मप्र में जलवायु परिवर्तन का दुष्प्रभाव : “नूरजहां” दुबलाई, रूठ रहा खरमोर

इंदौर,  मध्यप्रदेश में आम की खास किस्म “नूरजहां” और संकटग्रस्त प्रजाति के प्रवासी पक्षी खरमोर (लेसर फ्लोरिकन) पर जलवायु परिवर्तन का खतरा बढ़ रहा है। आबो-हवा की असामान्य करवटों से फलों के राजा की भारी-भरकम किस्म दुबला रही है और सूबे में डेरा डालने वाले मेहमान परिंदे की तादाद घटती जा रही है।

अफगान मूल की मानी जाने वाली आम प्रजाति “नूरजहां” के पेड़ मध्यप्रदेश के अलीराजपुर जिले के कट्ठीवाड़ा क्षेत्र में ही पाये जाते हैं।

इंदौर से करीब 250 किलोमीटर दूर कट्ठीवाड़ा में इस प्रजाति की खेती के विशेषज्ञ इशाक मंसूरी ने आज “पीटीआई-भाषा” से कहा, “पिछले एक दशक के दौरान मॉनसूनी बारिश में देरी, अल्पवर्षा, अतिवर्षा और अन्य मौसमी उतार-चढ़ावों के कारण नूरजहां के पेड़ों पर देरी से बौर (आम के फूल) आ रहे हैं, साथ ही, इसके फलों का वजन भी घटता जा रहा है।”

उन्होंने बताया कि किसी जमाने में नूरजहां के फलों का वजन 3.5 से 3.75 किलोग्राम के बीच होता था। लेकिन अब यह घटकर 2.5 किलोग्राम के आस-पास रह गया है।

मंसूरी ने बताया कि सामान्यत: नूरजहां के पेड़ों पर जनवरी से बौर आना शुरू होता है और इसके फल जून तक पककर तैयार हो जाते हैं। लेकिन इस बार इसके पेड़ों पर बौर नहीं के बराबर है।

उन्होंने कहा, “पिछले मॉनसून सत्र में हमारे इलाके में बारिश कम हुई थी जिससे भूमिगत जल स्तर गिर गया है। हालांकि, मुझे उम्मीद है कि फरवरी में नूरजहां के पेड़ों पर बौर बढ़ेगा।”

नूरजहां के फलों की सीमित संख्या के कारण शौकीन लोग तब ही इनकी “बुकिंग” कर लेते हैं, जब ये डाल पर लटककर पक रहे होते हैं। मांग बढ़ने पर इसके केवल एक फल की कीमत 500 रुपये तक भी पहुंच जाती है।

इस बीच, विशेषज्ञ तसदीक करते हैं कि प्रवासी पक्षी खरमोर की मध्यप्रदेश में आमद पर भी जलवायु परिवर्तन का विपरीत असर पड़ रहा है। यह परिंदा दुनियाभर में पक्षियों की 50 सबसे ज्यादा संकटग्रस्त प्रजातियों में शामिल है।

मध्यप्रदेश के वन विभाग और मुंबई की संस्था बॉम्बे नैचुरल हिस्ट्री सोसायटी के साथ मिलकर खरमोर पर अध्ययन कर रहे अजय गड़ीकर ने कहा, “यह देखा गया है कि मॉनसून सत्र में बारिश में देरी या अपेक्षाकृत कम वर्षा होने पर खरमोर मध्यप्रदेश में डेरा न डालते हुए प्रजनन के लिये गुजरात और राजस्थान जैसे पड़ोसी सूबों का रुख कर लेता है.”

उन्होंने बताया कि खरमोर आमतौर पर जुलाई के पहले पखवाड़े में मध्यप्रदेश पहुंचते हैं और प्रजनन के लिये तीन-चार महीनों तक रुकते हैं। लेकिन पिछली बार ये मेहमान परिंदे अगस्त के आखिरी पखवाड़े में सूबे में नजर आये थे।

गड़ीकर ने बताया कि खरमोर उन पक्षियों के समूह में शामिल हैं जो खासकर प्रजनन के लिये पर्याप्त घास वाली हरित भूमि (ग्रास लैंड) को चुनते हैं। वर्ष 2017 के मॉनसून सत्र के शुरुआती दौर में बारिश की कमी से मध्यप्रदेश में प्रवासी पक्षी की पसंदीदा बसाहट में जुलाई के पहले पखवाड़े में पर्याप्त घास नहीं उग पायी थी। इस कारण वे न केवल डेढ़ महीने की देरी से मध्यप्रदेश पहुंचे थे, बल्कि इनकी संख्या भी घट गयी थी।

पक्षी विशेषज्ञ के मुताबिक वर्ष 2017 के मॉनसून सत्र में सूबे की तीन अलग-अलग बसाहटों में महज आठ खरमोर दिखायी दिये थे, जबकि वर्ष 2016 में ऐसे करीब 20 मेहमान परिंदे दिखाई दिए थे।

उन्होंने कहा, “यह बात चिंताजनक है कि जलवायु परिवर्तन के कारण खरमोर पर वजूद का संकट बढ़ रहा है।”