राजनीति का वर्तमान दौर और नए ‘अवतार’ में राहुल गांधी

भारतवर्ष में धर्मनिरपेक्षता की राजनीति का प्रतिनिधित्व करने वाला देश का सबसे बड़ा राजनैतिक संगठन भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस एक बार फिर नेहरू-गांधी परिवार के युवा नेता राहुल गांधी को अपने अध्यक्ष के पद पर सुशोभित करने जा रहा है। कांग्रेस कार्यसमिति द्वारा सर्वसम्मति से राहुल गांधी के नाम का एक प्रस्ताव पारित कर दिया गया है। कार्यक्रम के मुताबिक 4 दिसंबर को कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए नामांकन किया जाएगा। 16 दिसंरबर को मतदान होगा तथा 19 दिसंबर को  राहुल गांधी के भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अध्यक्ष चुनने की औपचारिक रूप से घोषणा कर दी जाएगी। गौरतलब है कि राहुल गांधी अपनी मां सोनिया गांधी से ही अध्यक्ष पद का कार्यभार ग्रहण करेंगे क्योंकि 1998 से सोनिया गांधी ही इस पद पर विराजमान हैं। वैसे भी राहुल गांधी का कांग्रेस अध्यक्ष बनना तो लगभग उसी समय तय हो गया था जबकि जनवरी 2013 में सोनिया गांधी की अस्वस्थता के चलते राहुल गांधी को कांग्रेस महासचिव के पद से पदोन्नति देकर कांग्र्रेस उपाध्यक्ष बनाया गया था। जबकि राहुल गांधी की राजनैतिक पारी की शुरुआत  उस समय हुई थी जब वे 2004 में अमेठी से लोकसभा का चुनाव पहली बार जीते थे। उसके बाद ही 2007 में उन्हें कांग्रेस महासचिव के रूप में संगठन की महत्वपूर्ण जि़म्मेदारी सौंप दी गई थी।

तनवीर जांफरी

हालांकि 2004 से लेकर 2014 के मध्य का वह दौर था जबकि कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार सत्ता में थी। परंतु आज जिस दौर में राहुल गांधी कांग्रेस की कमान संभालने जा रहे हैं वह दौर नरेंद्र मोदी-अमित शाह की तजऱ्-ए-सियासत का दौर है। नेहरू-गांधी परिवार में की जाने वाली सभ्य,शलीन,पारदर्शी,लोकहितकारी,धर्मनिरपेक्ष तथा समाज के सभी वर्गो को साथ लेकर चलने वाली राजनीति का मुकाबला इस समय बहुसंख्यवादी तथा संकुचित सोच रखने वाली राजनीति से है। यह राजनीति का वह गंदा,निम्नस्तरीय दौर है जबकि देश को यह बताने की कोशिश की जा रही है कि कांग्रेस ने गत् 6 दशकों में देश को केवल लूटा और बरबाद किया है। यह बताया जा रहा है कि कांग्रेस के राज में केवल भ्रष्टाचार और घोटाले हुए हैं तथा अल्पसंख्यकों का तुष्टीकरण कर बहुसंख्यकों के अधिकारों का हनन किया गया है। हालांकि इसी भाजपा के नेता अटल बिहारी वाजपेयी संसद में प्रधानमंत्री के रूप में स्वयं यह स्वीेकार कर चुके हैं कि कांग्रेस के शासन में देश ने पचास वर्षों में बहुत विकास किया है। परंतु वह वाजपेयी युग था जबकि वास्तविकता को स्वीकार करने की सियासत जीवित थी। परंतु आज की राजनीति वह राजनीति है जबकि दूसरे को अपमानित,बदनाम व ज़लील कर जनता से वोट लेने की कोशिश की जाती है न कि अपनी योग्यता,उपलब्धियां या अपनी कारगुज़ारियां बताकर।

और नकारात्मकता की राजनीति के इसी दौर में नरेंद्र मोदी ने राहुल गांधी के बारे में यह कहा था कि राहुल को कोई व्यक्ति अपनी कार का ड्राईवर तक नहीं रखेगा। आज अहंकार की भाषा बोलने वाले के अपने गृहराज्य गुजरात में राहुल गांधी ने भाजपाईयों की ऐसी नींदें हराम कर रखी हंै कि देश के इतिहास में पहली बार कोई प्रधानमंत्री किसी एक राज्य में होने वाले विधानसभा चुनाव में सर्वाधिक जनसभाओं को संबोधित करने जा रहा है। खबर है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गुजरात के सभी जि़लों में जनसभाएं करेंगे। सोचने का विषय है कि जिस राज्य में एक दशक से भी लंबे समय तक मुख्यमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी ने शासन किया हो और पूरे देश व दुनिया में ‘मोदी-मोदी’ के जयकारे लगाए जा रहे हों,जिस राज्य के नेताओं व उद्योगपतियों का इस समय पूरे देश में दबदबा हो वहां आिखर प्रधानमंत्री को इतनी जनसभाएं करने कीे ज़रूरत क्यों महसूस हो रही है? क्यों आज पूरा केंद्रीय मंत्रिमंडल व विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्री व मंत्रिगण गुजरात में डटे हुए हैं? इन सबका केवल एक ही जवाब है और वह राहुल गांधी का राजनीति मेें नया अवतार तथा इस रूप में देश में बढ़ती जा रही उनकी लोकप्रियता।

हालांकि 2014 के बाद राहुल गांधी ने नरेंद्र मोदी का मुकाबला करने के लिए उन्हीं की सार्वजनिक संवाद शैली अपनाने की असफल कोशिश की थी। और उसी शैली का हिस्सा उनकी वह कृत्रिम अदाएं थीं जबकि वे कभी अपनी आस्तीनें चढ़ाते दिखाई देते थे तो कभी अपने हाथ में ली पर्चियां फाडऩे लगते थे। कभी गुस्से में तेज़ आवाज़ में बोलते हुए भी नज़र आते थे। परंतु उनकी वह शैली आम जनता के गले से उतर नहीं पा रही थी। इसका एकमात्र कारण यही था कि उस समय वे जो कुछ कर रहे थे वह बनावटी,कृत्रिम और नकली था। और अभिनय की इस दौड़ में वे निश्चित रूप से किसी भी कीमत पर नरेंद्र मोदी जैसे नेता को पछाड़ नहीं सकते थे। जिस नेता ने अपनी ही पार्टी के लाल कृष्ण अडवाणी,मुरली मनोहर जोशी,केशू भाईपटेल सहित और भी कई वरिष्ठ नेताओं को हाशिए पर पहुंचा दिया हो उसके सामने राहुल गांधी का टिक पाना संभव नहीं था। परंतु मात्र दो वर्षों के भीतर ही राहुल गांधी को यह बात भलीभांति समझ में आ गई और वे अपनी पारंपरिक खानदानी शैली में राजनीति करने लगे। आज यदि राहुल गांधी का भाषण सुनिए तो उसमें एक्शन,ड्रामा,अंदाज़,रोना-पीटना,अहंकार,छल-कपट और मक्क ारी या झूठे वादों और झूठे आश्वासनों की झलक बिल्कुल दिखाई नहीं देती बल्कि राहुल गांधी का वर्तमान नया अवतार एक गंभीर,नपी-तुली बातें करने वाला, अपने विरोधियों पर उनके मान-सम्मान को मद्देनज़र रखते हुए हमलावर होने वाला तथा देश की नीतियों की गहरी समझ रखने वाला नेता दिखाई देता है।

उधर राहुल गांधी की बढ़ती लोकप्रियता से घबराकर उनके विरोधी आज भी अपनी पारंपरिक शैली में अर्थात् झूठ का सहारा लेकर उन्हें नीचा दिखाने की कोशिशों में लगे हैं। सोशल मीडिया पर जनता को गुमराह करने वाले वीडियो संपादित कर चलाए जा रहे हैं ताकि राहुल को बदनाम किया जा सके। परंतु गत् मात्र एक वर्ष में राहुल गांधी ने गुजरात की गली-कूचों से लेकर अमेरिका के बुद्धिजीवियों के मध्य तक जिन मुद्दों को उठाया है और जिस अंदाज़ की सियासत का परिचय दिया है उससे बहुमत की केंद्र सरकार में खलबली मच गई है। कांग्रेस मुक्त भारत का अहंकारी उद्घोष करने वाले नेताओं को अपना ही राज्य गुजरात कांग्रेस युक्त होता दिखाई देने लगा है। दूसरी ओर कांग्रेस पार्टी में भी राहुल गांधी के बदलते हुए नए अवतार की छवि से जोश व उत्साह पैदा हो रहा है। पंजाब में विधानसभा चुनाव में हुई जीत तथा उसके बाद गुरदासपुर लोकसभा उपचुनाव तथा और भी कई उपचुनावों में होने वाली जीत न केवल कांग्रेस कार्यकर्ताओं के हौसलों को बुलंद कर रही है बल्कि इस जीत का सेहरा भी कांग्रेसजन राहुल गांधी के कुशल व सक्षम नेतृत्व के सिर बांध रहे हैं। हालांकि बीच-बीच में उत्तर प्रदेश जैसे विधानसभा चुनाव परिणामों का सामना भी राहुल गांधी को करना पड़ा है जिससे कांग्रेस को झटका भी लगा है। परंतु इन सबके बावजूद कांग्रेस के सिमटते जनाधार के बीच राहुल गांधी का कांग्रेस की कमान संभालना और देश में हो रही बहुसंख्यवाद की राजनीति का मुकाबला कांग्रेस की धर्मनिरपेक्षता की प्रतिबद्धताओं के साथ करना निश्चित रूप से एक बड़ी चुनौती है। देखना होगा कि राजनीति के इस नए दौर में अपने नए अवतार में राहुल गांध्ंाी कितना सफल सिद्ध होते हैं?