अपनी भूमि तलाशने की जरूरत लघुकथाकारों को आज भी : प्रो. आच्छा

उज्जैन। ‘जीवन से साक्षात्कार करने के लिए अपनी भूमि तलाशने की जरूरत लघुकथाकारों को आज भी है। लघुकथा रचने के लिए लोक संपृक्ति आवश्यक है। यह ध्यान रखना चाहिए कि रचना में संप्रेषणीयता के नवोन्मेष हो, अनुभूति विषय में पड़ताल की आकांक्षा हो और अपने भीतर का आलोचक हमेशा जिंदा, संजीदा हो।Óलघुकथाकारों को उक्त विमर्श सुदामानगर में संस्था सरल काव्यांजलि के तत्वावधान में आयोजित लघुकथा गोष्ठी में चेन्नई से पधारे ख्यात समीक्षक, सम्पादक प्रो. बी.एल. आच्छा ने दिया। यह जानकारी देते हुए संस्था के श्री संतोष सुपेकर ने बताया कि लघुकथा की रचना प्रक्रिया तथा विधान पर ख्यात लघुकथाकार, संपादक श्री सतीश राठी (इंदौर) ने विस्तार से चर्चा की, उन्होंने कहा कि लघुकथा में संप्रेषणीयता होना चाहिए, पाठक की अंतरात्मा को छूने वाली रचना ही सफल लघुकथा है। हम जितना ज्यादा पढ़ेंगे, रचना उतनी ही परिष्कृत होगी। एक लघुकथाकार खोजपूर्ण निगाह रखे, कलात्मकता को महत्व दे एवं भाषा का गठन पात्रानुरूप करे तो रचना कालजयी हो सकती है। इस अवसर पर श्री सतीश राठी के सम्पादन में प्रकाशित ‘क्षितिजÓ (समकालीन लघुकथा लेखन का आठवाँ संकलन) का विमोचन हुआ, साथ ही लघुकथा क्षेत्र में अविस्मरणीय अवदान के लिए प्रो. बी.एल. आच्छा तथा श्री सतीश राठी का संस्था द्वारा शॉल, स्मृति चिह्न भेंट कर सम्मान भी किया गया। इसी दौरान शहर के लघुकथाकारों सर्वश्री संतोष सुपेकर, डॉ. प्रभाकर शर्मा, राजेन्द्र नागर ‘निरन्तरÓ, रमेशचन्द्र शर्मा, राधेश्याम पाठक ‘उत्तमÓ, डॉ. पुष्पा चौरसिया, कोमल वाधवानी ‘प्रेरणाÓ तथा श्रीमती आशागंगा द्वारा अपनी प्रतिनिधि लघुकथाओं का पाठ भी किया गया। माँ सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण के पश्चात अतिथि स्वागत श्री एम.जी. सुपेकर तथा मिथिलेश मनावत ने किया। संचालन संतोष सुपेकर ने तथा अंत में आभार प्रदर्शन संस्था सचिव डॉ. संजय नागर ने किया।

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