अस्पताल में भ्रष्टाचार एक बदनुमा दाग

आजकल देश में भ्रष्टाचार सर्वत्र व्याप्त है। एक तरह से भ्रष्टाचार शिष्टाचार हो गया है। ऐसे-ऐसे घोटाले, काण्ड एवं भ्रष्टाचार के किस्से उद्घाटित हो रहे हैं जिन्हें सुनकर एवं देखकर शर्मसार हो जाते हैं। समानांतर काली अर्थव्यवस्था इतनी प्रभावी है कि वह कुछ भी बदल सकती है, बना सकती है और मिटा सकती है। भ्रष्टाचार का रास्ता चिकना ही नहीं, ढालू भी है। यही कारण है कि इसमें शिक्षा एवं चिकित्सा के क्षेत्र को भी नहीं बख्शा है। हमारा नेतृत्व और देश को संभालने वाले हाथ दागदार हैं इसलिए वे इस भ्रष्टाचार के खिलाफ कोई सख्त कार्रवाई करते हुए दिखाई नहीं देते। दिल्ली सरकार के सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल हो या देश के सर्वोच्च आॅल इंडिया मेडिकल इंस्टीच्यूट या सफदरजंग अस्पताल इन सभी जगहों पर भ्रष्टाचार का व्याप्त होना बेहद चिंताजनक है। हाल ही में दिल्ली सरकार के जीबी पंत में मरीजों के इलाज में भ्रष्टाचार की खबरों ने न केवल चैंकाया है बल्कि शर्मसार किया है। अस्पताल में दलालों का बोलबाला है जो मरीजों से पैसे लेकर न केवल उनका इलाज कराते हैं बल्कि ऑपरेशन तक की भी व्यवस्था करते हैं। जहां सरकारी अस्पतालों में मरीजों को इलाज के लिए लंबी लाइन या सिफारिशों की जरूरत पड़ती है। यह सब होने के बावजूद भी इलाज हो, इसकी कोई गारंटी नहीं है। जीबी पत के मामले में भ्रष्टाचारियों एवं दलालों ने दिल्ली सरकार के मंत्री इमरान हुसैन द्वारा भेजे गए असलम नामक मरीज को भी नहीं बख्शा। इससे पता चलता है कि दलालों को किसी का डर नहीं है और वह धड़ल्ले से अपना काम कर रहे हैं। इसमें अस्पताल के कई डॉक्टर व कर्मचारी भी शामिल हैं, क्योंकि इनके बगैर यह अवैध धंधा नहीं हो सकता है। इस मामले में जांच कमेटी की रिपोर्ट में भी यह बात सामने आई है कि अस्पताल भ्रष्टाचार व राजनीति का अड्डा बन गया है। इस तरह का भ्रष्टाचार कोई नया नहीं है। हमारा देश गरीबी और पिछड़ेपन का ही खिताब नहीं पहना है। अब तो वह विश्व के सामने भ्रष्टाचार की सूची में नामांकित हो गया है, इससे बढ़कर और क्या दुर्भाग्य होगा? क्या विश्व के हासिये में उभरती भारत की तस्वीर को हम कुछ नया रंग नहीं दे सकते? क्या विश्व का नेतृत्व करने के लिए हममें इन नकारात्मक मूल्यों को समाप्त करने की पात्रता विकसित नहीं हो सकती? सरकारी किसी की भी हो हमें व्यक्ति नहीं विचार और विश्वास चाहिए। चेहरा नहीं चरित्र चाहिए। बदलते वायदे नहीं, सार्थक सबूत चाहिए। वक्तव्य कम और कर्तव्य ज्यादा पालन होंगे। तभी नया भारत निर्मित हो पाएगा। केजरीवालजी एक धर्मगुरु की मुद्रा में आजकल रेडियो पर बच्चे के हवाले से कहते हैं कि कोई डाॅक्टर, इंजीनियर, आईएएस, सीए, बनें या न बनें पर एक अच्छा इंसान जरूर बनंे। केजरीवालजी बच्चों से पहले अपने कर्मचारियों को नैतिक बनाने की कोई मुहिम छेड़े।

ललित गर्ग

अस्पताल हों या स्कूलंे उनमें भ्रष्टाचार का पसरना एक अभिशाप है। आश्चर्य है कि सरकारी अस्पतालों के परिप्रेक्ष्य में कुछ दिनों में दलालों का इतना मजबूत नेटवर्क बना लिया है कि उनकी सेवाओं के बिना इलाज ही असंभव होता जा रहा है। निश्चित रूप से पिछले कई वर्षो से सरकारी अस्पतालों में यह सब चल रहा है। डॉक्टरों से मिलवाने, ऑपरेशन कराने, किसी तरह की जांच कराने, मरीज के लिए खून की व्यवस्था करने के एवज में पैसे लेने की शिकायतें पहले भी आती रही हैं, लेकिन दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई नहीं होती है। इन अस्पतालों में पहुंचने वाले ज्यादातर गरीब व मध्यमवर्गीय परिवार के मरीज होते हैं। वे निजी अस्पतालों में इलाज का खर्च वहन नहीं कर सकते हैं। इस स्थिति में सरकारी अस्पताल ही इनके लिए एक मात्र सहारा है, लेकिन वहां भी उन्हें निराशा हाथ लगती है। इस तरह के भ्रष्टाचार से दिल्ली सरकार के कामकाज पर भी प्रश्न चिह्न है। दिल्ली के लोगों के लिए जीबी पंत अस्पताल की 50 फीसद बेड आरक्षित करने की घोषणा की गई है, लेकिन इसका लाभ जरूरतमंदों को नहीं मिल रहा है। यह दिल्ली सरकार पर एक बदनुमा दाग है। उनकी कथनी और करनी में असमानता का द्योतक है।

यह भी एक तथ्य है कि हमें सफलता भी तब तक नहीं मिलेगी, जब तक हम प्रशासन शैली में या तो विरोध करते रहेंगे या खामोशी/चुप्पी साधे रहेंगे। जरूरत है इन दोनों सीमाओं से हटकर देश के हित में जो गलत है उसे लक्ष्मणरेखा दें और जो सही है उसे उदारनीति और सद्भावना से स्वीकृति दें।

प्रजातंत्र एक पवित्र प्रणाली है। पवित्रता ही उसकी ताकत है। इसे पवित्रता से चलाना पड़ता है। अपवित्रता से यह कमाजोर हो जाती है। ठीक इसी प्रकार अपराध के पैर कमजोर होते हैं। पर अच्छे आदमी की चुप्पी उसके पैर बन जाते हैं। अपराध, भ्रष्टाचार अंधेरे में दौड़ते हैं। रोशनी में लड़खड़ाकर गिर जाते हैं। हमें रोशनी बनना होगा। और रोशनी भ्रष्टाचार से प्राप्त नहीं होती।

हमने आजाद भारत का एक ऐसा सपना देखा था जहां न शोषक होगा न शोषित, न मालिक होगा और न मजदूर। न अमीर होगा और न गरीब। सबके लिए शिक्षा, रोजगार, चिकित्सा और उन्नति के समान, सही अवसर और बिना भ्रष्टाचार के सुविधाओं की उपलब्धि का नक्शा हमनें खींचा था। मगर कहां फलित हो पाया हमारी जागती आंखों से देखा गया स्वप्न? कहां सुरक्षित रह पाए जीवन-मूल्य? कहां अहसास हो सकी स्वतंत्र चेतना की अस्मिता? हमारी समृद्ध राष्ट्रीय चेतना जैसे बंदी बनकर रह गयी। शाश्वत मूल्यों की मजबूत नींवें हिल गई। राष्ट्रीयता प्रश्नचिन्ह बनकर दीवारों पर टंग गई। भ्रष्टाचार, शोषण, स्वार्थ और मायावी मनोवृत्ति ने विकास की अनंत संभावनाओं को थाम लिया। चरित्र और नैतिकता धुंधला गई। राष्ट्र में जब राष्ट्रीय मूल्य कमजोर हो जाते हैं सिर्फ निजी हैसियत से ऊंचा करना ही महत्वपूर्ण हो जाता है तो वह राष्ट्र निश्चित रूप से कमजोर हो जाता है। इसे कमजोर करने में भ्रष्टाचार के दलालों से ज्यादा खतरनाक है डाॅक्टरों की, राजनेताओं की आर्थिक भूख। यही कारण है कि हमारे जीवन में सत्य खोजने से भी नहीं मिलता। हमारा व्यवहार दोगला हो गया है। दोहरे मापदण्ड अपनाने से हमारी हर नीति, हर निर्णय समाधान से ज्यादा समस्याएं पैदा कर रही हैं।

सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि हम हर स्तर पर वैश्वीकरण व अपने को बाजार बना रहे हैं। यह विरोधाभास नहीं, दुर्भाग्य है। अपने को, समय को पहचानने वाला साबित कर रहे हैं। पर हमने अपने आप को, अपने भारत को, अपने पैरों के नीचे जमीन को नहीं पहचाना।

नियति भी एक विसंगति का खेल खेल रही है। पहले जेल जाने वालों को कुर्सी मिलती थी, अब कुर्सी पाने वाले जेल जा रहे हैं। यह नियति का व्यंग्य है या सबक? पहले नेता के लिए श्रद्धा से सिर झुकता था अब शर्म से सिर झुकता है। यह शर्म बढ़ते हुए भ्रष्टाचार के दावानल का परिणाम है। इस पर रोक लगना नये भारत के निर्माण की प्रथम प्राथमिकता होनी चाहिए।