क्या अल्पेश, जिग्नेश एवं हार्दिक के सहारे कांग्रेस भाजपा राज खत्म कर देगी

विधानसभा चुनाव से पहले गुजरात की राजनीति काफी रोचक हो रही है। सतह पर ऐसा लग रहा है जैसे कांग्रेस में नई जान आ गई हो। एक साथ ओबीसी एकता मंच के नेता अल्पेश ठाकोर के कांग्रेस में शामिल होने, दलितों के नेता माने जाने वाले जिग्नेश मेवानी तथा पाटीदार आंदोलन अनामत समिति के संयोजक हार्दिक पटेल द्वारा कांग्रेस को समर्थन देने एवं चुनाव में भाजपा को पराजित करने के लिए काम करने की घोषणा को गुजरात की चुनावी राजनीति में महत्वपूर्ण मोड़ के रुप मंें देखा जा रहा है। यह बात ठीक है कि हार्दिक पटेल ने कांगेस द्वारा चुनाव लड़ने के प्रस्ताव को ठुकरा दिया है, लेकिन वे भाजपा के विरुद्ध प्रचार कर रहे हैं और करेंगे। गुजरात में भाजपा के विरुद्ध प्रचार का मतलब है, कांग्रेस का समर्थन। एक सामान्य निष्कर्ष यह निकाला जा रहा है कि अगर पिछड़ों, दलितों तथा पाटिदारों यानी पटेलों का एक बड़ा वर्ग इनके प्रयासों से कांग्रेस के साथ आ गया तो फिर भाजपा के लिए मुश्किलें खड़ी हो सकती है। तीनों के साथ थोड़ा-बहुत जन समूह तो होगा ही। कांग्रेस उनको भी अपने साथ आने की आशा कर रही है। लेकिन क्या यह इतना ही आसान है जितना बताया या समझा जा रहा है?

इसमें दो राय नहीं कि इन तीनों युवा नेताओं का कांग्रेस के साथ खड़ा होना निराश कांग्रेस में उम्मीद लेकर आई है। कुछ महीने पहले तक जिस कांग्रेस को तलाक देने वालोें का जिले-जिले में तांता लग गया था उस कांग्रेस की ओर ऐसे लोगों के आने का संदेश यह निकलता है कि शायद जनता का झुकाव धीरे-धीरे उसकी ओर हो रहा है। आम आदमी पार्टी के अनेक नेता-कार्यकर्ता भी कांग्रेस में शामिल हो रहे हैं। चुनावों में पार्टियों के निश्चित मतदाताओं को छोड़ दे ंतो शेष के लिए ऐसे संदेशों का मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ता है। इन तीनों युवाओं ने पिछड़ों, दलितों और पाटीदारों के एक वर्ग को प्रभावित किया भी है। गुजरात की आबादी में ओबीसी की 146 जातियों का हिस्सा 51 प्रतिशत के करीब है। यह बहुत बड़ी आबादी है। कई राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि 182 में से 110 सीटों तक इतना प्रभाव विस्तार है। 60 सीटों पर इनकी भूमिका निर्णायक है यह सही है। गुजरात में पाटीदार और दलित समुदाय की आबादी 25 प्रतिशत है। कांग्रेस मानती है कि आदिवासी समुदाय के बीच उसका जनाधार पहले से है। गुजरात आम तौर पर व्यापार बहुल राज्य माना जाता रहा है। गुजरात मंें छोटे यानी मध्यम वर्ग और निम्न मध्यम वर्ग व्यापारियों की संख्या काफी ज्यादा है। ये सब मोटे तौर पर लंबे समय से भाजपा को वोट करते आ रहे थे। पहले नोटबंदी और उसके परिणामों से पूरी तरह निकले बगैर जीएसटी लागू करने से उनके अंदर असंतोष है जो साफ दिख रहा है। कांग्रेस इसका भी लाभ उठाना चाहती है तथा वह नोटबंदी एवं जीएसटी को जमकर कोस रही है। राहुल गांधी अपने हर भाषण में इसका विस्तार से जिक्र करते हैं। इसी तरह पटेल समुदाय भी भाजपा का बड़ा वोट बैंक रहा है। अगर आरक्षण की मांग के प्रति उनके एक वर्ग मंें भी आक्रोश है तो फिर कांग्रेस इसका लाभ पाने की सोच सकती है। हार्दिक के माध्यम से कांग्रेस उसमें सेंध लगाने का हर संभव प्रयास कर भी रही है।

इस तरह ऐसा लगता है कि कांग्रेस ने जातिगत समीकरणों से भाजपा को घेरने की पूरी बिसात बिछा दी है। किंतु इसका दूसरा पक्ष भी है। ऐसा नहीं है कि भाजपा को इस स्थिति का आभास नहीं था। वास्तव में इन तीनों का कांग्रेस की ओर झुकाव और भाजपा विरोधी तेवर लंबे समय से है। ये तीनों भाजपा सरकार के खिलाफ अभियान पहले से चला रहे हैं। हार्दिक के बारे में पूरा देश जानता है। अल्पेश ठाकोर ने भी पिछले साल जनवरी में सरकार के विरुद्ध गांधीनगर में एक बड़ी रैली की थी। अल्पेश ठाकोर की पृष्ठभूमि कांग्रेस की है। उनके पिताजी कांग्रेस में हैं। इसलिए राजनीति में उनका स्वाभाविक ठिकाना कांग्रेस ही होना था। भाजपा के अंदर इस बात की चर्चा पहले से थी कि ये चुनाव में उसके खिलाफ जाएंगे। इसलिए वह इनके खिलाफ रणनीति पर पहले से काम कर रही थी। आखिर जिस दिन गुजरात कांग्रेस के अध्यक्ष भरत सिंह सोलंकी ने हार्दिक पटेल को चुनाव लड़ने का निमंत्रण दिया उसी दिन पाटीदार आरक्षण आंदोलन समिति यानी पास के प्रवक्ता वरुण पटेल तथा प्रमुख महिला नेता रेशमा पटेल अपने 40 समर्थकों के साथ भाजपा में शामिल हो गए। दोनों ने पत्रकारों से बातचीत में कांग्रेस पर चुनावी राजनीति के लिए पाटीदार आंदोलन का बेजा इस्तेमाल करने और पाटीदारों को वोट बैंक बनाने का प्रयास करने का आरोप लगाया। उन्होंने यह भी कहा कि भाजपा की ओर से उठाए गए कदमों से उन्हें विश्वास हो गया है कि यह पाटीदार समाज की समस्याओं को ईमानदारी से दूर करने का प्रयास कर रही है। रेशमा ने हार्दिक को कांग्रेस का एजेंट तक करार दिया और कहा कि पाटीदार आंदोलन हार्दिक का नहीं, बल्कि पूरे समाज का है। दोनों ने पाटीदार समुदाय से कांग्रेस के बहकावे में नहीं आने की अपील भी की। उन्होंने कहा कि पाटीदार आंदोलन भाजपा को सत्ता से उखाड़ने और कांग्रेस जैसी पूर्व में कुशासन देने वाली पार्टी की सरकार बनाने के लिए नहीं है।

भाजपा ने इसकी तैयारी उसी दिन से कर रखी थी जिस दिन हार्दिक ने राहुल गांधी के गुजरात आगमन का स्वागत किया। इसके बाद पूरे प्रदेश में हार्दिक पटेल के संगठन से लोगों को भाजपा में शामिल करने का अभियान आरंभ हो गया है। हार्दिक एक ओर भाजपा के खिलाफ प्रचार करेंगे तो ये लोग उनके खिलाफ। दूसरे, अल्पेश ठाकोर एवं जिग्नेश अभी इतने बड़े नेता नहीं हैं कि उनके कांग्रेस के समर्थन करने से पिछड़ी जातियों और दलितों का वोट भारी संख्या में आसानी से शिफ्ट हो जाएगा। तीसरे, यह भी नहीं भूलना चाहिए कि चाहे अल्पेश ठाकोर हों या जिग्नेश मेवानी दोनों पाटीदार आरक्षण आंदोलन के विरुद्ध रहे हैं। अल्पेश का तो अभियान ही इसी पर टिका था कि पाटीदारों को आरक्षण देने से पिछड़ों और दलितों का हक मारा जाएगा। इसके लिए ही उन्होंने अनेक रैलियां कीं। कांग्रेस के लिए इस अंतर्विरोध को साधना आसान नहीं होगा। क्या जो व्यक्ति पटेलों के आरक्षण का विरोधी है वह कांग्रेस में है और पटेल कांग्रेस को ही वोट देंगे? चौथे, पिछले विधानसभा चुनाव में पटेलों के बड़े नेता केशूभाई पटेल ने गुजरात परिवर्तन पार्टी बनाकर भाजपा के खिलाफ चुनाव लड़ा था। उन्होंने 163 उम्मीदवार खड़े किए थे जिसमें केवल 3 जीते एवं उन्हें वोट आया केवल 3.63 प्रतिशत। कांग्रेस केशूभाई पटेल के विद्रोह का भी लाभ नहीं उठा सकी। एक सर्वेक्षण कहता है कि 80 प्रतिशत पटेल मतदाताओं ने भाजपा के पक्ष में मतदान किया। इस समय भाजपा में पटेलों के 44 विधायक हैं।

कह सकते हैं कि तब धूरी में नरेन्द्र मोदी थे जिनका संगठन कौशल, प्रचार रणनीति और कार्यकर्ताओं तथा सभी वर्ग के प्रमुख लोगों से निजी संपर्क था। मोदी ने गुजरात अस्मिता का स्वयं को प्रतीक बना दिया था। अब मोदी मुख्यमंत्री नहीं है। इसका असर हो सकता है। लेकिन मोदी परिदृश्य से गायब तो हुए नहीं हैं। उन्होंने लगातार गुजरात की यात्राएं की हैं। एक वर्ष मेें 15 एवं 35 दिनों में चार। गुजरात महागौरव कार्यकर्ता सम्मेलन में उन्होंने यह कहकर कि कांग्रेस ने उनको जेल भेजने की पूरी कोशिश की स्वयं के प्रति सहानुभूति कायम करने की कोशिश की है। साथ ही सरदार पटेल एवं उनकी पुत्री के साथ कांग्रेस ने कैसा व्यवहार किया यह कहकर पटेलों को कांग्रेस के विरुद्ध उभारने की रणनीति अपनाई है। ऐसा वे आगे भी करेंगे। क्या कांग्रेस इनकी काट तलाश सकती है?  जीएसटी में आवश्यक संशोधन कर व्यापारियों के असंतोष को कम करने का कदम उठाया है और स्वयं प्रधानमंत्री ने कहा है कि अभी भी जो कठिनाई है उसे कम किया जाएगा। सरकार आगे और कदम उठा सकती है। ऐसे में यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि इन तीनों नेताओं के कांग्रेस के साथ आने तथा व्यापारियो में असंतोष से भाजपा का 22 सालों का शासन खत्म हो जाएगा एवं कांग्रेस की वापसी होगी।

अवधेश कुमार