कश्मीर में आतंकवाद के अंत की संभावना बनी

19 नवंबर का दिन लश्कर ए तैयबा के लिए ऐसा काल बनकर आया जिसे उस संगठन के आकागण जब भी याद करेंगे उनकी रुह कांप जाएगी। उनको कल्पना नहीं रही होगी एक साथ उनके छः बड़े आतंकवादी इस तरह मारे जाएंगे। हालांकि बांदीपोरा के हाजीन इलाके में सुरक्षा बलों की हुई कार्रवाई में हमारे वायुसेना के गरुड कमांडो के एक जवान की शहादत भी हो गई। इस खबर से पूरे देश में गम का माहौल बना। उन जवान के बलिदान के सामने पूरे देश का सिर झुका हुआ है। किंतु उनकी शहादत व्यर्थ नहीं गई। उन्होंने ऐसी कार्रवाई में अपनी जान दी जिसके बाद लश्कर की घाटी में कमर टूट गई है। कुछ सुरक्षा विशेषज्ञ तो यह भी मानने को विवश हैं कि लश्कर का लगभग सफाया हो गया है। हमारे लिए भले इस निष्कर्ष पर सहसा पहुंचना कठिन हो, किंतु सेना, केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल एवं जम्मू कश्मीर पुलिस की इस कार्रवाई में जिनका काम तमाम हुआ उनमें हाफिज सईद का जीजां अब्दुल रहमान मक्की का बेटा तथा उसके साथ जकीउर रहमान लखवी का भतीजा ओवैद उर्फ उस्माना जंगी भी शामिल है। वही आतंकवादियों का हैंडलर था। इसके पूर्व 7 नवंबर को मुठभेड़ मंे जिस ताल्हा राशिद नामक आतंकवादी को ढेर किया गया वो जैश-ए-मोहम्मद के प्रमुख मसूद अजहर का भतीजा था। जैश के प्रवक्ता ने खुद यह जानकारी दी। इस कार्रवाई में उसके साथ मुहम्मद भाई और वसीम नाम का आतंकवादी भी मारा गया। ताल्हा और मुहम्मद पाकिस्तानी थे। वसीम पुलवामा के द्रुबगाम का रहने वाला था।

इस समय मक्की, हाफिज सईद, लखवी और मसूद अजहर की क्या दशा होगी इसकी केवल कल्पना की जा सकती है। उसने जिस तरह सीमा पार से हमारे यहां खून की धाराएं बहाईं हैं उनका बदला भी इसे कहा जा सकता है। जिस हाजिन मुठभेड़ को देश के लिए जश्न का विषय बताया जा रहा है उसे मध्य सितंबर में आरंभ किया गया था। उस क्षेत्र में आतंकवादियों की गतिविधियों की सूचना थी। उसके बाद से वहां करीब-करीब रोजाना सर्च ऑपरेशन चलाए गए। वहां स्पेशल फोर्सेस को तैनात किया गया। चंदरगीर गांव में आतंकवादियों के छिपे होने की जानकारी मिली। पुख्ता जानकारी मिलने के बाद 19 नवंबर को आखिर कार्रवाई आरंभ हुई। इसके बाद जवानों ने इलाके की घेराबंदी कर कार्रवाई की जिसमें छहों आतंकवादी मारे गए। वास्तव में सेना, केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल तथा जम्मू कश्मीर पुलिस ने जब से मिलकर संयुक्त कार्रवाइयां आरंभ की है उसे भारी सफलता मिल रही है। खासकर ऑपरेशन ऑल आउट ने जवानों का हौंसला बढ़ाया है। वे इस भाव से लड़ रहे हैं कि अब नही ंतो कभी नहीं। किसी तरह कश्मीर को आतंकवादियों से मुक्त कर देना है। ऑपरेशन ऑलआउट में आतंकवादियों की एक सूची तैयार की गई। इस सूची के आधार पर ही अलग-अलग इलाकों में आतंकवादियों के खिलाफ सर्च ऑपरेशन चलाया जा रहा है और कार्रवाई की जा रही है। इस सूची मंे सूचना के अनुसार नए नाम भी जुड़ जाते हैं।

सेना और पुलिस की ओर से जो जानकारी दी गई है उसके अनुसार इस साल 190 आतंकवादी मारे गए हैं जो अपने-आपमें रिकॉर्ड है। इनमें से 110 विदेशी और 80 स्थानीय आतंकवादी थे। 110 विदेशी आतंकियों में से 66 को घुसपैठ के दौरान नियंत्रण रेखा के पास ढेर किए जाने का मतलब है कि वो कुछ नहीं कर सके। आतंक फैलाने की उनकी योजना धरी की धरी रह गई। जब आप प्रवेश द्वार पर ही मार डाले गए तो करेंगे क्या। इसके अलावा भीतरी इलाके में शेष आतंकवादी मारे गए हैं।पिछले 14 नवंबर को नौबगकुंड में हुए ऑपरेशन के दौरान सेना ने एक बड़े आतंकवादी को मार गिराया था। 14 अक्टूबर को लश्कर-ए-तैयबा के एक और कमांडर को ढेर कर दिया गया। दक्षिण कश्मीर में युवाओं की भर्ती करने वाला वसीम एक ए $$ का आतंकी था। जम्मू कश्मीर पुलिस के आईजी मुनीर खान की मानें तो वसीम का मारा जाना एक बड़ी सफलता थी क्योंकि वह एक बड़ा खतरा बनता जा रहा था। वसीम के साथ लश्कर के एक और आतंकवादी हाफिज निसार समेत एक और बेनाम आतंकवादी को मारा गया।

वसीम शाह को ढेर करने से पहले सेना बारामूला में जैश-ए-मोहम्मद के कमांडर उमर खालिद को मार चुकी थी। कमांडरों को मारने का यह सिलसिला साल 2016 में उस समय शुरू हुआ जब बुरहान वानी को मौत के घाट उतारा गया था। दक्षिण कश्मीर के त्राल में आठ जुलाई 2016 को हिजबुल मुजाहिद्दीन कमांडर बुरहान वानी को मारा गया।  सेना ने इस वर्ष 27 मई को हिजबुल कमांडर सबजार भट, 16 जून को जुनैद मट्टू, एक जुलाई को लश्कर कमांडर बशीर लश्करी, 12 जुलाई को हिजबुल के एक ही और कमांडर सज्जाद अहमद गिलकार, 16 अगस्त को लश्कर-ए-तैयबा के कमांडर अयूब ललहरी तथा 17 अगस्त को हिजबुल के कमांडर यासीन इत्तू को मार गिराया था। ये सभी आतंकी अपने-अपने संगठन में बड़ी जिम्मेदारियों को पूरा कर रहे थे। बशीर लश्करी अनंतनाग में हुए आतंकी हमले का मास्टर माइंड था तो सबजार भट वानी का करीबी था। छह अगस्त को सुरक्षाबलों ने पुलवामा में लश्कर के एक और कमांडर और खतरनाक आतंकवादी अबु दुजाना को ढेर किया। दुजाना कई बार सेना के चंगुल से बचकर भाग जाता और सेना को निराश होना पड़ता। पाकिस्तान के रहने वाले दुजाना पर 10 लाख रुपए का इनाम था और वह भी ए $$ श्रेणी का लश्कर आतंकी था। दुजाना लश्कर के टॉप कमांडर में से एक था और सुरक्षाबलों की हिट लिस्ट में सबसे ऊपर था। अबु दुजाना सात साल से कश्मीर में सक्रिय रूप से आतंकी गतिविधियों को अंजाम दे रहा था। वस्तुतः दुजाना बुरहान वानी की मौत के बाद से कश्मीर के सबसे बड़े आतंकी के रूप में उभर कर आया था। दुजाना काकापुरा में सुरक्षाबलों पर हुए ग्रेनेड हमले में मोस्ट वांटेंड आतंकी था। इसके साथ ही पिछले वर्ष उधमपुर में बीएसएफ के काफिले पर हुए हमले का मास्टरमाइंड भी दुजाना ही था।

नौ अक्टूबर को बांदीपोर के लाडूरा में हुए एनकाउंटर में सुरक्षाबलों ने जैश-ए-मोहम्मद के कमांडर उमर खालिद को भी ढेर कर दिया। खालिद कई आतंकी गतिविधियों में शामिल था और ऐसे में उसका मारा जाना भी एक बड़ी सफलता थी। खालिद उत्तर कश्मीर में सेना के शिविरों पर होने वाले कई हमलों में शामिल था। वह खासतौर पर पुलिस को निशाना बनाता था। सेना और सुरक्षा बलों की मानें तो घाटी से हिजबुल मुजाहिद्दीन कमांडर बुरहान वानी गैंग का सफाया हो गया है। वानी ने मारे जाने से पहले 10 आतंकियों के साथ एक फोटोग्राफ को सोशल मीडिया पर शेयर की थी। इस फोटोग्राफ में मौजूद सभी आतंकवादियों का सफाया सेना कर चुकी है। एक आतंकवदी सद्दाम पैडर फरार है तो वहीं एक आतंकवादी तारिक पंडित आत्मसमर्पण कर चुका है। वसीम, बुरहान गैंग का आखिरी आतंकवादी था जिसे सेना ने मार गिराया है। अगस्त 2017 में राष्ट्रीय राइफल्स ने 41 वर्ष के यासीन इत्तू उर्फ महमूद गजनवी को सेना ने ढेर कर दिया था। अब कितने आतंकवादी घाटी में बचे हैं इसके बारे में संख्या में भिन्नता है, क्योंकि उनकी संख्या बदलती रहती है। घुसपैठों एवं भर्तियों पर सबकुछ निभर्र करता है। किंतु कुल मिलाकर अब 70 से ज्यादा नहीं होंगे। सेना के निशाने पर फिलहाल जो आतंकी हैं उनमें अल कायदा का जाकिर मूसा, हिजबुल मुजाहिद्दीन का रियाज नाइकू और सद्दाम पैडर और लश्कर-ए-तैयबा के जीनत उल इस्लाम तथा खालिद शामिल है।

यह सच है कि घाटी में भारी संख्या में आतंकवादियों के मारे जाने से हालात में बदलाव देखने को मिला है। अब पत्थरबाजी कम हो गई है। आतंकवादियों के मारे जाने पर विरोध भी कम हो रहा है। कुछ महीने पहले तक घाटी में ऐसे हालात की कल्पना नहीं थी। ऐसा नहीं है कि सेना केवल मार ही रही है। सेना और पुलिस दोनों ने मिलकर स्थानीय आतंकवादियों से घर वापस लौटने की अपील भी की है। 17 नवंबर को माजिद खान नामक जिस 20 वर्षीय लश्कर के आतंकवादी बन चुके नवजवान ने आत्मसमर्पण किया वह भी सेना, सीआरपीएफ एवं पुलिस के प्रयासों का ही नतीजा थी। उन्होंने उसकी मां की बातों,  उसकी छाती पीटने को रिकॉर्ड कराकर किसी तरह उस तक पहुंचाया जिसमें उससे वापस आने की अपील थी। ये ऐसा प्रयास अन्य आतंकवादियों के लिए भी कर रहे हैं। माजिद के बाद निसार अहमद नामक आतंकवादी ने समर्पण किया है। सेना और पुलिस की संयुक्त पत्रकार वार्ता में कहा गया कि स्थानीय आतंकवादियों को खुद समझना चाहिए कि अपने आप को मुजाहिद कहना आसान है लेकिन क्या आप वाकई मुजाहिद हैं या फिर पाकिस्तान के लिए सिर्फ एक जरिये का काम कर रहे हैं।  सेना और पुलिस की तरफ से स्थानीय आतंकवादियों से अपील की गई कि वे अपने घर लौट जाएं। यदि इसमें वे किसी तरह की मदद चाहते हैं तो सीआरपीएफ की मददगार हेल्पलाइन 14411 पर कॉल कर सकते हैं। उनको हरसंभव मदद देने की घोषणा हो रही है। उन्हें विश्वास दिलाया जा रहा है कि वापस लौटने पर उनका स्वागत किया जाएगा। किसी तरह का टॉर्चर नहीं होगा। जिस ढंग से ऑल आउट का असर हुआ है उसमें कुछ और आतंकवादी मजबूरी में तो कुछ इनके प्रयासों से समर्पण कर सकते हैं। जो भी इससे यह उम्मीद तो पैदा होती है कि पिछले करीब तीन दशक से जारी आतंकवादी हमला सबसे निचले स्तर पर आ रहा है एवं इसका खात्मा हो सकता है। इस समय कश्मीर के कुछ नेताओं के जैसे उटपटांग बयान आ रहे हैं उसके पीछे सुरक्षा बलों की सफलता बड़ा कारण है। जो भी कश्मीर में सुरक्षा बल एक इतिहास रचने जा रहे हैं और पूरे भारत के लिए यह खुशी का विषय है।

अवधेश कुमार

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