महिलाओं की सुरक्षा एवं स्वास्थ्य की बदहाली क्यों?

देश में अस्तित्व एवं अस्मिता की दृष्टि से ही नहीं बल्कि स्वास्थ्य की दृष्टि से महिलाओं के हालात बदतर एवं चिन्तनीय है। देखा जा रहा है कि किसी भी क्षेत्र में तमाम महिला जागृति के कार्यक्रमों एवं सरकार की योजनाओं के बावजूद महिलाओं का शोषण होता है, उनके अधिकारों का हनन होता है, इज्जज लूटी जाती है और हत्या कर देना- मानो आम बात हो गयी है। यह हालात सुदूर अनपढ़ एवं अविकसित क्षेत्रों के नहीं बल्कि राजधानी दिल्ली के है और इस बात को पुष्ट करती है हाल में महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने प्लान इंडिया की ओर से तैयार की गयी रिपोर्ट। यह रिपोर्ट चैंकाने वाली है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में महिलाओं के लिए सबसे सुरक्षित राज्य गोवा है, जबकि देश की राजधानी को महिलाओं की सुरक्षा की दृष्टि से खराब राज्यों में से एक है। बात सुरक्षा की ही नहीं है बल्कि स्वास्थ्य की भी है। आवश्यकता है साफ-सुथरी सोच की, साफ-सुथरे- कारगर निर्णय की एवं साफ-सुथरे न्याय की।

ललित गर्ग

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी नया भारत निर्मित कर रहे हैं। लेकिन भारत अपने हाथों से महिलाओं की भाग्यलिपि में कौन-सा रंग भर रहा है, यह हमें आज पढ़ना है। भारत का सपना है आजाद देश में आजाद नारी। नारी का स्वतंत्र अस्तित्व एवं सार्वभौम अभ्युदय। भारतीय महिलाएं जिंदगी के सभी क्षेत्रों में सक्रिय हैं। चाहे वह राजनीति का क्षेत्र हो या फिर शिक्षा, कला-संस्कृति अथवा आइटी या फिर मीडिया का क्षेत्र, सभी क्षेत्रों में महिलाओं ने सफलता के झंडे गाड़े हैं। लेकिन सफलता के बीच बीतते कालखण्ड की कुछ घटनाओं ने उनके विनाश के चित्र भी उकेरे हंै, जो ज्यादा भयावह एवं चिन्ता का कारण है।

                तमाम सरकारी तथ्यों की सच्चाई को उजागर करती एक और रिपोर्ट महिलाओं की स्वास्थ्य की दिनोंदिन बिगड़ती दशा और दिशा को प्रस्तुत करती है। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि एक तरफ आधे से ज्यादा महिलाएं अनेमिया यानी खून की कमी से पीड़ित हैं, दूसरी तरफ 22 फीसदी महिलाएं बीमारी की हद तक मोटापे का शिकार हैं। साल 2017 की ग्लोबल न्यूट्रिशन रिपोर्ट ने इन तथ्यों को उजागर करते हुए बताया है कि दुनिया में 15 से 49 साल की उम्र सीमा में सबसे ज्यादा अनीमिक महिलाएं भारत में ही हैं। इस रिपोर्ट की खासियत यह है कि यह पिछले साल मई महीने में जिनीवा में हुई वल्र्ड हेल्थ असेंबली में तय किए गए लक्ष्यों के बाद आई है और उनकी रोशनी में 140 देशों के हालात का जायजा लेती है। भारत की स्थिति ज्यादा चिंताजनक इसलिए मानी जा रही है क्योंकि लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़ने के बजाय यहां पीछे की तरफ गति देखी जा रही है। पिछले साल की रिपोर्ट में यहां अनीमिक महिलाओं का प्रतिशत 48 था जो इस बार 51 हो गया है। इस मामले में सरकारी प्रयासों पर बारीकी से नजर रखनेवालों ने ठीक ही गौर किया है कि सरकार महिलाओं में कुपोषण की समस्या को पहचानने तो लगी है, लेकिन इसे नियंत्रित नहीं कर पा रही है, उसकी योजनाएं या तो कोरी कागजी है या फिर असरकारक नहीं है। अगर सरकार कुछ कारगर प्रयास कर पाती तो हालात पहले के मुकाबले और बदतर तो न होते। आखिर ये बुनियादी सवाल क्यों नहीं सरकार की नींद को उडा रहे हैं? क्यों नहीं सरकार की इन नाकामयाबियों की चर्चा प्रमुखता से की जाती? कब तक महिलाएं इस तरह कभी अस्मत को तो कभी स्वास्थ्य को चैपट होते हुए देखती रहेगी?

                भारतीय जनता पार्टी ने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में 2014 का लोकसभा चुनाव जिन मुद्दों पर लड़ा, उनमें महिला-सुरक्षा एवं स्वास्थ्य एक अहम मुद्दा था। भाजपा ने अपने मैनिफेस्टो में और प्रधानमंत्री ने अपने भाषणों में कई महिलाओं के खिलाफ हिंसा से जुड़े सभी कानूनों को सख्ती से लागू करने का संकल्प व्यक्त किया था। लेकिन लगता है जिस तत्परता से महिला-सुरक्षा एवं स्वास्थ्य-रक्षा को बल मिलना चाहिए, नहीं मिल रहा है। आए दिन होने वाले महिला अत्याचार, आक्रमण, नारी शोषण एवं अन्याय की संगीन बातें आंखे पढ़ती और देखती है, कान सुनते हैं, मन सोचता है नारी कब तक लीलती रहेगी, कब तक दोयम दर्जंे पर रहेगी और कब तक राजनीति का नारा बनती रहेगी? नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के मुताबिक बलात्कार के ज्यादा मामले दर्ज किए जा रहे हैं। इससे ये समझा जा सकता है कि कड़े कानून ने महिलाओं को सामने आने और पुलिस में शिकायत करने का बल दिया है, यह बदलाव तो सुखद कहा जा सकता है। साथ ही कानून का दायरा बढ़ा है और पुलिस के लिए बलात्कार की हर शिकायत में एफआईआर दर्ज करना अनिवार्य हो गया है। लेकिन इसके साथ यह भी एक कड़वी सच्चाई है कि महिलाओं के खिलाफ अपराध की दर भी बढ़ रही है।

                राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार शिक्षा में महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है। एक दशक पहले हुए सर्वेक्षण में शिक्षा में महिलाओं की भागीदारी 55.1 प्रतिशत थी जो अब बढ़ कर 68.4 तक पहुंच गयी है यानी शिक्षा के क्षेत्र में 13 फीसदी से अधिक की वृद्धि दर्ज की गयी है। बाल विवाह की दर में गिरावट को भी महिला स्वास्थ्य और शिक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। कानूनन अपराध घोषित किये जाने और सरकारों के लगातार जागरूकता अभियानों के कारण इसमें कमी तो आयी है, लेकिन बाल विवाह का चलन खासकर गांवों में अब भी बरकरार है। सर्वेक्षण के अनुसार, सन् 2005-06 में 18 वर्ष से कम उम्र में शादी 47.4 प्रतिशत से घट कर 2015-16 में 28.8 रह गयी है। इसका सीधा लाभ महिला स्वास्थ्य पर भी पड़ा है। मोदी सरकार के मुहिम के कारण बैंकिंग व्यवस्था में भी महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है। शिक्षा और जागरूकता का सीधा संबंध घरेलू हिंसा से है। अब इन मामलों में भी कमी आयी है। रिपोर्ट के अनुसार वैवाहिक जीवन में हिंसा का सामना करने वाली महिलाओं का प्रतिशत 37.2 से घटकर 28.8 प्रतिशत रह गया है। यह सही है कि महिलाओं के सशक्तीकरण की दिशा में प्रगति हुई है लेकिन अब भी यह नाकाफी है और इस क्षेत्र में व्यापक कार्य किया जाना बाकी है। भारत का संविधान भी सभी महिलाओं को बिना किसी भेदभाव के सामान अधिकार की गारंटी देता है। संविधान में राज्यों को महिलाओं और बच्चों के हित में विशेष प्रावधान बनाये जाने का अधिकार भी दिया है ताकि महिलाओं की गरिमा बरकरार रहे। लेकिन इन सबके बावजूद देश में महिलाओं की स्थिति अब भी मजबूत नहीं है। उनकी सुरक्षा को लेकर अक्सर चिंता जाहिर की जाती है. उन्हें निशाना बनाया जाता है, कानून के बावजूद कार्यस्थलों पर उनके साथ भेदभाव किया जाता है।

                महिलाओं से जुड़ी सबसे बड़ी समस्या है उनके काम का उचित मूल्यांकन न होना भी है। उनके लिये असमान वेतन है। इन्हें अपने काम के अनुरूप वेतन नहीं मिलता है। इनका न्यूनतम वेतन, काम के घंटे, छुट्टियां, कुछ भी निर्धारित नहीं है। दूसरी गंभीर समस्या अमानवीय व्यवहार है। कानूनन 18 वर्ष से कम उम्र की लड़कियों से घरेलू कामकाज नहीं कराया जा सकता है, लेकिन देश में ऐसे कानूनों की कोई परवाह नहीं करता। यह केवल किसी एक प्रान्त की बच्चियों की समस्या नहीं, पूरे देश की बेटियों और महिलाओं का यह दर्द है। लेकिन परिदृश्य ऐसा भी नहीं है जिसमें उम्मीद की कोई किरण नजर न आती हो. पिछले कुछ वर्षों में सरकारी कोशिशों और सामाजिक जागरूकता अभियानों के कारण महिलाओं की स्थिति में धीरे धीरे ही सही, मगर सुधार आया है। यह बदलाव शिक्षा से लेकर स्वास्थ्य तक के आंकड़ों में दिखाई देता है। ‘हिम्मत’ नाम का ऐप शुरू किया जाना हो या निर्भया फण्ड का बनना – अच्छी बात है लेकिन इनके इस्तेमाल की योजना बनना और उसका क्रियान्वयन होना ज्यादा जरूरी है। कोरा फण्ड बनाने से क्या फायदा? देश में महिलाओं को लेकर असुरक्षा का माहौल बना हुआ है। मान्य सिद्धान्त है कि आदर्श ऊपर से आते हैं, क्रांति नीचे से होती है। पर अब दोनों के अभाव में तीसरा विकल्प ‘औरत’ को ही ‘औरत’ के लिये जागना होगा।

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