गीता कालजयी और विश्वकल्याण के लिए है : डॉ. एस.आर. भट्ट

उज्जैन। गीता कालजयी और विश्वकल्याण के लिए है। यह भारतीय संस्कृति के उद्भव और विकास की रूपरेखा प्रस्तुत करती है। गीता का आदर्श शाश्वत है। इसका निष्काम कर्म यह है कि हम अनासक्त और निस्पृह होकर कर्म करें और फल की चिंता न करें। उचित साध्य के लि साधन भी पवित्र होना चाहिए। गीता के संदेश को ग्रहण करने से विश्व का कल्याण हो सकता है। यह उद्गार भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद दिल्ली के अध्यक्ष डॉ. एस.आर. भट्ट ने माधव कॉलेज के गांधी हॉल में श्रीमद् भगवत गीता में अध्यात्म विज्ञान एवं योग विषय पर महाविद्यालय के दर्शनशास्त्र विभाग द्वारा आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के उद्घाटन अवसर पर बीज वक्तव्य देते हुए व्यक्त किए।
मुख्य अतिथि सांसद एवं दर्शनशास्त्री डॉ. चिंतामणि मालवीय ने कहा कि गीता की भाषा बहुत सरल है और उसके भावों में अनंतता है। गीता के प्रत्येक सूत्र में जीवन का संदेश है और यह दुनिया को जिंदगी जीने का ढंग सिखाती है। गीता इतना अद्भुत ग्रंथ है कि उस पर विचार विमर्श के लिए कई सेमिनारों की आवश्यकता है। इस्कॉन से आए सारस्वत अतिथि श्री प्रेमभक्ति जी महाराज ने कहा कि गीता व्यक्ति को परिवर्तित करने की क्षमता रखती है। इसमें कई लोगों के जीवन को बदल दिया है। इस्कॉन संस्था भी गीता के संदेश को दुनिया तक पहुँचाने का प्रयास कर रही है। विशिष्ट अतिथि श्री मुकेश लड्ढा ने कहा कि गीता एक उत्तम काव्य ग्रंथ भी है। यह भक्ति और ज्ञान का मेल कराती है। माधव कॉलेज जनभागीदारी समिति के अध्यक्ष श्री विजय अग्रवाल ने कहा कि गीता में जीवन का स्पंदन है। यह जीवन जीने का दर्शन है और इसके संदेश को जन-जन तक पहुंचाया जाना चाहिए।
अध्यक्षीय उद्बोधन देते हुए प्राचार्य डॉ. बी.एस. मक्कड़ ने कहा कि हम जितनी बार गीता को पढ़ते हैं उतनी ही बार उसके अलग अर्थ निकलते हैं। श्रीकृष्ण का दर्शन हमारे जीवन मूल्यों को स्थापित करता है। गीता को आत्मसात करने की जरूरत है।
उद्घाटन सत्र का संचालन प्रो. राजश्री शेठ ने किया। स्वागत भाषण डॉ. हेमंत नामदेव ने दिया और आभार संगोष्ठी संयोजक डॉ. शोभा मिश्र ने प्रदर्शित किया। इस अवसर पर छात्र संघ अध्यक्ष श्री अनिल मालवीय एवं उपाध्यक्ष कु. दुर्गा भी मंच पर उपस्थित थे। संगोष्ठी में देश प्रदेश के अनेक विद्वान भाग ले रहे हैं। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में प्राध्यापक एवं छात्र उपस्थित थे।

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