शीर्ष न्यायालय में ठिठका लोकतंत्र

भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में यह पहली बार हुआ है कि सर्वोच्च न्यायालय ने चार वरिश्ठ न्यायाधीषों ने पत्रकार वार्ता आयोजित कर अपना असंतोश सार्वजनिक किया। आमतौर से ऐसा देखने में नहीं आया है कि न्यायालय के भीतर हुए किसी पक्षपातपूर्ण व्यवहार के परिप्रेक्ष्य में कुछ न्यायाधीषों को लोकतंत्र की रक्षा की गुहार लगाते हुए मीडिया को हथियार बनाने की जरूरत आन पड़ी हो ? न्यायमूर्ति जे. चेलमेष्वर, रंजन गोगोई, मदन बी लोकुर और कुरियन जोसेफ ने सीधे-सीधे षीर्श न्यायालय के मुख्य न्यायाधीष दीपक मिश्रा पर ऊंगली उठाई है। उनका आरोप है कि उनके सुझाव नहीं माने गए, लिहाजा उन्हें मजबूर होकर मीडिया के सामने आना पड़ा। इस मौके पर मुख्य न्यायाधीष के बाद दूसरे वरिश्ठ जज चेलमेष्वर ने कहा कि हम चारों इस बात पर सहमत हैं कि इस संस्थान को बचाया नहीं गया तो देष का लोकतंत्र जिंदा नहीं रह पाएगा। जबकि स्वतंत्र और निश्पक्ष न्यायापालिका भारतीय संवैघानिक व्यवस्था की रीढ़ है। सुप्रीम कोर्ट में प्रधान न्यायाधीष समेत 31 न्यायाधीषों के पद हैं। इनमें से 6 पद रिक्त हैं। यानी अन्य 21 न्यायमूर्तियों ने सीजेई की कार्यप्रणाली के संदर्भ में अपनी असहमति नहीं जताई है, तब क्या यह मान लिया ताए कि सीजेई वाकई में मनमानी पर उतारू हैं ? हकीकत तो यह है कि इससे लोकतंत्र को तो कोई खतरा नहीं है, लेकिन उसकी साख और गरिमा को जरूर पलीता लगा है। लिहाजा बेहतर होता यदि षीर्श न्यायालय के भीतर कहीं ठहराव या गतिरोध आ भी रहा था, तो उसे संवाद के जरिए सुलझा लिया जाता ?

प्रमोद भार्गव

देश की जनता यह मानकर चलती है कि उसकी आवाज यदि कहीं नहीं सुनी गई तो सुप्रीम कोर्ट द्वारा जरूर सुनी जाएगी। लेकिन अब चार न्यायाधीषों द्वारा उठाई आवाज इस तथ्य की और इंग्ति करती है कि जब वरिश्ठतम जजों की आवाज की अदालत ही अनदेखी कर रही है तो आम-आदमी की आवाज कैसे सुनी जाएगी ? वैसे भी अब वकीलों की षुल्क इतनी अधिक हो गई है कि दूरदाज क्षेत्रों में बैठे गरीब का सुप्रीम कोर्ट की देहरी तक पहुंचना ही नामुमकिन हो गया है। फिर भी आम-आदमी का यह मुगालता अच्छा ही था कि उसे सुप्रीम कोर्ट से न्याय की उम्मीद बंधी होने के कारण लोकतंत्र के इस तीसरे स्तंभ पर आस्था थी। इसी सूझ-बूझ से काम लेते हुए हमारे संविधान निर्माताओं ने हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था के सभी अंगों के स्वरूप और कामकाज की बुनियाद में जनतांत्रिकता अनिवार्य रूप से स्थापित की थी। लेकिन देखने में आ रहा है कि हमारी संवैधानिक संस्थाओं में आंतरिक लोकतेत्र का संकट बढ़ रहा है। राज्यसभा, लोकसभा, विधानसभा से लेकर राजनीतिक दलों में आतंरिक लोकतंत्र लगभग गायब है। विद्यायिका में तो हम लोकतंत्र का चीरहरण होते रोजाना देखते हैं, इसलिए अब अचंभित या परेषान नहीं होते। किंतु सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीष भी राजनेताओं के आचरण का अनुकरण करने लग जाएंगे, यह चिंतनीय पहलू है। क्योंकि न्यायालय और सीबीआई दो ही ऐसी संस्थाएं हैं, जिन पर देष का आम आदमी सबसे ज्यादा भरोसा करता है। गोया, इस ऐतिहासिक घटनाक्रंम से हड़कप मचना स्वाभाविक है।

हालांकि सुप्रीम और हाईकोर्ट के जज अपना असंतोश या न्यायालयों के भीतर जारी कदाचरण या अनैतिक गड़बड़ियों का खुलासा मर्यादित रूप में करते रहे हैं। कोलकाता उच्च न्यायालय के वरिश्ठ न्यायाधीष सीएस कर्णन ने बंद लिफाफे में न्यायपालिका में भ्रश्टाचार का मामला उठाते हुए 20 जजों के खिलाफ षिकायत दर्ज कराई थी। हाईकोर्ट के कुछ जजों पर भ्रश्टाचार के आरोप लगने पर जब उन्होंने नैतिकता के आधार पर इस्तीफे नहीं दिए तो महावियोग चलाकर उन्हें हटाया गया। बीते कुछ सालों में हाईकोर्ट जजों पर प्रषिक्षु छात्राओं से अष्लील अभ्रदता के आरोप भी लगे हैं। ऐसे जजों को सुप्रीम कोर्ट ने अनिवार्य सेवानिवृत्ति देकर न केवल षीर्श न्यायालय, अपितु लोक में न्याय की रक्षा की है, जिससे न्यायालय की पवित्रता में पलीता न लगे। बहरहाल, मीडिया को जो सात पृश्ठीय पत्र दिया हैं, उसमें खासतौर से प्रषासनिक व्यवस्था में स्थापित परिपाटी की अनदेखी करने की बात कही गई है। उच्चतम और उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीष दो प्रकार के कार्य करते हैं, एक न्यायिक मामलों का निराकरण, दूसरा प्रषासनिक व्यवस्था देखना। इस दूसरे प्रकार के काम के अंतर्गत विचाराधीन प्रकरणों की कार्य-तालिका (रोस्टर) तैयार होती है। जिसमें प्रधान न्यायाधीष विभिन्न सदस्यों और पीठों को मामले आबंटित करते हैं। मामलों को आबंटित करने की परिपाटी में प्रकरण की प्रकृति के हिसाब से वर्गीकरण करके रोस्टर में डाला जाता है। हैरानी इस बात पर है कि आपत्ति जताने वाले चारों जजों ने माना है कि रोस्टर तैयार करना प्रधान न्यायाधीष का विषेशाधिकार है। जब प्रधान न्यायाधीष को विषेशधिकार प्राप्त है तो सार्वजनिक आपत्ति की जरूरत क्यों ?

परिपाटी या परंपरा जो भी हो, किसी प्रकरण के पीठ के बंटवारें को लेकर ऐसी आपत्तियां उठाया जाना बेहद आसान है। कमोबेष इसी प्रकृति का विषेशाधिकार राज्यों के राज्यपालों को हासिल है और वे इस आधार पर सरकारों के अल्पमत में आते ही अपने नियोक्ता के पसंददीदा दल की सरकार बनाने में दिलचस्पी दिखाते रहते हैं। लेकिन राज्यपाल और प्रधान न्यायाधीष की कार्यप्रणाली में यहां बुनियादी अंतर यह है कि राज्यपाल के स्वयं के हाथ में अल्पमत की स्थिति में सीधे सत्ता निर्माण की कुंजी होती है, जबकि प्रधान न्यायाधीष केवल पीठों को मामले वितरित करने का काम करते हैं। मामले के निराकरण का दायित्व तो पीठ और उसमें षामिल न्यायाधीषों पर ही होता है। इस लिहाज से यदि प्रधान न्यायाधीष चंद मामले अपनी पसंद की पीठ को आबंटित कर भी देते हैं, तो इसमें लोकतंत्र पर पहाड़ क्यों टूटने लगा ? गोया, इस पत्रकार-वार्ता से न केवल अदालत की मर्यादा भंग हुई है, बल्कि यह आषंका भी दिखाई देने लगी है कि कहीं कालांतर में हाईकोर्ट की पीठों के जज इस पत्रकार-सम्मेलन का अनुकरण न करने लग जाएं ?

दरअसल रोस्टर तैयार करने और न्यायालय के विभिन्न सदस्यों एवं पीठों को प्रकरण आबंटित करने के प्रधान न्यायाधीष के विषेशाधिकार को मान्यता देने की परंपरा अदालत के कामकाज को अनुषासित और कारगर तरीके से संचालित करने की दृश्टि से विकसित हुई है। लेकिन यह प्रणाली अदालत में कार्यरत अन्य न्यायाधीषों पर प्रधान न्यायाधीष के उच्च प्राधिकार को कानूनी या तथ्यात्मक रूप से मान्यता नहीं देती है और न ही इस स्थिति को रेखाकिंत करती है कि प्रधान न्यायाधीष की यदि मामले के बाबत कोई प्रच्छन्न मंषा है भी तो पीठ उनकी मंषा के अनुरूप फैसला देने को बाध्य हो ? देष के संविधान में यह भलिभांति उल्लेखित है कि उच्चतम न्यायालय के प्रधान न्यायाधीष और उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीष अन्य न्यायाधीषों के ही समकक्ष हैं। अलबत्ता अदालत के मुखिया के नाते उन्हें अनौपचारिक रूप से अतिरिक्त सम्मान दिया जाता है।

दरअसल यह पत्रकार वार्ता उस प्रक्रिया के ठीक एक दिन बाद संपन्न हुई, जिसके तहत काॅलेजियम व्यवस्था का पालन करते हुए पांच वरिश्ठ न्यायाधीषों ने दो न्यायाधीषों की नियुक्ति के लिए नाम तय किए थे, इसी के अगले दिन चार वरिश्ठ न्यायाधीष प्रधान न्यायाधीष की कार्य प्रणाली को लेकर सवाल उठा देते हैं। गौरतलब है कि जो पत्र मीडिया को दिया गया, उसमें भी उस फैसले का हवाला दिया गया, ‘जिसमें 4 जुलाई 2017 को इसी अदालत की सात न्यायाधीषों की पीठ ने माननीय न्यायाधीष सीएस कर्णन से जुड़ा एक एससीसी (1) में फैसला सुनाया था। इस फैसले में (आरपी लूथरा मामले में दर्ज) हम में से दो ने कहा था कि न्यायाधीषों की नियुक्ति की प्रक्रिया पर दोबारा विचार करने और महाभियोग के अलावा सुधारात्मक उपायों के लिए एक तंत्र स्थापित करने की जरूरत है।‘ इस प्रसंग और पत्रकार सम्मेलन के समय से जाहिर होता है कि दो जजों की जो नियुक्तियां हुई हैं, उनको लेकर कहीं पेंच है, जो लोकतंत्र की दुहाई देने के बहाने कहीं न्यायालय की चैहद्दी में ठिठका हुआ है। लिहाजा अदालत के भीतर यह व्यवस्थाजन्य आंतरिक समस्या है, ऐसी प्रषासनिक समस्याओं से देष का लोकतंत्र खतरे में पड़ जाएगा, यह कहना व्यावाहरिक नहीं है।

वैसे भी लोकतंत्र की सीमा पर सैनिक और अंदर राजस्व व पुलिस के कर्मी रक्षा करते हैं न कि न्यायालय या न्यायाधीष ? क्योंकि इस प्रेस वार्ता के बाद इसके औचित्य के पक्ष व विपक्ष में सुप्रीम कोर्ट के ही विद्वान अधिवक्ता जिस तरह के सवाल खड़े कर रहे हैं, उससे यह एक राय कतई नहीं बन रही कि चार न्यायाधीषों ने जो पहल की, उससे इतर समस्या के समाधान का कोई रास्ता था ही नहीं ? षाीर्श न्यायालय की प्रतिश्ठा दांव पर लगे, इससे अच्छा है, असंतुश्ठ न्यायाधीष प्रधान न्यायाधीष दीपक मिश्रा से संवाद कायम कर पारदर्षी समाधान निकालकर न्यायालय और न्यायाधीषों का सम्मान बहाल करें। क्योंकि अंदरूनी विवाद को सार्वजनिक विवाद बनाने का जो कदम उठ गया है, वह अप्रत्याषित है। नतीजतन सर्वोच्च न्यायालय जैसी निर्विवाद माने जाने वाली संस्था ही विवाद के कठघरे में आकर खड़ी हो गई है।