अब रानी लक्ष्मीबाई पर निर्माणाधीन फिल्म मणिकर्णिका पर विवाद

अभी पदमावती बनाम ‘पद्मावत‘ फिल्म पर चला विवाद पूरी तरह खत्म भी नहीं हुआ है कि देश के 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की नायिका रहीं झांसी की रानी लक्ष्मीबाई पर निर्माणाधीन फिल्म ‘मणिकर्णिका- द क्वीन आफ झांसी‘ पर विवाद शुरू हो गया है। राजस्थान की सर्व ब्राह्मण महासभा के अध्यक्ष सुरेश मिश्रा ने कहा है कि इस फिल्म में रानी लक्ष्मीबाई को किसी अंग्रेज हुक्मरान की प्रेमिका के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। राजस्थान सरकार को फिल्म की शूटिंग तत्काल रोकने का अल्टीमेटम भी महासभा द्वारा दिया गया है।

दरअसल इस फिल्म की शूटिंग जयपुर के अलावा राजस्थान के कई शहरों में चल रही है। फिल्म में इतिहास के साथ खिलवाड़ करते हुए कई विवादित प्रसंग व दृश्‍य जोड़े जाने की बात कही जा रही है। इसी आधार पर महासभा ने फिल्म निर्माता कमल जैन से पूछा है कि वह पहले यह बताएं कि किस इतिहास पुस्तक और ऐतिहासिक दस्तावेजों के आधार पर विवादित प्रसंग फिल्म में जोड़े गए हैं ? फिलहाल महासभा को निर्माता ने कोई उत्तर नहीं दिया है। इस कारण इतिहास के साथ छेड़छाड़ का संदेह और गहराता जा रहा है।

प्रमोद भार्गव

महासभा के अध्यक्ष ने फिल्म निर्माता से 12 दिन पहले 3 सवाल पूछे थे। एक, फिल्म किस लेखक की किताब के आधार पर बन रही है ? दो, कहानी के तथ्य कहां से लिए गए हैं ? तीन, फिल्म में किस प्रकार के गानों का प्रदर्षन किया जाएगा ? ये सवाल ऐसे है, जिनका उत्तर देना आसान है। चूंकि निर्माता कमल जैन ने अब तक जवाब नहीं दिए हैं, इसलिए दाल में कुछ काला नजर आना स्वाभाविक है। फिल्म उद्योग के लेखक, निर्माता, निर्देशक और कलाकार इतिहास और मिथक के साथ अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर घालमेल करते रहे हैं। पद्मावत पर उठा विवाद इसी घालमेल की स्थिति को स्पष्‍ट नहीं करना था। नतीजतन देश के हिंदी क्षेत्र में हिंसा और आगजनी की अनेक घटनाएं घटीं। यहां तक कि बंद और प्रदर्शनों के दौरान उपद्रवियों ने गुरूग्राम में एक स्कूल बस पर भी पथराव किया। लिहाजा रानी लक्ष्मीबाई पर बन रही फिल्म में इतिहास और लोकमान्यता के साथ कोई फेरबदल कर फिल्म बनाई जा रही है, तो इसका स्पष्‍टीकरण समय रहते दिया जाना जरूरी है। हालांकि संविधान में अभिव्यक्ति की आजादी पर अंकुश लगाने के अपवाद दिए गए हैं और वह आधार तय करने के लिए सेंसर बोर्ड से लेकर अदलतें तक हैं। किंतु इनके पास फिल्म पूरी होने के बाद पहुंचती है। इसके पहले देश व राज्य के समानांतर सामाजिक संगठन इन विवादों को आहत भावनाओं के आधार पर उठाते हैं, लेकिन ज्यादातर मामलों में जब तक भावनाएं उमड़कर आक्रोश और हिंसा के लिए विवश नहीं हो जाती तब तक जिम्मेबार शासन-प्रशासन कमोबेश मौन ही रहता है। बल्कि पद्मावत के परिप्रेक्ष्य में तो यह देखने में आया है कि राज्य सरकारों ने न केवल अराजक गतिविधियों को निहारा, बल्कि मौन रहकर उकसाने का काम भी किया। गोया, मणिकार्णिका पर सावधानी बरतने की जरूरत है। क्योंकि रानी लक्ष्मीबाई के चरित्र की छवि पूरे देश के जनमानस में एक पवित्र, षील, जुझारू और अंग्रेजों के छक्के छुड़ा देने वाली बलिदानी वीरांगना की रही है।

दरअसल इस फिल्म में यदि रानी लक्ष्मीबाई से जुड़े कोई प्रेम प्रसंग हैं तो वह जरूर मूल रूप से फ्रेंच भाषा में लिखे गए उपन्यास ‘ला फेम सेक्री‘ से लिए गए होंगे। इस उपन्यास में रानी के चरित्र पर गंभीर लाछन लागाए गए हैं। इस उपन्यास का आंग्रेजी अनुवाद पहले से ही विवाद के कठघरे में है। इसका विरोध 2011 में मध्य प्रदेश सरकार में तत्कालीन शिक्षा एवं संस्कृति मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा लिखित रूप में कर चुके हैं। शर्मा ने इस सिलसिले में फ्रांस दूतावास के जरिए फ्रांसीसी उपन्यासकार माइकल डी ग्रीस को कड़े शब्दों में चिट्ठी भी लिखी थी। चिट्ठी में लक्ष्मीबाई के बारे में की गई अशिष्‍टता के लिए भारतीय समाज से माफी मांगने का आग्रह भी किया गया था। दरअसल लॉ फेम सेक्री नाम का इस उपन्यास का अनुवादित अंग्रेजी संस्करण तब देखने में आया जब मध्य प्रदेश के कुछ दक्षिणपंथी लेखक भारत के पहले स्वतंत्रता संघर्ष के नायकों के बारे में ऐतिहासिक संदर्भ और अभिलेख खंगाल रहे थे। इस उपन्यास में लक्ष्मीबाई को समान्य व कमजोर महिला के रूप में दिखाने की कोशिश की गई है। जबकि वे ऐसी कतई नहीं थीं। उन्होंने न केवल अंग्रेजों से लोहा लिया, अपितु ग्वालियर साम्राज्य के सामंत जयाजीराव सिंधिया को भी सीधे मुकाबले में परास्त कर आगरा भागने पर विवश कर ग्वालियर पर अधिकार प्राप्त कर लिया था।

इस उपन्यास में एक ऐसा सरासर झूठा प्रसंग गढ़ा गया है, जिसमें यह जताने की कोशिश की गई है कि उनके अंतर्मन में एक अंग्रेज वकील के प्रति रागात्मक आकर्षण पैदा हो गया था। परिणामस्वरूप रानी का दिल इस असंभव और श्रापित अनुराग की यंत्रणा भुगत रहा था। जान लेंग नामक यह फिरंगी वकील ब्रिटिश हुकूमत के नुमाइंदे के नाते झांसी स्थित रानी के महल में आता-जाता था और रानी से उसका वार्तालाप होता था। जबकि हकीकत यह है कि रानी अपने मंत्रियों और विश्‍वसनीय कानूनी सलाहकारों के साथ ही जान लेंग से बात करती थीं। उन्होंने कभी एकांत में लेंग से बात नहीं की। इस उपन्यास से पहले इस मनगढ़ंत प्रसंग का जिक्र न तो किसी भारतीय और अंग्रेज इतिहासकार ने किया और न ही अंग्रेज हुक्मरान जो दैनिक रोजनामचा लिखते थे, उनमें इस प्रसंग का हवाला है। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का प्रामाणिक इतिहास सावरकर और पंडित सुंदरलाल ने लिखा है, उनमें भी ऐसे किसी कल्पित प्रसंग का वर्णन नहीं है। वैसे भी लक्ष्मीबाई के समूचे जीवन और चरित्र के बारे में भारत में पर्याप्त तथ्य, पत्र और अभिलेखित साक्ष्य मौजूद है। उनसे प्रमाणित है कि रानी महातेजस्विनी, शील व संयंम से संपन्न चरित्रवान वीरंगना थीं। ऐसी ऐतिहासिक विभूति पर अपनी मनमानी लालसा व कल्पना आरोपित करना न तो श्रेष्‍ठ साहित्यकार का लक्षण है और न ही फिल्मकार का।

गोया यदि फिल्म में मनमाने प्रेम प्रसंगों का चित्रण किया जा रहा है तो यह बेहद दुख व क्षोभ के साथ गंभीर आपत्ति और तीव्र विरोध का विषय बनना स्वाभाविक है। दरअसल पाश्‍चात्य संस्कृति में ‘ सेक्स‘ के प्रति ‘आब्सेशन‘ की क्रिश्चन अस्थाएं सांस्कृतिक सरंचना से बाहर के मनोजगत, व्यक्तित्व व चरित्र को समझने में असमर्थ बनाती हैं। लिहाजा इन अस्थाओं को खासतौर से भारतीय संस्कृति और भावना पर आरोपित करना कतई उचित नहीं है। भारतीय पात्र को गल्प या फिल्म में चित्रित करने के लिए भारतीय वास्तविकताओं से तालमेल बिठाना जरूरी है। अपनी इच्छाओं और फैंटेसी को एक अपरिचित या नितांत भिन्न संस्कृति की ऐतिहासिक विभूति पर थोपना सार्वथा अनुचित है। सभी उपलब्ध ऐतिहासिक तथ्यों और दस्तावेजों से प्रमाणित है कि महारानी लक्ष्मीबाई फिरंगी आक्रांताओं की कपट चालों की गहरी समझ रखने वाली कूटनीतिक महिला थीं। साथ ही उनमें राजनीतिक व सामरिक प्रतिभा भी थी। इसीलिए वे अंग्रेजों के साथ स्थानीय भारतीय शासकों से लोहा ले पाई और अपनी मातृभूमि के लिए सर्वस्व बलिदान कर देने वाली वीरांगना कहलाईं। ज्ञात रहे कि इस पुस्तक के अलावा मधु किश्‍वर एवं रूथ वनिता द्वारा संपादित पुस्तक ‘इन सर्च आफ आंसर्सः इंडियन वूमेन्स वाइसेस फ्राम मानुशी‘ में भी लक्ष्मीबाई की युवावस्था को लेकर आपत्तिजनक प्रसंग उल्लेखित किए गए थे, जिन पर तीखा विरोध हुआ था। गोया फिल्मकार कमल जैन ने रानी से संबंधित आपत्तिजनक प्रसंग फिल्म लिए अथवा नहीं लिए हैं, इसका स्पश्टीकरण उन्हें देना चाहिए। वैसे भी उपन्यास या कहानी इतिहास नहीं होते। वैसे भी ऐतिहासिक फिल्म में इतिहास, कल्पना और मिथक का घालमेल व्यवसाय के लिए तो ठीक हो सकता है, लेकिन रचनाशीलता के बहाने यह छेड़छाड़ आर्थिक दोहन के अलावा कुछ नहीं है। गोया इतिहास जैसे र्गंभीर विषयों पर फिल्म बनाते समय ऐसे प्रसंगों से बचने की जरूरत है, जो इतिहास के साथ खिलवाड़ करते हुए जनमानस की भावनाओं को भी ठेस पहुचाने का काम करें।

 

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