स्वंत्रता सेनानी कन्हैयालाल वैद्य के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता

प्रख्यात स्वतंत्रता संग्राम सेनानी-पूर्व सांसद-प्रखर पत्रकार कन्हैयालाल वैद्य की आज ४३वीं पुण्यतिथि है। कन्हैयालाल वैद्य भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के महान योद्धा तो थे ही साथ ही, वे अ.भा. देशी राज लोक परिषद के राष्ट्रीय महामंत्री भी रहे। अ.भा. देशी राज लोकपरिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष पं. जवाहरलाल नेहरू थे। वैद्य जी ने देश की स्वतंत्रता आंदोलन के साथ-साथ देशी रियासतों के राजाओं के विरूद्ध भी तीव्र गति से आंदोलन चलाए थे। यही कारण था कि उन्हें देश के अनेक राजाओं ने अपनी राज्य सीमाओं से बदर कर दिया था। अर्थात उनकी रियासतों में वैद्य जी का प्रवेश प्रतिबंधित कर दिया था। कन्हैयालालजी वैद्य अपने आरंभिक जीवन में उज्जैन के माधव महाविद्यालय में शिक्षण प्राप्त करने के लिये आए थे। उज्जैन में आपका सम्पर्वâ डा. दुर्गाशंकर नागर जी से हुआ। नागर जी विश्वविख्यात आध्यात्मिक व्यक्ति थे। वैद्य जी ने उनको अपना आध्यात्मिक गुरु माना था। डॉ. दुर्गाशंकर नागर ‘‘कल्पवृक्ष’’ जैसी आध्यात्मिक पत्रिका का प्रकाशन करते थे। उसी पत्रिका से वैद्य जी ने पत्रकारिता की प्रेरणा प्राप्त की। बाद में १९२८ में वैद्य जी झाबुआ रियासत में टाइम्स ऑफ इण्डिया के संवाददाता बने। अत: उन्होंने अंग्रेजी अखबार की पत्रकारिता से अपने जीवन में पत्रकारिता प्रारंभ की।

नरेश सोनी ‘स्वतंत्र पत्रकार’

  कन्हैयालाल वैद्य ने वकालत तक शिक्षा प्राप्त की थी। उन्होंने बहुत ही साहस के साथ झाबुआ के राजा उदयसिंह के विरूद्ध मुकदमा लिया। राजा ने उनको सोने के कण्ठे एवं भारी धनराशि का प्रलोभन दिया जो उन्होंने ठुकरा दिया। तब राजा ने उनको पिता दौलतराम वैद्य से कहा कि अपने लड़के को समझाओ तब उनके पिता ने कहा कि वह स्वतंत्र प्रवृत्ति का है मेरी नहीं सुनता है। राजा ने जागीरी का प्रलोभन भी दिया। किन्तु वैद्यजी ने वह भी ठुकरा दिया। तब व्रुâब्ध होकर राजा ने वैद्यजी की वकालत की सनत छीन ली तथा राजद्रोह का आरोप लगाकर झाबुआ राज्य से बदर कर दिया। बाद में राजा ने उन्हें जेल में डाल दिया। जब गांधीजी को तत्कालीन स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मामा बालेश्वर दयाल के माध्यम से पता चला कि वैद्य जी को राजा ने जेल में डाल रखा है तो उन्होंने एक वकील भेजा वैद्य जी के विरूद्ध केस चला वैद्य जी को सिद्धराजद्रोही घोषित कर नौ माह की सजा सुनाई गई। इधर वैद्य जी ने एक अंग्रेजी भाषा में पुस्तक लिखी ‘‘वैधर झाबुआ’’ अर्थात ‘‘झाबुआ किधर’’। इस पुस्तक पर बहुत तहलका मचा ब्रिटिश पार्लियामेन्ट में गांधीजी के प्रस्ताव से भी पहले ‘‘वैधर झाबुआ’’ पुस्तक पर लम्बी बहस चली और अंग्रेजों को पता चला कि झाबुआ रियासत का राजा कितना व्रूâर है। उन्होंने राजा को गद्दी से उतार दिया। वैद्य जी की यह बड़ी सफलता थी जिस राजा ने उन्हें अपनी रियासत से बदर किया था उस राजा को उन्होंने गद्दी से नीचे उतरवा दिया।

                १९४० में कन्हैयालालजी वैद्य ने राजस्थान के मुख्यमंत्री रहे जयनारायण व्यास के साथ मिलकर दैनिक अखण्ड भारत समाचार पत्र का प्रकाशन प्रारंभ किया। यह देशी राज्य स्वतंत्रता आंदोलन का प्रमुख समाचार पत्र था। इस समाचार पत्र के माध्यम से वैद्य जी और व्यास जी ने आठ राजाओं को उनकी गद्दी से उतरवा दिया एवं ५० देशी रियासतों में राजाओं के विरूद्ध जनआक्रोश पैâला परंतु यह समाचार पत्र उस जमाने में ५० हजार रुपए घाटे में डूब गया इस कारण इसे बंद करना पड़ा। तब दोनों सेनानियों ने और पत्रकारों ने हिसाब लगाया तो अपनी यह उपलब्धि माना कि उन्होंने एक हजार रूपए एक राजा को गद्दी से नीचे उतरवाया।

                कन्हैयालाल वैद्य देश के लगभग ७० हिन्दी, अंग्रेजी, गुजराती, मराठी आदि भाषाओं के संवाददाता थे। दैनिक अखण्ड भारत के प्रकाशन के बाद वे स्वतंत्र पत्रकार बन गए थे। वे ऐसे संवाददाता थे जो देशभर के समाचार पत्रों को खबरें भेजा करते थे। १९२८ से रिमंगटन वंâपनी का टाईपराइटर जीवन पर्यन्त उनके साथ रहा। वे जहां भी जाते उस टाइपराइटर पर खबरें टाइप कर भेज दिया करते थे। १९४२ में वे भेरूगढ़ जेल में रहे। यह वैद्यजी का ही प्रभाव था कि उन्होंने हरीपुरा कांग्रेस में प्रस्ताव पारित करवाया कि अ.भा. देशी राज लोक परिषद के आंदोलन को कांग्रेस समर्थन देती है एवं देशी रियासतों को समाप्त किया जाना चाहिए। कन्हैयालाल वैद्य इतने महान सेनानी थे कि जब देश आजाद हुआ और पहली राज्यसभा के गठन का अवसर आया तब पं. जवाहरलाल जी नेहरू ने राज्यसभा के लिए पहले सदस्य के रूप में कन्हैयालाल वैद्य जी का नाम लिखा और वैद्य जी के पास नामांकन फार्म भेजा तब फार्म भरने का शुल्क २५०/- रु. था तब वैद्यजी ने नेहरूजी से कहा कि मेरे पास तो २५०/- रु. भी नहीं है इस पर नेहरूजी ने कहा कि कोई बात नहीं आप फार्म भरकर भेजिये शुल्क हम भरेंगे। इस प्रकार वे संसद सदस्य बनें।

                कन्हैयालाल वैद्य ने आजादी के बाद स्वतंत्रता सेनानी संघ के गठन में महती भूमिका निभाई एवं इसके राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बने। वे म.प्र. स्वतंत्रता संग्राम सेनानी संघ के प्रांतीय अध्यक्ष भी रहे। श्रीमती इंदिरा गांधी जब प्रधानमंत्री थी तब उन्होंने सेनानियों को ‘‘पोलिटिकल सफरर’’ अर्थात राजनीतिक पीड़ित घोषित कर पेंशन प्रदान की। वैद्यजी ने इसका विरोध करते हुए उन्हें पत्र लिखा कि गांधीजी के नेतृत्त्व में स्वंतत्रता आंदोलन सफल रहा है इसमें भाग लेने वाले स्वतंत्रता सेनानी है। अत: उसके स्थान पर स्वतंत्रता सेनानी शब्द यानी प्रâीडम फाइटर किया जाए एवं पेंशन शब्द के स्थान पर सम्मान निधि शब्द का प्रयोग किया जाए। यदि आपने यह मांगे नहीं मानी तो मैं आंदोलन करूंगा और आपको ‘‘पोलिटिकल गेनर’’ राजनीति धोखेबाज कहा जाएगा। श्रीमती इंदिरा गांधी ने तार करके तत्काल उनकी माने मानी और दोनों शब्दों को बदला गया। लेकिन बाद में नौकरशाही ने खुराफात करते हुए पेंशन शब्द कर दिया। वैद्यजी के नेतृत्त्व में सेनानियों की बैठक हुई जिसमें २५ सेनानियों ने निर्णय लिया कि हम यह सम्मान निधि नहीं लेंगे। उनके निधन के बाद १९८८ में तत्कालीन भारत सरकार ने यह तय किया कि जो स्वतंत्रता सेनानी रहे हैं और सांसद भी रहे हैं और जिन्होंने सम्मान निधि के लिए आवेदन नहीं किया है ऐसे सेनानियों को भारत सरकार केन्द्रीय सम्मान निधि प्रदान करेगी। देश के लगभग ऐसे १०० लोगों की सूची में जिनमें पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जेल सिंह, पूर्व राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी, पूर्व प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव के साथ कन्हैयालाल वैद्य का नाम भी था। भारत सरकार ने उनकी पत्नी श्रीमती रूपवुंâवर वैद्य को एक अनुरोध पत्र भेजा कि भारत सरकार आपको सम्मान निधि प्रदान करना चाहती है कृपया स्वीकृति प्रदान करें। श्रीमती रूपवुंâवर वैद्य ने भारत सरकार के इस अनुरोध को सम्मान देते हुए अनुरोध स्वीकार किया। तब फिर भारत ने उन्हें एक पत्र भेजा जिसमें लिखा कि भारत सरकार आभारी हैं कि आपने अनुरोध स्वीकार किया। वैद्यजी की पत्रकारिता के महान योगदान को देखकर मध्यप्रदेश सरकार ने सन् २००८ से एक वार्षिक पत्रकारिता आंचलिक पुरस्कार घोषित किया जिसमें १ लाख रुपए की राशि एवं सम्मान पट्टिका प्रदान की जाती है।

                बरकतुल्ला विश्वविद्यालय भोपाल के समाज विज्ञान संकाय के अंतर्गत इतिहास विषय में डा. सुधीर कुमार त्रिवेदी के निदेशन में डा. सूर्यकांत शर्मा को ‘‘मध्य भारत के स्वतंत्रता सेनानी श्री कन्हैयालाल वैद्य का व्यक्तित्त्व एवं कृतित्त्व’’ विषय पर पीएचडी उपाधि प्रदान की गई एवं इसी प्रकार विक्रम विश्वविद्यालय द्वारा विनय फाल्के के वैद्यजी पर लघु शोध प्रबंध प्रस्तुत करने पर एम.फील की उपाधि प्रदान की गई।

                ऐसे महान सेनानी कन्हैयालाल वैद्य का उनकी ४३वीं पुण्यतिथि पर हम उनका पुण्य स्मरण करते हैं एवं उन्हें शत् शत् प्रणाम करते हैं।