पांच साल पुराने मामले में महज तीन घंटे में हुआ फैसला

नयी दिल्ली, दिल्ली उच्च न्यायालय ने मुकदमों के त्वरित निपटान का उदाहरण पेश करते हुए लंबे समय से लंबित हत्या के एक मामले में महज तीन घंटे में फैसला सुना दिया।

न्यायमूर्ति एस मुरलीधर और न्यायमूर्ति आई एस मेहता ने 29 वर्षीय उस व्यक्ति की अपील पर सुनवाई की जो अपने नाबालिग सौतेले बेटे की हत्या के लिए उम्रकैद की सजा का सामना कर रहा था। अदालत ने उसे हत्या के आरोपों से बरी कर दिया।

यह पीठ मामले की फास्ट ट्रैक सुनवाई करने में सक्षम है।

उत्तर प्रदेश निवासी मोसिन को निचली अदालत ने सितंबर 2017 में उम्रकैद की सजा सुनाई थी। उस पर ऐसा आरोप था कि उसने अपने तीन साल के सौतेले बेटे के रात में रोने से परेशान होकर उसके सिर पर पत्थर से वार किया जिससे उसकी मौत हो गई।

वकील सुमीत वर्मा ने 24 नवंबर 2017 को उच्च न्यायालय में एक अपील दायर करते हुए व्यक्ति की सजा और सजा पर आदेश को चुनौती दी थी।

उच्च न्यायालय ने सुनवाई के पहले दिन निचली अदालत के रिकॉर्ड मंगवाए। अगली सुनवाई पर पीठ ने आरोपी और वादी की दलीलें सुनी तथा तीन घंटे में सुनवाई पूरी कर फैसला सुना दिया।

वर्मा ने कहा कि अदालत ने इस मामले पर सुनवाई करने और इसका निपटान करने में जो तेजी दिखाई, उससे वह हैरान हैं।

पीठ ने कहा कि ऐसा लग रहा है कि निचली अदालत ने इस तथ्य पर गौर नहीं किया जिस कमरे में ये लोग सो रहे थे वह अंदर से बंद नहीं था।

अदालत ने कहा, ‘‘अभियोजन पक्ष ने इस संभावना को खारिज नहीं किया उस रात को बच्चा घूमने के लिए बाहर नहीं गया था।’’

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