतीत हो रहे थे वे नहीं गल सके। छलनी में बचा हुआ पदार्थ हाथ से छूने पर चिपचिपा सा कोई लसदार तत्व दिखाई दिया। बताया तो यह भी जा रहा है कि इस तरह की वस्तुएं चीन से बनकर हमारे देश के बाज़ारों में धड़ल्ल्ेा से आ रही हैं और बेची जा रही हैं। इसी प्रकार की और भी अनेक खाद्य सामग्रियां इन दिनों संदेह के घेरे में हैं। ऐसा नहीं है कि सोशल मीडिया पर अपनी पैनी नज़र रखने वाली सरकार या गुप्तचर एजेंसियों की नज़रों के सामने से ऐसे वीडियो नहीं गुज़रते। स्वतंत्र सोशल मीडिया की ताकत ने जनता को जागरूक करने तथा सरकारों के नुमाइंदों व सरकारी मशीनरी की आंख व कान खोलने में निश्चित रूप से बड़ी सहायता की है। पंरतु उसके बावजूद सरकार या प्रशासन इस तरह की गंभीर चुनौतियों का सामना कर पाने में विफल है।

हालांकि इसी सोशल मीडिया के माध्यम से अनेक ऐसे वीडियो भी आते हैं जो सत्य से परे प्रतीत होते हैं। परंतु इसके बावजूद जनता को इन वीडियो में दिखाए जा रहे तथ्यों के विषय में पूरी सही जानकारी मिलना ज़रूरी है। मिसाल के तौर पर आजकल यह भी चर्चा छिड़ी हुई है और सोशल मीडिया पर ज़बरदस्त तरीके से प्रचारित किया जा रहा है कि चीन भारत में नकली अंडे भी बनाकर भेज रहा है। बंद गोभी जैसी सब्जि़यों के बारे में भी यही बात कही जा रही है।  संभव है कि यह सब अफवाह मात्र हो। परंतु चावल व चीनी जैसी वस्तुएं जिनके बिना भारतीय लोग रह ही नहीं सकते और इसकी खपत व बिक्री प्रतिदिन पूरे देश में बड़ी मात्रा में होती है ऐसी वस्तुओं पर सरकार का संज्ञान लेना बेहद ज़रूरी है। हमारे देश की आम जनता पहले ही खेतों में इस्तेमाल की जाने वाली अत्यधिक पेस्टीसाईज़, यूरिया तथा खेतों में छिडक़ाव की जाने वाली अनेक ज़हरीली दवाईयों के प्रभाव से ग्रसित है। बाज़ार में मिलने वाली सब्जि़यों को कैसे जल्दी व समय से पूर्व तैयार किया जाता है यह सब कई बार विभिन्न टीवी चैनल्स पर भी दिखाया चुका है और इसपर कई स्टिंग आप्रेशन भी हो चुके हैं।

इसी प्रकार दूध में होने वाली मिलावट या रासायनिक दूध की आम लोगों तक होने वाली आपूर्ति का तो यह आलम है कि अब बाज़ार में बिकने वाला कोई भी दूध, दूध जैसा स्वादिष्ट या शुद्ध तो प्रतीत ही नहीं होता। ज़ाहिर है जब दूध और चीनी ही शुद्ध नहीं तो शुद्ध मिठाई या शुद्ध खोए की उम्मीद करना ही बेमानी है। इसी तरह बाज़ार में बिकने वाले फल, उत्पादन से लेकर उन्हें पकाए जाने तक की प्रक्रिया में भी जिस प्रकार केमिकल्स तथा ज़हरीली दवाईयों के संपर्क से गुज़रते हैं वह भी प्रत्येक व्यक्ति भलीभांति जानता है। कहना गलत नहीं होगा कि इन दिनों मरीज़ों की निरंतर बढ़ती जा रही संख्या,कम उम्र में बच्चों को होने वाली खतरनाक बीमारियां,कैंसर व हृदय रोग के लगातार बढ़ते जा रहे मरीज़, छोटे-छोटे बच्चों की आंखों पर चश्मे लगने जैसी समस्याएं,छोटे-छोटे बच्चों को पीलिया,हृदय रोग तथा डाईबिटिज़ जैसी होने वाली बीमारियां अपने-आप में इस बात का द्योतक हैं कि हमारे देश में खाद्य पदार्थों व सामग्रियों के उत्पादन,आपूर्ति तथा इसके क्रय-विक्रय में सबकुछ ठीक-ठाक नहीं चल रहा है। ऐसे में देश की भोली-भाली जनता को जिसे कि इन चीज़ों के परखने की बिल्कुल समझ नहीं है उसे ऐसी ज़हरीली व रसायनयुक्त वस्तुओं के उपयोग से बचाने की पूरी जि़म्मेदारी देश की उन जनप्रतिनिधि सरकारों की है जो इसी जनता के वोट पर ऐशपरस्ती  करते हैं और फर्श से अर्श पर भी पहुंच जाते हैं। जनता के सेवक के रूप में कार्य करने वाले प्रशासनिक लोगों को भी इस विषय पर गंभीर होने की ज़रूरत है।