मप्र में 23 फरवरी से बिखरेंगे भगोरिया हाटों के जनजातीय रंग

इंदौर, पश्चिमी मध्यप्रदेश में जनजातीय संस्कृति के भगोरिया हाटों का हफ्ते भर चलने वाला रंगारंग सिलसिला इस बार 23 फरवरी से शुरू होगा । देश-विदेश के सैलानियों के आकर्षण के कारण इन हाटों ने सूबे के सालाना पर्यटन कैलेंडर में खास जगह बना ली है । भगोरिया हाट झाबुआ, धार, खरगोन और बड़वानी जैसे आदिवासी बहुल जिलों के 100 से ज्यादा स्थानों पर होली के त्योहार से पहले अलग-अलग दिनों में लगते हैं । हजारों लोगों की भीड़ वाले इन साप्ताहिक हाटों की रौनक इतनी ज्यादा होती है कि ये बड़े मेलों में बदल जाते हैं। भगोरिया हाटों की सदियों पुरानी परंपरा जनजातीय युवाओं के बेहद अनूठे ढंग से जीवनसाथी चुनने की कहानियों के लिये भी मशहूर है। इन कहानियों के मुताबिक भगोरिया मेले में आदिवासी युवक पान का बीड़ा पेश करके युवती के सामने अपने प्रेम का इजहार करता है। युवती के बीड़ा ले लेने का मतलब है कि उसने युवक का प्रणय निवेदन स्वीकार कर लिया है। इसके बाद यह जोड़ा भगोरिया मेले से भाग जाता है और तब तक घर नहीं लौटता, जब तक दोनों के परिवार उनकी शादी के लिये रजामंद नहीं हो जाते। बहरहाल, भगोरिया को “जनजातीय परिणय पर्व” बताये जाने पर नयी पीढ़ी के आदिवासी आपत्ति जाहिर करते हैं। जनजातीय संगठन जय आदिवासी युवा शक्ति (जयस) के संस्थापक सदस्य महेश भाबर ने आज “पीटीआई-भाषा” से कहा, “भगोरिया हाट में किसी आदिवासी युवक का किसी युवती को पान खिलाना या गुलाल लगाना महज हर्षोल्लास का प्रतीक है। इसका शादी के प्रस्ताव से कोई लेना-देना नहीं है।” उन्होंने कहा, “यह सच है कि भगोरिया हाट आदिवासी युवक-युवतियों को मेल-जोल बढ़ाने का मौका मुहैया कराता है. लेकिन इसे आदिवासियों का परिणय पर्व करार देना सरासर गलत है।” बहरहाल, हर साल टेसू (पलाश) के पेड़ों पर खिलने वाले सिंदूरी फूल पश्चिमी मध्यप्रदेश के आदिवासियों को फागुन की आमद का संदेशा दे देते हैं और वे भगोरिया हाटों का इंतजार शुरू कर देते हैं। आदिवासी टोलियां ढोल और मांदल (पारंपरिक बाजा) की थाप तथा बांसुरी की स्वर लहरियों पर थिरकते हुए भगोरिया हाटों में पहुंचती हैं और होली के त्योहार से पहले जरूरी खरीदारी करने के साथ फागुनी उल्लास में डूब जाती है. ताड़ी (ताड़ के पेड़ के रस से बनी शराब) के बगैर भगोरिया हाटों की कल्पना भी नहीं की जा सकती। दूधिया रंग का यह मादक पदार्थ इन हाटों में शामिल आदिवासियों की मस्ती को सातवें आसमान पर पहुंचा देता है. आदिवासी युवक-युवतियों की टोलियां पारंपरिक वेश-भूषा में बड़े उत्साह से भगोरिया हाटों में पहुंचती हैं। कुछ टोलियों के “ड्रेस कोड” भी तय होते हैं और उन्हें एक जैसे रंगों के पारम्परिक कपड़ों में देखा जा सकता है. भगोरिया हाटों पर आधुनिकता का असर साफ महसूस किया जा सकता है. लेकिन वक्त के तमाम बदलावों के बावजूद इनमें आदिवासी संस्कृति के चटख पारंपरिक रंगों को अब भी निहारा जा सकता है।